top of page

 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

WhatsApp Video 2026-10-04 at 8.50.36 PM.mp4

इस साइट पर खोजें

1905किसी भी खाली खोज के साथ परिणाम मिले

  • मैसूर रोड होस गुड्डाहल्ली में गणेश उत्सव का आयोजन, विशेष अतिथि महेंद्र मुणोत सम्मानित

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 29 सितंबर 2026। मैसूर रोड स्थित होस गुड्डाहल्ली क्षेत्र में स्थानीय नागरिकों की ओर से गणेश उत्सव कार्यक्रम का आयोजन श्रद्धा एवं उत्साह के साथ किया गया। कार्यक्रम में क्षेत्र के नागरिकों और आयोजन समिति से जुड़े लोगों ने भाग लेकर भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की तथा उत्सव की परंपराओं के अनुरूप धार्मिक कार्यक्रमों में सहभागिता की। कार्यक्रम में विशेष अतिथि महेंद्र मुणोत का आयोजकों की ओर से सम्मान किया गया। इस अवसर पर आयोजकों ने उन्हें सम्मानित करते हुए गणेश उत्सव के आयोजन में सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। नागरिकों ने उत्साह से लिया हिस्सा गणेश उत्सव के दौरान क्षेत्र के नागरिकों ने सामूहिक रूप से कार्यक्रम में भाग लिया। आयोजकों ने कहा कि ऐसे धार्मिक एवं सामाजिक आयोजन स्थानीय लोगों को एक साथ जोड़ने के साथ आपसी सौहार्द और सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा देते हैं। कार्यक्रम के दौरान गणेश भगवान की आराधना और धार्मिक गतिविधियों के साथ उपस्थित लोगों ने उत्सव की खुशियां साझा कीं। आयोजकों एवं नागरिकों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। समाचार प्रेषक : उपेन्द्र कुमार, बेंगलुरु

  • जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पारित, भाजपा का वॉकआउट

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com श्रीनगर, 28 सितंबर 2026। जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने सोमवार को केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव को सदन में ध्वनिमत से पारित किया गया। प्रस्ताव पारित होने के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों ने विरोध जताते हुए सदन से वॉकआउट किया। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की गई है तथा इसे भारत सरकार को भेजने का निर्णय लिया गया। प्रस्ताव में विधानसभा द्वारा वर्ष 2000 और नवंबर 2024 में पारित किए गए पूर्व प्रस्तावों का भी उल्लेख किया गया है। प्रस्ताव की भाषा पर सदन में मतभेद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी बहस हुई। भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव में पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति और पुराने प्रस्तावों के संदर्भों पर आपत्ति जताई। रिपोर्टों के अनुसार भाजपा का कहना था कि पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग और वर्ष 2019 से पहले की संवैधानिक स्थिति से जुड़े संदर्भों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। चर्चा के दौरान कई सदस्यों की ओर से प्रस्ताव में विशेष दर्जे और अनुच्छेद 370 से संबंधित संदर्भ जोड़ने के लिए संशोधन भी पेश किए गए। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कुल 10 संशोधन प्रस्तावित किए गए, जिनमें आठ संशोधनों का उद्देश्य प्रस्ताव में अगस्त 2019 से पहले के विशेष दर्जे से संबंधित संदर्भ शामिल करना था। मुख्यमंत्री ने संशोधनों को वापस लेने की अपील की मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चर्चा के दौरान ऐसे संशोधनों को वापस लेने की अपील की और कहा कि इस विषय से संबंधित प्रस्ताव विधानसभा पहले ही पारित कर चुकी है। इसके बाद प्रस्ताव को मतदान के लिए रखा गया और ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। भाजपा विधायक मतदान से पहले सदन से बाहर चले गए। इससे पहले भी प्रस्ताव को लेकर सदन में विरोध और हंगामे की स्थिति बनी थी। भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव की प्रक्रिया तथा उसमें शामिल संदर्भों पर आपत्ति जताई थी। सोमवार को भी विरोध जारी रहा और अंततः प्रस्ताव पारित होने से पहले भाजपा सदस्यों ने वॉकआउट किया। प्रस्ताव अब केंद्र सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। विधानसभा की कार्यवाही पूरी होने के बाद सदन को मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर को अगस्त 2019 में पुनर्गठन के बाद केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। वर्तमान प्रस्ताव इसी पृष्ठभूमि में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की विधानसभा की मांग को दोहराता है। विधानसभा में हुई बहस से यह भी स्पष्ट हुआ कि पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग पर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद मुख्यतः प्रस्ताव की भाषा और उसमें शामिल पुराने संवैधानिक एवं राजनीतिक संदर्भों को लेकर हैं। प्रस्ताव पारित होने के बाद अब आगे की प्रक्रिया केंद्र सरकार के स्तर पर होगी।

  • तृणमूल के नाम और चुनाव चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, 4 सप्ताह में दलीलें पूरी करने को कहा

