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ऊपरी असम पर सियासी संग्राम तेज, पहचान की राजनीति के बीच बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 2 days ago
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

जोरहाट (असम)। असम में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है और विशेष रूप से ऊपरी असम क्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए निर्णायक रणभूमि बनकर उभरा है। 40 से अधिक विधानसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है। दोनों ही दल इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।


ऊपरी असम में इस बार चुनावी मुद्दे विकास से ज्यादा ‘पहचान’ और ‘अधिकार’ के इर्द-गिर्द घूमते नजर आ रहे हैं। बीजेपी जहां खुद को असमिया पहचान का रक्षक बताने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस सामाजिक संतुलन और गठबंधन के जरिए वापसी की रणनीति पर काम कर रही है।


बीजेपी की रणनीति: पहचान और जमीन का मुद्दा

राज्य की बीजेपी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अतिक्रमण हटाने के बड़े अभियान चलाए हैं। सरकारी और वन भूमि से करीब 1.5 लाख बीघा जमीन को मुक्त कराया गया है। इन अभियानों के दौरान लगभग 50 हजार लोगों को बेदखल किया गया, जिसे बीजेपी ‘कानून और व्यवस्था’ तथा ‘स्थानीय अधिकारों की रक्षा’ के रूप में पेश कर रही है। इसके अलावा मतदाता सूचियों में संशोधन और कथित फर्जी वोटरों की पहचान को भी पार्टी अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित कर रही है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ बीजेपी ने टिकट वितरण में भी बदलाव करते हुए करीब 19 विधायकों के टिकट काटे हैं।


कांग्रेस का गठबंधन दांव

दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस बार व्यापक गठबंधन के सहारे चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। पार्टी ने असम जातीय परिषद, रायजोर दल, वाम दलों—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)—और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस के साथ तालमेल किया है। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में ऊपरी असम में कांग्रेस को केवल 5 सीटों पर जीत मिली थी, जिससे उसकी स्थिति कमजोर मानी जा रही है।


नए खिलाड़ी और बदलता समीकरण

इस बार चुनावी मैदान में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। पार्टी ने 16 उम्मीदवार उतारे हैं, जिससे वोटों का बंटवारा होने की संभावना है। इसके अलावा, क्षेत्रीय दलों—रायजोर दल और असम जातीय परिषद—ने पिछले पांच वर्षों में अपनी जमीनी पकड़ मजबूत की है, जिससे पारंपरिक दलों की चुनौती बढ़ गई है।


दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर

असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई जोरहाट से चुनाव लड़ रहे हैं, जिसे ऊपरी असम का राजनीतिक केंद्र माना जाता है। वहीं अखिल गोगोई सिबसागर से मैदान में हैं, जिन्होंने पिछली बार जेल में रहते हुए जीत दर्ज की थी। खोवांग सीट पर लुरिनज्योति गोगोई और बीजेपी के चक्रधर गोगोई के बीच कड़ा मुकाबला है। दुलियाजान में कांग्रेस के ध्रुबा गोगोई और बीजेपी के वरिष्ठ नेता रामेश्वर तेली आमने-सामने हैं।नाहरकटिया सीट पर कांग्रेस, बीजेपी, वामपंथी दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।


क्यों अहम है ऊपरी असम?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ऊपरी असम न केवल सीटों की संख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां के चाय बागान श्रमिक, आदिवासी समुदाय और असमिया पहचान से जुड़े मुद्दे पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित करते हैं। पिछले एक दशक में इन वर्गों पर कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई है, जबकि बीजेपी ने संगठित तरीके से अपने जनाधार को मजबूत किया है। ऐसे में यह क्षेत्र आगामी चुनावों के परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।


कुल मिलाकर, ऊपरी असम इस बार चुनावी जंग का केंद्र बन गया है, जहां पहचान, जमीन और गठबंधन की राजनीति के बीच बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। आने वाले चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि इस रणनीतिक क्षेत्र में किसकी पकड़ मजबूत होती है और असम की सत्ता किसके हाथ में जाती है।

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