“मां, माटी, मानुष” की ताकत: भाजपा की चुनौती के बीच भी अडिग दीदी का जनाधार
- धन्ना राम चौधरी

- 1 अप्रैल
- 3 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का सफर केवल एक राजनीतिक उभार नहीं, बल्कि जनआंदोलनों से निकली उस ताकत की कहानी है जिसने राज्य की सियासत को नई दिशा दी। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनी टीएमसी आज लगभग 48 प्रतिशत वोट शेयर के साथ राज्य की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन चुकी है।
जनआंदोलनों से सत्ता तक का सफर
टीएमसी का राजनीतिक विस्तार सिंगुर और नंदीग्राम जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों से जुड़ा रहा है। वाम मोर्चा सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों के खिलाफ ममता बनर्जी के नेतृत्व में चले इन आंदोलनों ने राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल दी। साल 2011 में 34 वर्षों के वाम शासन का अंत हुआ, जिसके पीछे “मां, माटी, मानुष” का नारा जन-जन तक पहुंचा और सत्ता परिवर्तन का आधार बना।
शुरुआती संघर्ष और वापसी
स्थापना के बाद 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी ने क्रमशः 24.4 प्रतिशत और 26 प्रतिशत वोट हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उस समय ममता बनर्जी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा थीं और रेल मंत्री के रूप में कार्य कर रही थीं। हालांकि 2004 और 2006 का दौर पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। 2004 लोकसभा चुनाव में सीटें घटकर 1 रह गईं। 2006 विधानसभा में सीटें 60 से घटकर 30 पर आ गईं।
लेकिन इसी दौर के बाद सिंगुर-नंदीग्राम आंदोलनों के जरिए पार्टी ने जोरदार वापसी की।
2011: ऐतिहासिक जीत और सत्ता में स्थिरता
2009 के लोकसभा चुनाव में 19 सीटें जीतने के बाद टीएमसी ने 2011 विधानसभा चुनाव में 184 सीटों और करीब 39 प्रतिशत वोट शेयर के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके साथ ही ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद संभाला और तब से लगातार सत्ता में बनी हुई हैं।
बढ़ता वोट शेयर, मजबूत जनाधार
टीएमसी की खासियत यह रही कि कई चुनावों में सीटें घटने के बावजूद उसका वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता गया। 2019 लोकसभा चुनाव में सीटें 34 से घटकर 22 हुईं, लेकिन वोट शेयर बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया। 2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 47.9 प्रतिशत वोट और 213 सीटों के साथ रिकॉर्ड प्रदर्शन किया।
लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन (संक्षेप):
1998: 24.4 प्रतिशत | 1999: 26 प्रतिशत | 2004: 21 प्रतिशत | 2009: 31 प्रतिशत | 2014: 39 प्रतिशत | 2019: 43 प्रतिशत | 2024: 46 प्रतिशत
विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन:
2001: 30.7 प्रतिशत | 2006: 26.6 प्रतिशत | 2011: 38.9 प्रतिशत | 2016: 44.9 प्रतिशत | 2021: 47.9 प्रतिशत यह आंकड़े दर्शाते हैं कि पार्टी का जनाधार लगातार मजबूत हुआ है और ममता बनर्जी का व्यक्तिगत प्रभाव भी बढ़ा है।
भाजपा की चुनौती और भविष्य की राह
राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की है, जिससे टीएमसी के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हुई है। इसके बावजूद टीएमसी की मजबूती के पीछे महिला मतदाताओं और अल्पसंख्यक समुदायों का भरोसा महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने पार्टी के सामाजिक आधार को और मजबूत किया है। आज तृणमूल कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय अस्मिता का प्रतीक बन चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक ममता बनर्जी का सीधा संवाद जनता से बना रहेगा, तब तक उनके मजबूत गढ़ को भेदना किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान नहीं होगा।
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