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com संवाददाता अशोक कुमार सिंह नई दिल्ली, 28 सितंबर 2026। तृणमूल कांग्रेस के नाम और आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्वाचन आयोग के लिए निर्णय की समयसीमा तय कर दी। अदालत ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी दलीलें, जवाब और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद निर्वाचन आयोग को तीन महीने के भीतर विवाद पर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। यह मामला ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल को लेकर दो गुटों के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर किसी गुट के पक्ष में पार्टी के नाम या चुनाव चिन्ह पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अदालत ने विवाद का अंतिम निर्धारण निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के माध्यम से करने का रास्ता स्पष्ट किया है। चार सप्ताह में पूरी करनी होगी दलीलें सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों को निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी pleadings यानी दलीलें और दस्तावेज चार सप्ताह के भीतर पूरा करने को कहा है। इसके बाद आयोग को तीन महीने में मामले पर फैसला करना होगा। इस तरह पूरी प्रक्रिया के लिए अदालत ने लगभग चार महीने की समयसीमा निर्धारित की है। मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने निर्वाचन आयोग के अंतरिम आदेश और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिन्ह से संबंधित विवाद का मुद्दा था। निर्वाचन आयोग ने मूल नाम और चिन्ह पर लगाई है रोक निर्वाचन आयोग ने 17 सितंबर के अपने अंतरिम आदेश में विवाद के अंतिम निपटारे तक दोनों गुटों के लिए मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी। आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह उपलब्ध कराने की प्रक्रिया अपनाई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अंतरिम व्यवस्था के तहत एक गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चिन्ह, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिन्ह आवंटित किया गया है। यह व्यवस्था विवाद के अंतिम निर्णय तक चुनावी प्रक्रिया के संदर्भ में लागू है। अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब दोनों पक्षों को निर्वाचन आयोग के समक्ष अपने दावे और दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। आयोग इन प्रस्तुतियों और संबंधित साक्ष्यों पर विचार करने के बाद तय समयसीमा में अपना निर्णय देगा। अदालत के निर्देश से यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान अंतरिम व्यवस्था को पार्टी के नाम या चुनाव चिन्ह पर अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। विवाद का अंतिम निर्धारण निर्वाचन आयोग द्वारा संबंधित चुनावी नियमों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किया जाना है। आगामी उपचुनावों की पृष्ठभूमि में मामला अहम पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव प्रस्तावित हैं। इन चुनावों के लिए दोनों गुटों के उम्मीदवारों को अंतरिम रूप से अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के तहत चुनाव लड़ने की व्यवस्था की गई है। मतगणना 9 अक्टूबर को प्रस्तावित है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद फिलहाल उपचुनावों के लिए लागू अंतरिम व्यवस्था बनी रहेगी, जबकि पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह पर अंतिम निर्णय निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद सामने आएगा।

  • एशियन गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन, पीएम मोदी ने पदक विजेताओं को दी बधाई

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com संवाददाता अशोक कुमार सिंह नई दिल्ली, 28 सितंबर 2026। एशियन गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों के पदक अभियान को रविवार को नई उपलब्धियां मिलीं। एथलेटिक्स और स्क्वैश में भारतीय खिलाड़ियों ने कुल सात पदक अपने नाम किए। इस प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदक विजेता खिलाड़ियों को बधाई देते हुए उनके प्रदर्शन, मेहनत और उपलब्धियों की सराहना की। स्क्वैश में अनाहत सिंह और अभय सिंह ने महिला एवं पुरुष एकल स्पर्धाओं में रजत पदक हासिल किया। अनाहत सिंह एशियन गेम्स में महिला एकल स्क्वैश में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। अभय सिंह ने भी पुरुष एकल में रजत पदक हासिल किया। एथलेटिक्स में भी भारत का प्रभावी प्रदर्शन एथलेटिक्स में एंसी सोजन ने महिलाओं की लंबी कूद में रजत पदक जीता। उन्होंने 6.53 मीटर की छलांग लगाई और स्वर्ण पदक से केवल दो सेंटीमीटर पीछे रहीं। प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी उपलब्धि पर बधाई देते हुए उनके प्रदर्शन को सराहा। महिलाओं की 200 मीटर दौड़ में हरिता भद्रा ने कांस्य पदक हासिल किया। यह उनका एशियन गेम्स में पदार्पण भी था। प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए उनके आत्मविश्वास और प्रदर्शन की सराहना की। पुरुषों की ऊंची कूद में सरवेश कुशारे ने 2.25 मीटर की छलांग के साथ रजत पदक जीता। उनकी उपलब्धि से पुरुष ऊंची कूद में भारत का लंबे अंतराल के बाद एशियन गेम्स पदक का इंतजार समाप्त हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे भारतीय एथलेटिक्स के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि बताया। तेजस्विन और पारुल ने भी जीते कांस्य एथलेटिक्स में तेजस्विन शंकर ने पुरुष डेकाथलॉन में कांस्य पदक हासिल किया। उन्होंने 7,934 अंक के साथ स्पर्धा पूरी की। वहीं पारुल चौधरी ने महिलाओं की 3,000 मीटर स्टीपलचेज में कांस्य पदक जीता और व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ पोडियम पर जगह बनाई। प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों खिलाड़ियों को भी बधाई दी। भारतीय पदक अभियान जारी 27 सितंबर तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत के खाते में एशियन गेम्स में 37 पदक आ चुके थे, जिनमें चार स्वर्ण, 16 रजत और 17 कांस्य शामिल थे। खेलों में भारतीय दल की विभिन्न स्पर्धाओं में भागीदारी जारी है और आने वाले मुकाबलों में पदक तालिका में और बदलाव संभव है। प्रधानमंत्री की ओर से खिलाड़ियों को दी गई बधाई में उनके व्यक्तिगत प्रदर्शन और उपलब्धियों का उल्लेख किया गया। इस बीच भारतीय खिलाड़ी विभिन्न खेलों में आगे की स्पर्धाओं के लिए मैदान में उतर रहे हैं।

  • अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान सुभाष राय और लीलाधर मंडलोई को, नारायण साव व सीमा मिश्र भी सम्मानित होंगे

