उडुपी में राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि पर गूंजा शिक्षा-संस्कार का संदेश
- धन्नाराम चौधरी

- 12 अग॰
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महापुराण दिवस पर भव्य जागरण, मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान; हरीश चौधरी ने कहा—शिक्षा के साथ संस्कार ही व्यक्तित्व की असली पहचान

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) उडुपी | 12 अगस्त 2026
उडुपी में श्री राजारामजी आँजणा पटेल संघ, उडुपी जिला के तत्वावधान में संत श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि (महापुराण दिवस) श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकजुटता के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में समाज के पदाधिकारियों, समाजबंधुओं और व्यापारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। धार्मिक आयोजन के साथ शिक्षा और संस्कार को केंद्र में रखकर नई पीढ़ी को बेहतर दिशा देने का प्रेरक संदेश भी दिया गया।
पुण्यतिथि समारोह के दौरान रात्रि जागरण एवं प्रसादी का आयोजन किया गया। भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत वातावरण में समाजबंधुओं ने संत राजारामजी महाराज को श्रद्धापूर्वक नमन किया तथा उनके बताए आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। आयोजन के अगले चरण में बच्चों में शिक्षा के प्रति उत्साह और प्रतिस्पर्धात्मक भावना बढ़ाने के उद्देश्य से मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान किया गया। प्रतिभाशाली छात्रों को मोमेंटो भेंट कर उनकी उपलब्धियों का उत्साहवर्धन किया गया।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय आँजणा समाज महासभा के शिक्षा प्रभारी हरीश चौधरी ने विद्यार्थियों और युवाओं को संबोधित करते हुए शिक्षा के साथ संस्कारों की अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। शिक्षा मनुष्य के जीवन का अनमोल उपहार है, जबकि संस्कार जीवन का सार हैं। दोनों का संतुलित विकास ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को मजबूत और समाज को सशक्त बनाता है।
हरीश चौधरी ने कहा कि जब व्यक्ति में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होता है, तभी वह अपने परिवार, समाज और देश के विकास में सार्थक योगदान दे सकता है। उन्होंने अभिभावकों और युवाओं से अपील की कि बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके चरित्र, व्यवहार, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।
उन्होंने शिक्षा के व्यापक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि शिक्षा का मतलब केवल किताबों में दर्ज विषयों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो व्यक्ति को सही और गलत में अंतर समझने, विवेकपूर्ण निर्णय लेने, दूसरों के प्रति सम्मान रखने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने की क्षमता प्रदान करे।
शिक्षा के साथ संस्कार क्यों जरूरी?
हरीश चौधरी ने वर्तमान दौर की तेज रफ्तार जिंदगी का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक समय में परिवार और समाज के सामने बच्चों को संस्कारों से जोड़कर रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। अभिभावक बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाकर अक्सर यह मान लेते हैं कि उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई, लेकिन यह शिक्षा की तस्वीर का केवल एक हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि केवल किताबी ज्ञान से व्यक्ति शिक्षित तो हो सकता है, लेकिन विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता होती है। आज जरूरत ऐसे युवाओं को तैयार करने की है, जिनके पास आधुनिक शिक्षा के साथ नैतिकता, अनुशासन, संवेदनशीलता, विनम्रता और समाजसेवा की भावना भी हो।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान देती है और संस्कार उस ज्ञान का सही उपयोग करना सिखाते हैं। यदि ज्ञान के साथ विवेक नहीं है तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार संस्कारों के साथ शिक्षा का जुड़ाव व्यक्ति को बदलते समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाता है।
मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान बना आकर्षण
राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि के अवसर पर विद्यार्थियों के सम्मान का आयोजन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। मेधावी छात्रों को मोमेंटो भेंट कर उनकी मेहनत और उपलब्धियों को प्रोत्साहित किया गया। इस पहल से विद्यार्थियों में आगे बढ़ने का उत्साह पैदा करने के साथ समाज में शिक्षा को प्राथमिकता देने का सकारात्मक संदेश गया।
कार्यक्रम में युवाओं को यह संदेश भी दिया गया कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विकास की मजबूत नींव है। शिक्षित और संस्कारित युवा ही भविष्य में समाज का नेतृत्व करते हुए सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी
राजारामजी महाराज की पुण्यतिथि केवल धार्मिक स्मरण का अवसर नहीं रही, बल्कि इस आयोजन ने समाज में शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया। समाजबंधुओं की सहभागिता ने आयोजन को सामूहिक एकता और सामाजिक चेतना का स्वरूप दिया।
आयोजन में उपस्थित समाज के पदाधिकारियों, व्यापारियों और समाजबंधुओं ने धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए संत राजारामजी महाराज के आदर्शों को याद किया। समाज की नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत से जोड़ने की भावना भी कार्यक्रम में दिखाई दी।
आयोजकों का मानना रहा कि ऐसे आयोजन समाज के बीच आपसी संपर्क और एकजुटता को मजबूत करने के साथ बच्चों और युवाओं को अपनी परंपराओं से परिचित कराने का प्रभावी माध्यम बनते हैं। धार्मिक आयोजनों के साथ शिक्षा और संस्कार जैसे विषयों को जोड़ने से समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलता है।
नई पीढ़ी को दिशा देने का संकल्प
कार्यक्रम में दिए गए संदेश का केंद्रीय भाव यही रहा कि समाज की प्रगति केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि शिक्षित, संस्कारित और जिम्मेदार नई पीढ़ी के निर्माण से होती है। बच्चों की शिक्षा में निवेश के साथ उनके व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण पर ध्यान देना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
राजारामजी महाराज की पुण्यतिथि पर आयोजित यह कार्यक्रम श्रद्धा और भक्ति के साथ-साथ समाज के भविष्य को लेकर चिंतन का अवसर भी बना। मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान और शिक्षा-संस्कार पर दिया गया संदेश समाज में सकारात्मक दिशा का संकेत माना गया।
आयोजन के माध्यम से समाजबंधुओं ने संत राजारामजी महाराज के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने और समाज में सेवा, शिक्षा, संस्कार तथा सद्भाव की भावना मजबूत करने का संदेश दिया।
उडुपी में आयोजित राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि ने धार्मिक आस्था के साथ शिक्षा और संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका को सामने रखा। रात्रि जागरण, प्रसादी और मेधावी विद्यार्थियों के सम्मान ने आयोजन को भावनात्मक एवं सामाजिक रूप से सार्थक बनाया।
कार्यक्रम में हरीश चौधरी का शिक्षा-संस्कार पर दिया गया संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण और संस्कारों का विकास भी उतना ही जरूरी है। यही संतुलन परिवार, समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बन सकता है।
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