बंगाल चुनाव में वोटिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
- धन्ना राम चौधरी

- 13 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में आगामी चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू (SIR) के दौरान जिन लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें फिलहाल वोट डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस फैसले से राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
दरअसल, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए गए थे। इसके खिलाफ प्रभावित लोगों ने भारी संख्या में अपीलें दाखिल कीं। अदालत में पेश आंकड़ों के अनुसार, 11 अप्रैल तक लगभग 34 लाख से अधिक अपीलें दायर की जा चुकी हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई थी कि इन अपीलों के निपटारे तक संबंधित लोगों को मतदान का अधिकार दिया जाए, खासकर तब जब 23 अप्रैल 2026 को मतदान प्रस्तावित है। सुनवाई के दौरान पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने साफ कहा कि इस तरह की अनुमति देना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि अपील लंबित रहने के बावजूद मतदान की छूट दी जाती है, तो इससे अपीलीय ट्रिब्यूनलों पर असामान्य दबाव पड़ेगा और पूरी चुनावी प्रक्रिया अव्यवस्थित हो सकती है। मामले में राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि सूची से हटाए गए कई लोग वास्तविक मतदाता हैं और उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि जिनकी अपीलें 22 अप्रैल तक स्वीकार हो जाएं, उन्हें कम से कम मतदान का अवसर दिया जाए। हालांकि, अदालत ने इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि इससे व्यवस्था में और जटिलता उत्पन्न हो सकती है।
इस बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय से भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि बड़ी संख्या में दावों और आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है, लेकिन तकनीकी कारणों से कुछ मामले अभी लंबित हैं। इन मामलों के शीघ्र समाधान के लिए तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक समिति गठित की गई है, जो पूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का कार्य करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इस प्रक्रिया से जुड़े सभी न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष और व्यवस्थित चुनाव प्रक्रिया सर्वोच्च प्राथमिकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का सीधा असर लाखों मतदाताओं पर पड़ेगा और यह मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में रह सकता है। अब सबकी नजरें अपीलों के त्वरित निपटारे और चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
_edited.jpg)



टिप्पणियां