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। बेंगलुरु की हिंदी रचनाकारों की साहित्यिक संस्था ‘शब्द’ ने वर्ष 2026 के अपने प्रतिष्ठित पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। संस्था के अध्यक्ष डॉ. श्रीनारायण समीर की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार ‘अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान’ इस वर्ष संयुक्त रूप से जीवनीकार सुभाष राय और कवि-लेखक लीलाधर मंडलोई को प्रदान किया जाएगा। वहीं ‘दक्षिण भारत शब्द हिंदी सेवी सम्मान’ के लिए भाषा-सेवी नारायण साव तथा प्रथम ‘राजस्थान गौरव पुरस्कार’ के लिए जयपुर की लोक गायिका सीमा मिश्र का चयन किया गया है। एक लाख रुपये का ‘अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान’ सुभाष राय को उनकी कृति ‘दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी’ तथा लीलाधर मंडलोई को उनकी आत्मकथा ‘जब से आँख खुली हैं’ के लिए दिया जाएगा। दोनों साहित्यकारों को पुरस्कार स्वरूप 51-51 हजार रुपये के साथ पारंपरिक मैसूर पेटा, स्मृति चिह्न, श्रीफल और अंगवस्त्रम् प्रदान किए जाएंगे। नारायण साव को हिंदी सेवा सम्मान ‘शब्द’ के दूसरे प्रतिष्ठित सम्मान ‘दक्षिण भारत शब्द हिंदी सेवी सम्मान’ के लिए इस वर्ष नारायण साव का चयन किया गया है। उन्हें सम्मान प्रतीकों के साथ 25 हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी। यह राशि बेंगलुरु और चेन्नई से प्रकाशित ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ अखबार समूह के सौजन्य से दी जाएगी। सीमा मिश्र को पहला राजस्थान गौरव पुरस्कार डॉ. श्रीनारायण समीर ने बताया कि ‘शब्द’ की ओर से अब प्रत्येक वर्ष एक लाख रुपये का ‘राजस्थान गौरव पुरस्कार’ भी प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान राजस्थान में कला, संस्कृति, संगीत, समाजसेवा आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली किसी एक हस्ती को दिया जाएगा। इस पुरस्कार की शुरुआत जयपुर की प्रसिद्ध लोक गायिका सीमा मिश्र को सम्मानित करके की जाएगी। ‘अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान’ और ‘राजस्थान गौरव पुरस्कार’ की नकद राशि बेंगलुरु के समाजसेवी एवं अज्ञेय साहित्य के मर्मज्ञ बाबूलाल गुप्ता और देविका गुप्ता के फाउंडेशन के सौजन्य से प्रदान की जाएगी। 10 जनवरी 2027 को होगा पुरस्कार समारोह सभी पुरस्कार 10 जनवरी 2027 को बेंगलुरु में आयोजित ‘शब्द’ के वार्षिकोत्सव-सह-पुरस्कार अर्पण समारोह में प्रदान किए जाएंगे। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार इस वर्ष ‘अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान’ के लिए 53 प्रविष्टियां और ‘दक्षिण भारत शब्द हिंदी सेवी सम्मान’ के लिए 11 प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं। प्राप्त प्रविष्टियों पर समग्र विचार के बाद बाबूलाल गुप्ता, श्रीकांत पाराशर, नलिनी पोपट, डॉ. उषारानी राव और डॉ. श्रीनारायण समीर के निर्णायक मंडल ने सर्वसम्मति से पुरस्कार विजेताओं का चयन किया। चयन में संबंधित रचनात्मक कार्यों के मूल्यांकन के साथ साहित्य और भाषा के क्षेत्र में अब तक के योगदान को भी आधार बनाया गया। निर्णायक मंडल की संस्तुति के अनुसार सुभाष राय ने अक्क महादेवी के जीवन और उनके वचनों के हिंदी भावांतरण के माध्यम से स्त्री जीवन की पीड़ा और विद्रोह को साहित्यिक विमर्श में प्रमुखता देने का कार्य किया। वहीं लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा में विस्थापित खान-मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के संघर्षों को व्यापक रूप में प्रस्तुत किए जाने को उल्लेखनीय माना गया। मंडल के अनुसार नारायण साव का दक्षिण क्षेत्र तथा हिंदीतर प्रदेशों के विभिन्न प्रतिष्ठानों के कामकाज में हिंदी को प्रभावी भाषा बनाने में योगदान रहा है। वहीं सीमा मिश्र की लोक गायकी को राजस्थान और सीमावर्ती गुजरात के मरुक्षेत्र के लोकजीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में रेखांकित किया गया है।

  • भजनों से गूंजा पैलेस ग्राउंड, श्री शांतिनाथजी महाराज की पुण्यतिथि पर उमड़ी श्रद्धा

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। राजस्थान राजपूत संघ, बेंगलुरु की ओर से श्री श्री 1008 पीर श्री शांतिनाथजी महाराज की 14वीं पुण्यतिथि के अवसर पर पैलेस ग्राउंड गेट नंबर 6 पर भव्य जागरण का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया और श्री शांतिनाथजी महाराज के दर्शन कर भक्ति कार्यक्रम का लाभ लिया। जागरण के लाभार्थी श्री शांतिनाथजी भक्त मंडल रहे। इस अवसर पर भक्त मंडल की ओर से राजस्थान राजपूत संघ का सम्मान किया गया। संघ के पदाधिकारियों ने सम्मान के लिए भक्त मंडल का आभार व्यक्त करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। भक्ति गीतों से भक्तिमय हुआ माहौल जागरण में राजस्थान के प्रसिद्ध गायक कलाकार जोगभारती और गीता गोस्वामी ने श्री नाथजी महाराज की महिमा का गुणगान करते हुए भक्ति गीतों की प्रस्तुतियां दीं। भजनों के दौरान पंडाल में श्रद्धालु भाव-विभोर नजर आए। नाथजी महाराज के जयकारों से आयोजन स्थल का वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं ने देर तक भक्ति संगीत और भजनों का आनंद लिया। संघ के पदाधिकारियों और सदस्यों ने संभाली जिम्मेदारी कार्यक्रम में राजस्थान राजपूत संघ के अध्यक्ष सुजानसिंह भाटी, उपाध्यक्ष चेलसिंह दहिया एवं जबरसिंह देवल, सचिव पुरणसिंह राणावत, कोषाध्यक्ष चोपसिंह चौहान, सहसचिव चंदनसिंह चौहान, सहकोषाध्यक्ष गणपतसिंह दहिया तथा मीडिया प्रभारी दलपतसिंह भायल सहित संघ के पदाधिकारी मौजूद रहे। कमेटी सदस्य भानसिंह, चंदनसिंह चौहान, महेंद्रसिंह राठौड़, मकनसिंह दहिया, हीरसिंह परमार, मेगसिंह दहिया, नरपतसिंह राठौड़, राजसिंह, चेलसिंह राणावत, गजेंद्रसिंह चौहान, कमलसिंह चौहान, पोकरसिंह भायल, चंदनसिंह राठौड़, भंवरसिंह सोलंकी एवं अर्जुनसिंह चौहान सहित अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे। संघ के सलाहकार मदनसिंह चौहान, भंवरसिंह चौहान, शंभूसिंह दहिया एवं जेतसिंह राठौड़ ने भी आयोजन में सहयोग किया। संघ की कार्यकारिणी ने जागरण को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। श्रद्धा के साथ दिखी सामाजिक एकजुटता आयोजन के दौरान धार्मिक श्रद्धा के साथ समाज की एकजुटता और आपसी भाईचारे की भावना भी देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने श्री शांतिनाथजी महाराज की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए श्रद्धा व्यक्त की। कार्यक्रम के समापन पर राजस्थान राजपूत संघ की ओर से श्री शांतिनाथजी भक्त मंडल, गायक कलाकारों, सहयोगकर्ताओं और उपस्थित श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया। समाचार प्रेषक: दलपतसिंह भायल, बेंगलुरु।

  • कुमावत नाम को स्वतंत्र रूप से दर्ज करने की मांग, राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। कुमावत समाज की ओर से सोमवार को कर्नाटक के राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर सरकारी अभिलेखों में ‘कुमावत’ नाम को स्वतंत्र रूप से दर्ज एवं शामिल करने की मांग की गई। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड, जाति प्रमाण-पत्र और जनगणना सहित विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में समुदाय के लोगों को अपना नाम दर्ज कराने के दौरान कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। समाज के पदाधिकारियों ने ज्ञापन के माध्यम से मांग रखी कि ‘कुमावत’ नाम को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में स्वतंत्र प्रविष्टि के रूप में दर्ज करने की दिशा में आवश्यक प्रक्रिया अपनाई जाए, जिससे समुदाय के लोगों को दस्तावेजी और प्रशासनिक स्तर पर होने वाली परेशानियों से राहत मिल सके। राज्य सरकार को सूचित करने का आश्वासन समाज प्रतिनिधियों के अनुसार, ज्ञापन पर राज्यपाल की ओर से मामले को राज्य सरकार के संज्ञान में लाने तथा निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई की दिशा में प्रयास किए जाने का आश्वासन दिया गया। हालांकि, कर्नाटक की सरकारी सूचियों में किसी समुदाय की OBC स्थिति या प्रविष्टि का निर्धारण संबंधित सरकारी प्रक्रिया और अधिसूचनाओं के आधार पर होता है। समाज के प्रतिनिधि रहे मौजूद ज्ञापन सौंपने के अवसर पर कुमावत समाज के विभिन्न पदाधिकारी एवं समाजबंधु उपस्थित रहे। इनमें मयलसंद्रा के पूर्व अध्यक्ष गोवर्धनलाल दुबलदिया, अध्यक्ष ओमप्रकाश गुगान, कुमावत समाज बैंगलोर सिटी कोटनपेट के अध्यक्ष जीवाराम कूमियाल, कुमावत समाज मार्गुण्डनहल्ली के अध्यक्ष नरेन्द्र गोयल तथा कुमावत क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव प्रकाश मावर सहित अन्य समाज प्रतिनिधि शामिल रहे। समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि ज्ञापन के माध्यम से उठाई गई मांग का उद्देश्य समुदाय के लोगों को स्कूल, जाति प्रमाण-पत्र, जनगणना और अन्य सरकारी दस्तावेजों में नाम दर्ज कराने से जुड़ी समस्याओं से राहत दिलाना है। उन्होंने इसे समाज की लंबे समय से चली आ रही दस्तावेजी एवं प्रशासनिक समस्याओं के समाधान की दिशा में एक प्रयास बताया। समाचार प्रेषक: प्रकाश कुमावत, बेंगलुरु।

  • कर्नाटक के सूखे की जमीनी पड़ताल 3 अक्टूबर से, तीन केंद्रीय दल करेंगे प्रभावित क्षेत्रों का दौरा

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। कर्नाटक में सूखे की स्थिति और फसल नुकसान का जमीनी आकलन करने के लिए केंद्र सरकार की तीन अंतर-मंत्रालयी टीमें 3 अक्टूबर से राज्य के प्रभावित जिलों का दौरा करेंगी। केंद्रीय दल 3 से 6 अक्टूबर तक विभिन्न क्षेत्रों में जाकर फसल नुकसान, जल उपलब्धता और सूखे से उत्पन्न परिस्थितियों का प्रत्यक्ष जायजा लेंगे। केंद्र सरकार की ओर से गठित इन दलों का उद्देश्य राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और जमीनी स्थिति का आकलन करना है। 177 तालुक सूखा प्रभावित घोषित कर्नाटक सरकार ने राज्य के कुल 240 तालुकों में से 177 को सूखा प्रभावित घोषित किया है। वहीं करीब 50 अन्य तालुकों में जमीनी सत्यापन की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में केंद्रीय दल का दौरा सूखे के प्रभाव की वास्तविक स्थिति सामने लाने और संभावित केंद्रीय सहायता के आकलन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य सरकार ने सूखे से हुए नुकसान और राहत की आवश्यकता को लेकर केंद्र को ज्ञापन भी सौंपा है। केंद्रीय टीम इसी पृष्ठभूमि में प्रभावित क्षेत्रों की परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अध्ययन करेगी। तीन दल, अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचेंगे केंद्रीय टीमों को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाएगा। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार पहला दल तुमकुरु, चित्रदुर्ग, दावणगेरे और विजयनगर जिलों का दौरा करेगा। दूसरा दल हासन, मैसूरु और चामराजनगर में सूखे की स्थिति का आकलन करेगा। मंड्या को भी इसमें शामिल किए जाने की संभावना है, विशेष रूप से कृष्णराज सागर (केआरएस) जलाशय में पानी की स्थिति को देखने के लिए। तीसरा दल उत्तर कर्नाटक के यादगीर, रायचूर, बागलकोट और कोप्पल जिलों का दौरा करेगा। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार दलों का 3 से 6 अक्टूबर तक मौके पर जाकर आकलन करने का कार्यक्रम है। खेतों और जल स्रोतों की होगी पड़ताल केंद्रीय दल प्रभावित क्षेत्रों में खेतों का निरीक्षण करने के साथ फसल नुकसान और पानी की उपलब्धता का जायजा लेगा। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों के अधिकारियों से भी सूखे की स्थिति, कृषि नुकसान तथा किसानों की समस्याओं के संबंध में जानकारी ली जाएगी। इस प्रत्यक्ष आकलन के बाद केंद्रीय दल अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेगा। रिपोर्ट में सामने आने वाली स्थिति राज्य के लिए राहत और सहायता की आवश्यकता के आकलन में महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। जल संकट और कृषि पर दोहरा दबाव कर्नाटक में बारिश की कमी और जल उपलब्धता से जुड़ी परिस्थितियों ने कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ाया है। राज्य सरकार द्वारा लगातार प्रभावित क्षेत्रों की पहचान और जमीनी सत्यापन किया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री एवं राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर के अनुसार केंद्रीय टीमों के दौरे के बाद राज्य की ओर से केंद्र के समक्ष आगे की मांग और ज्ञापन की प्रक्रिया भी जारी रहेगी। केंद्रीय टीम की रिपोर्ट से यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि सूखे का वास्तविक प्रभाव किन क्षेत्रों और कितनी कृषि भूमि पर पड़ा है तथा प्रभावित किसानों और क्षेत्रों के लिए किस स्तर की सहायता की आवश्यकता है।

  • बेंगलुरु में ट्रैफिक का दबाव सोसायटी के गेट तक, बाहर निकलने में लगा आधा घंटा

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। बेंगलुरु की ट्रैफिक समस्या अब केवल प्रमुख सड़कों और चौराहों तक सीमित रहने की चर्चा नहीं है। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने आवासीय परिसरों के भीतर वाहनों की आवाजाही पर भी ध्यान खींचा है। वीडियो में एक आवासीय सोसायटी के परिसर के अंदर कारों की लंबी कतार दिखाई दे रही है, जहां वाहन धीमी गति से आगे बढ़ते नजर आते हैं। वीडियो साझा करने वाली महिला के अनुसार, दोपहर के समय कुछ लोगों को सोसायटी के भीतर से मुख्य गेट तक पहुंचने और परिसर से बाहर निकलने में करीब 30 मिनट तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि, वीडियो में दिखाई गई स्थिति एक विशेष आवासीय परिसर से संबंधित है और इसके आधार पर पूरे बेंगलुरु की सभी सोसायटियों की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सोसायटी के भीतर भी वाहनों का दबाव वीडियो में बड़ी संख्या में कारें एक-दूसरे के पीछे खड़ी दिखाई देती हैं। वाहनों की धीमी रफ्तार के कारण परिसर के अंदर ही लंबी कतार बन गई। सामान्य तौर पर आवासीय सोसायटियों के प्रवेश और निकास द्वार मुख्य सड़कों से जुड़े होते हैं। ऐसे में बाहर की सड़क पर यातायात का दबाव बढ़ने पर उसका असर गेट के आसपास की आंतरिक आवाजाही पर भी पड़ सकता है। बेंगलुरु में रोजाना बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों से कार्यालयों, व्यावसायिक क्षेत्रों और अन्य स्थानों तक आवागमन करते हैं। प्रमुख मार्गों पर यातायात का दबाव बढ़ने की स्थिति में कई बार आसपास के संपर्क मार्गों और आवासीय इलाकों पर भी इसका प्रभाव दिखाई देता है। यातायात प्रबंधन पर फिर चर्चा सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के बाद शहर के यातायात प्रबंधन और बढ़ते वाहन दबाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। बेंगलुरु जैसे तेजी से विस्तार करते महानगर में आवासीय क्षेत्रों, मुख्य सड़कों और सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क के बीच बेहतर समन्वय को यातायात व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल सड़कों का विस्तार ही यातायात दबाव का स्थायी समाधान नहीं है। सार्वजनिक परिवहन की पहुंच, अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग और यातायात का प्रभावी प्रबंधन भी शहर की गतिशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बढ़ते शहर के साथ बढ़ती चुनौती बेंगलुरु में नए आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे हैं। इसके साथ ही निजी वाहनों की संख्या और दैनिक आवागमन भी बढ़ रहा है। ऐसे में सोसायटियों के प्रवेश-निकास, आसपास की सड़कों और मुख्य यातायात मार्गों के बीच बेहतर योजना की आवश्यकता और महत्वपूर्ण हो जाती है। आवासीय परिसर से मुख्य सड़क तक पहुंचने में लगने वाला अतिरिक्त समय भले ही स्थानीय स्तर की समस्या हो, लेकिन यह शहर की व्यापक यातायात व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों की ओर संकेत कर सकता है। इस दिशा में यातायात प्रवाह, सार्वजनिक परिवहन और शहरी नियोजन के बीच बेहतर तालमेल पर ध्यान देना आवश्यक है। फिलहाल वायरल वीडियो में दिखाई गई स्थिति को एक स्थानीय घटना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। फिर भी यह घटना इस सवाल को जरूर सामने लाती है कि महानगर में यातायात का दबाव बढ़ने के साथ क्या शहर की आंतरिक और बाहरी कनेक्टिविटी उसी गति से विकसित हो रही है।

  • छठ पूजा की तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार, आयोजन समिति का गठन; 15-16 नवंबर को होगा महोत्सव

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 28 सितंबर 2026। लोक आस्था और सूर्य उपासना के महापर्व छठ पूजा महोत्सव 2026 के आयोजन की तैयारियों को लेकर भोजपुरी समाज सेवा समिति (रजि.), बेंगलुरु की विशेष बैठक इंदिरानगर स्थित प्रधान कार्यालय में हुई। बैठक में आगामी 15 एवं 16 नवंबर 2026 को प्रस्तावित छठ पूजा महोत्सव के आयोजन को लेकर विभिन्न व्यवस्थाओं और तैयारियों पर चर्चा की गई। समिति के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह उज्जैन ने छठ पूजा आयोजन कमेटी के गठन को अंतिम रूप देते हुए राजेश सिंह सिकरवार को आयोजन कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। बैठक में कोर टीम के सदस्यों ने महोत्सव को सुव्यवस्थित एवं व्यापक स्तर पर आयोजित करने के लिए आवश्यक तैयारियों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में अनुपस्थित सदस्यों से दूरभाष के माध्यम से संपर्क कर लिए गए निर्णयों की जानकारी दी गई तथा आगामी प्रत्येक रविवार को होने वाली तैयारियों संबंधी बैठकों में सहभागिता का आग्रह किया गया। पदाधिकारियों को जिम्मेदारियों के बेहतर निर्वहन का आह्वान संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह उज्जैन ने समिति के वर्तमान पदाधिकारियों के कार्यों की समीक्षा करते हुए सभी से अपनी जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने और आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। समिति के महासचिव एल.पी. सिंह और सचिव गिरीश पांडेय ने भी छठ पूजा महोत्सव की तैयारियों को लेकर अपने सुझाव प्रस्तुत किए। आयोजन समिति का विस्तार छठ पूजा आयोजन कमेटी के अध्यक्ष राजेश सिंह सिकरवार ने आगामी महोत्सव की तैयारियों और प्रस्तावित कार्यक्रमों की रूपरेखा बैठक के समक्ष रखी। आयोजन को अधिक व्यापक और व्यवस्थित बनाने के लिए कमेटी में सदस्यों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। महोत्सव की विभिन्न व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदारियां इस प्रकार सौंपी गईं— प्रवीन पांडेय : संयोजक एवं आईटी प्रभारी, मृत्युंजय कुमार एवं ललित नारायण झा : फंड प्रबंधन,निर्मल कुमार : सुरक्षा प्रबंधन,यू.पी. शर्मा: लॉजिस्टिक्स प्रबंधन सामूहिक सहयोग से आयोजन का संकल्प बैठक के समापन पर संजय सिंह उज्जैन ने नवगठित टीम को शुभकामनाएं देते हुए सामूहिक सहयोग, समर्पण और अनुशासन के साथ छठ पूजा महोत्सव को सफल बनाने का आह्वान किया। उन्होंने भोजपुरी समाज, समिति के सदस्यों, सहयोगियों और श्रद्धालुओं से आयोजन में सक्रिय सहभागिता की अपील की। इस अवसर पर उपस्थित वरिष्ठ सदस्यों एवं समाजसेवियों ने महोत्सव के आयोजन के लिए अपनी ओर से सहयोग राशि देने की घोषणा भी की। समिति ने विश्वास जताया कि समाज की सामूहिक सहभागिता से छठ पूजा महोत्सव श्रद्धा, सेवा, संस्कार और सामाजिक एकता का अवसर बनेगा। समाचार प्रेषक: संजय कुमार सिंह उज्जैन, बेंगलुरु।

  • डीप स्टेट की चर्चा: साजिश, सत्ता और सत्य के बीच कितनी दूरी?

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com राजनीतिक शब्दावली में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपने अर्थ से अधिक अपने प्रभाव के कारण चर्चा में आते हैं। “डीप स्टेट” भी ऐसा ही शब्द है। पिछले कुछ वर्षों में यह शब्द अमेरिका की राजनीति से निकलकर भारत सहित दुनिया के कई देशों की राजनीतिक बहस का हिस्सा बना है। कभी इसे सरकारी तंत्र के भीतर मौजूद कथित प्रभावशाली नेटवर्क के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो कभी विदेशी हस्तक्षेप या किसी सरकार को अस्थिर करने की कथित रणनीति से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में मूल प्रश्न यह है कि इस शब्द के पीछे वास्तविक संस्थागत गतिविधियां कितनी हैं और राजनीतिक दावों की भूमिका कितनी? “डीप स्टेट” की अवधारणा सामान्यतः निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व से बाहर मौजूद ऐसे अधिकारियों, सुरक्षा संस्थानों या प्रभावशाली समूहों के कथित नेटवर्क के संदर्भ में इस्तेमाल होती है, जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हों। हालांकि, यह कोई ऐसी सार्वभौमिक और स्पष्ट कानूनी श्रेणी नहीं है जिसे हर देश में एक समान अर्थ में परिभाषित किया जा सके। अमेरिकी राजनीति में यह शब्द अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में अलग अर्थों में इस्तेमाल हुआ है। भारत में क्यों बढ़ी चर्चा? दिसंबर 2024 में भारत में “डीप स्टेट” शब्द विशेष रूप से राजनीतिक चर्चा में आया, जब भारतीय जनता पार्टी ने अमेरिकी विदेश विभाग और कथित “डीप स्टेट” तत्वों पर भारत को अस्थिर करने का आरोप लगाया। यह आरोप अमेरिकी वित्तीय सहायता और खोजी पत्रकारिता संगठन OCCRP से जुड़े विवाद के संदर्भ में लगाया गया था। OCCRP ने अपने संपादकीय काम को स्वतंत्र बताते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार की कुछ फंडिंग का उसके संपादकीय निर्णयों पर नियंत्रण नहीं है। उस समय अमेरिकी विदेश विभाग, USAID और अन्य संबंधित पक्षों से भी प्रतिक्रियाएं मांगी गई थीं। यहां पत्रकारिता का पहला सिद्धांत सामने आता है—किसी संगठन को मिलने वाली आर्थिक सहायता और उसके संपादकीय निर्णयों के बीच संबंध का दावा अपने आप सिद्ध नहीं हो जाता। यदि किसी फंडिंग को राजनीतिक हस्तक्षेप का प्रमाण बताया जा रहा है, तो यह देखना आवश्यक है कि पैसा किस उद्देश्य के लिए दिया गया, उसका उपयोग कैसे हुआ और क्या उसके बाद किसी विशिष्ट निर्णय या गतिविधि को निर्देशित किया गया। केवल संबंध या फंडिंग का अस्तित्व किसी बड़े षड्यंत्र का स्वतः प्रमाण नहीं है। बांग्लादेश का संदर्भ और सवालों की राजनीति फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के दौरान बांग्लादेश में कथित अमेरिकी “डीप स्टेट” की भूमिका से संबंधित सवाल भी उठा था। उस संदर्भ में ट्रंप ने ऐसी भूमिका से इनकार किया था। दोनों देशों के नेताओं की बातचीत का व्यापक एजेंडा व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, रक्षा और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर केंद्रित था। इस घटना से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—किसी राजनीतिक दावे का अस्तित्व और उसका प्रमाणित होना दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक मंच पर आरोप लगना समाचार हो सकता है, लेकिन आरोप स्वयं तथ्य नहीं बन जाता। प्रमाण और संदेह के बीच की रेखा लोकतंत्र में सरकारों, सुरक्षा एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रभावशाली संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सत्ता से जुड़े किसी भी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही की जांच होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड, स्वतंत्र स्रोत और सत्यापन योग्य घटनाक्रम होना चाहिए। मसलन, यदि किसी विदेशी संस्था ने किसी देश में कोई परियोजना वित्तपोषित की है, तो यह पूछना उचित है कि उसका उद्देश्य क्या था। लेकिन उससे सीधे यह निष्कर्ष निकाल देना कि वह किसी सरकार को गिराने या चुनाव प्रभावित करने की गुप्त योजना का हिस्सा थी, तब तक उचित नहीं होगा जब तक उसके समर्थन में ठोस प्रमाण उपलब्ध न हों। फरवरी 2025 में USAID से संबंधित एक अन्य विवाद इसका उदाहरण है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से भारत में मतदाता भागीदारी के लिए 2.1 करोड़ डॉलर के कथित खर्च की बात सामने आई और भारत सरकार ने मामले की समीक्षा की बात कही। बाद में रिपोर्टों में यह सवाल भी उठा कि जिस राशि को भारत से जोड़ा जा रहा था, वह वास्तव में पड़ोसी बांग्लादेश के लिए निर्धारित थी। यही कारण है कि पत्रकारिता में “कहा गया”, “दावा किया गया”, “दस्तावेज में दर्ज है” और “स्वतंत्र रूप से सत्यापित हुआ”—इन चारों वाक्यांशों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। सोशल मीडिया ने चुनौती बढ़ाई सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार की गति कई गुना बढ़ा दी है। किसी वीडियो के लाखों व्यूज, किसी पोस्ट पर हजारों प्रतिक्रियाएं या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का बयान किसी दावे की सत्यता का प्रमाण नहीं है। दूसरी ओर, किसी दावे को केवल इसलिए खारिज कर देना भी उचित नहीं कि वह असुविधाजनक या राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। यहीं पत्रकारिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकार को न तो सत्ता के दावे का स्वतः प्रवक्ता बनना चाहिए और न विरोधी दावे को स्वतः सत्य मानना चाहिए। उसका काम उपलब्ध प्रमाणों को सामने रखना, संबंधित पक्षों का पक्ष लेना और पाठक को यह बताना है कि कौन-सी बात प्रमाणित है, कौन-सी आरोपित है और कौन-सी अभी जांच के दायरे में है। लोकतंत्र में पारदर्शिता ही वास्तविक कसौटी “डीप स्टेट” की बहस को केवल षड्यंत्र सिद्धांत बनाम सरकारी दावे के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं है। असली प्रश्न संस्थागत पारदर्शिता का है। सरकारी संस्थाओं के निर्णय, विदेशी सहायता, राजनीतिक फंडिंग, लॉबिंग, सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां और सार्वजनिक धन के उपयोग पर लोकतांत्रिक निगरानी जितनी मजबूत होगी, उतनी ही अफवाहों और अप्रमाणित दावों की गुंजाइश कम होगी। सत्ता चाहे निर्वाचित सरकार के पास हो या प्रशासनिक संस्थाओं के पास, जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। अमेरिका में भी “डीप स्टेट” शब्द को लेकर सरकारी कर्मचारियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर राजनीतिक बहस हुई है; वहीं आलोचकों ने ऐसे आरोपों को प्रशासनिक संस्थाओं के राजनीतिकरण के संदर्भ में देखा है। संपादकीय दृष्टि “डीप स्टेट” जैसे शब्दों की लोकप्रियता यह बताती है कि जनता सत्ता के दिखाई देने वाले ढांचे के पीछे काम करने वाली संस्थाओं और प्रभावों को समझना चाहती है। यह लोकतांत्रिक जिज्ञासा सकारात्मक है। लेकिन जिज्ञासा को निष्कर्ष में बदलने से पहले प्रमाण जरूरी है। आज आवश्यकता किसी एक राजनीतिक पक्ष के दावे को स्वीकार करने की नहीं, बल्कि दावों की जांच करने की संस्कृति को मजबूत करने की है। दस्तावेज क्या कहते हैं? संबंधित संस्था का आधिकारिक पक्ष क्या है? स्वतंत्र स्रोत क्या बताते हैं? घटनाओं के बीच वास्तविक संबंध क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उपलब्ध प्रमाण उस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं? संपादकीय निष्कर्ष यही है कि “डीप स्टेट” पर बहस को न अंधविश्वास में बदलना चाहिए, न अंध-खंडन में। लोकतंत्र में आरोपों की जगह हो सकती है, संदेह की भी जगह हो सकती है, लेकिन अंतिम कसौटी प्रमाण और स्वतंत्र सत्यापन ही होना चाहिए। दावा अपनी जगह है, सत्ता अपनी जगह और राजनीति अपनी जगह—लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी इन सबसे ऊपर सत्यापन को रखना है।

  • UNSC में भारत की स्थायी सीट की दावेदारी को रूस का समर्थन

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com नई दिल्ली, 27 सितंबर 2026। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भारत की लंबे समय से चली आ रही दावेदारी को रूस का समर्थन मिला है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का समर्थन किया। उन्होंने परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की वकालत की। रूस ने भारत और ब्राजील की उम्मीदवारी का समर्थन किया 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन के दौरान लावरोव ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार का उद्देश्य वैश्विक दक्षिण के अधिक देशों को प्रतिनिधित्व देना होना चाहिए। रूस ने विशेष रूप से भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया। लावरोव ने साथ ही पश्चिमी देशों के लिए अतिरिक्त स्थायी सीटें देने का विरोध किया और जर्मनी तथा जापान का विशेष रूप से उल्लेख किया। रूस का रुख यह है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार व्यापक भौगोलिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य, पांच स्थायी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वर्तमान में 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन—हैं, जबकि 10 गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव महासभा द्वारा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए किया जाता है। स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार है। सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना को बदलने के लिए संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से सुधार की प्रक्रिया चल रही है। सुधार की प्रक्रिया अभी जारी संयुक्त राष्ट्र महासभा सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व और सदस्यता बढ़ाने के मुद्दे पर अंतर-सरकारी वार्ता जारी रखे हुए है। महासभा ने 81वें सत्र में भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय किया है। सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव केवल किसी एक देश के समर्थन से संभव नहीं है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया के तहत व्यापक सदस्य-समर्थन की आवश्यकता होती है। भारत के लिए अहम कूटनीतिक मुद्दा भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मौजूदा वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप अधिक प्रतिनिधिक बनाने की मांग करता रहा है। भारत की दावेदारी के समर्थन में अलग-अलग देशों और समूहों की ओर से समय-समय पर बयान सामने आते रहे हैं। रूस का ताजा समर्थन ऐसे समय आया है जब सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है। इससे पहले सितंबर में हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य वाले वीसग्राद समूह ने भी भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया था। व्यापक सहमति से ही आगे बढ़ेगा प्रस्ताव भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को रूस सहित कई देशों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन सुरक्षा परिषद के विस्तार का प्रश्न व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति से जुड़ा है। स्थायी सदस्यों की संख्या, नए सदस्यों के अधिकार और वीटो व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अलग-अलग देशों के रुख में अंतर बना हुआ है। इसलिए रूस का समर्थन भारत की दावेदारी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बयान जरूर है, लेकिन इससे सुरक्षा परिषद की संरचना में तत्काल बदलाव नहीं होता। सुधार प्रक्रिया में आगे की वार्ताएं और सदस्य देशों के बीच सहमति इस मुद्दे की दिशा तय करेंगी।

bottom of page