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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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  • डीप स्टेट की चर्चा: साजिश, सत्ता और सत्य के बीच कितनी दूरी?

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com राजनीतिक शब्दावली में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपने अर्थ से अधिक अपने प्रभाव के कारण चर्चा में आते हैं। “डीप स्टेट” भी ऐसा ही शब्द है। पिछले कुछ वर्षों में यह शब्द अमेरिका की राजनीति से निकलकर भारत सहित दुनिया के कई देशों की राजनीतिक बहस का हिस्सा बना है। कभी इसे सरकारी तंत्र के भीतर मौजूद कथित प्रभावशाली नेटवर्क के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो कभी विदेशी हस्तक्षेप या किसी सरकार को अस्थिर करने की कथित रणनीति से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में मूल प्रश्न यह है कि इस शब्द के पीछे वास्तविक संस्थागत गतिविधियां कितनी हैं और राजनीतिक दावों की भूमिका कितनी? “डीप स्टेट” की अवधारणा सामान्यतः निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व से बाहर मौजूद ऐसे अधिकारियों, सुरक्षा संस्थानों या प्रभावशाली समूहों के कथित नेटवर्क के संदर्भ में इस्तेमाल होती है, जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हों। हालांकि, यह कोई ऐसी सार्वभौमिक और स्पष्ट कानूनी श्रेणी नहीं है जिसे हर देश में एक समान अर्थ में परिभाषित किया जा सके। अमेरिकी राजनीति में यह शब्द अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में अलग अर्थों में इस्तेमाल हुआ है। भारत में क्यों बढ़ी चर्चा? दिसंबर 2024 में भारत में “डीप स्टेट” शब्द विशेष रूप से राजनीतिक चर्चा में आया, जब भारतीय जनता पार्टी ने अमेरिकी विदेश विभाग और कथित “डीप स्टेट” तत्वों पर भारत को अस्थिर करने का आरोप लगाया। यह आरोप अमेरिकी वित्तीय सहायता और खोजी पत्रकारिता संगठन OCCRP से जुड़े विवाद के संदर्भ में लगाया गया था। OCCRP ने अपने संपादकीय काम को स्वतंत्र बताते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार की कुछ फंडिंग का उसके संपादकीय निर्णयों पर नियंत्रण नहीं है। उस समय अमेरिकी विदेश विभाग, USAID और अन्य संबंधित पक्षों से भी प्रतिक्रियाएं मांगी गई थीं। यहां पत्रकारिता का पहला सिद्धांत सामने आता है—किसी संगठन को मिलने वाली आर्थिक सहायता और उसके संपादकीय निर्णयों के बीच संबंध का दावा अपने आप सिद्ध नहीं हो जाता। यदि किसी फंडिंग को राजनीतिक हस्तक्षेप का प्रमाण बताया जा रहा है, तो यह देखना आवश्यक है कि पैसा किस उद्देश्य के लिए दिया गया, उसका उपयोग कैसे हुआ और क्या उसके बाद किसी विशिष्ट निर्णय या गतिविधि को निर्देशित किया गया। केवल संबंध या फंडिंग का अस्तित्व किसी बड़े षड्यंत्र का स्वतः प्रमाण नहीं है। बांग्लादेश का संदर्भ और सवालों की राजनीति फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के दौरान बांग्लादेश में कथित अमेरिकी “डीप स्टेट” की भूमिका से संबंधित सवाल भी उठा था। उस संदर्भ में ट्रंप ने ऐसी भूमिका से इनकार किया था। दोनों देशों के नेताओं की बातचीत का व्यापक एजेंडा व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, रक्षा और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर केंद्रित था। इस घटना से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—किसी राजनीतिक दावे का अस्तित्व और उसका प्रमाणित होना दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक मंच पर आरोप लगना समाचार हो सकता है, लेकिन आरोप स्वयं तथ्य नहीं बन जाता। प्रमाण और संदेह के बीच की रेखा लोकतंत्र में सरकारों, सुरक्षा एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रभावशाली संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सत्ता से जुड़े किसी भी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही की जांच होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड, स्वतंत्र स्रोत और सत्यापन योग्य घटनाक्रम होना चाहिए। मसलन, यदि किसी विदेशी संस्था ने किसी देश में कोई परियोजना वित्तपोषित की है, तो यह पूछना उचित है कि उसका उद्देश्य क्या था। लेकिन उससे सीधे यह निष्कर्ष निकाल देना कि वह किसी सरकार को गिराने या चुनाव प्रभावित करने की गुप्त योजना का हिस्सा थी, तब तक उचित नहीं होगा जब तक उसके समर्थन में ठोस प्रमाण उपलब्ध न हों। फरवरी 2025 में USAID से संबंधित एक अन्य विवाद इसका उदाहरण है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से भारत में मतदाता भागीदारी के लिए 2.1 करोड़ डॉलर के कथित खर्च की बात सामने आई और भारत सरकार ने मामले की समीक्षा की बात कही। बाद में रिपोर्टों में यह सवाल भी उठा कि जिस राशि को भारत से जोड़ा जा रहा था, वह वास्तव में पड़ोसी बांग्लादेश के लिए निर्धारित थी। यही कारण है कि पत्रकारिता में “कहा गया”, “दावा किया गया”, “दस्तावेज में दर्ज है” और “स्वतंत्र रूप से सत्यापित हुआ”—इन चारों वाक्यांशों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। सोशल मीडिया ने चुनौती बढ़ाई सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार की गति कई गुना बढ़ा दी है। किसी वीडियो के लाखों व्यूज, किसी पोस्ट पर हजारों प्रतिक्रियाएं या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का बयान किसी दावे की सत्यता का प्रमाण नहीं है। दूसरी ओर, किसी दावे को केवल इसलिए खारिज कर देना भी उचित नहीं कि वह असुविधाजनक या राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। यहीं पत्रकारिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकार को न तो सत्ता के दावे का स्वतः प्रवक्ता बनना चाहिए और न विरोधी दावे को स्वतः सत्य मानना चाहिए। उसका काम उपलब्ध प्रमाणों को सामने रखना, संबंधित पक्षों का पक्ष लेना और पाठक को यह बताना है कि कौन-सी बात प्रमाणित है, कौन-सी आरोपित है और कौन-सी अभी जांच के दायरे में है। लोकतंत्र में पारदर्शिता ही वास्तविक कसौटी “डीप स्टेट” की बहस को केवल षड्यंत्र सिद्धांत बनाम सरकारी दावे के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं है। असली प्रश्न संस्थागत पारदर्शिता का है। सरकारी संस्थाओं के निर्णय, विदेशी सहायता, राजनीतिक फंडिंग, लॉबिंग, सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां और सार्वजनिक धन के उपयोग पर लोकतांत्रिक निगरानी जितनी मजबूत होगी, उतनी ही अफवाहों और अप्रमाणित दावों की गुंजाइश कम होगी। सत्ता चाहे निर्वाचित सरकार के पास हो या प्रशासनिक संस्थाओं के पास, जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। अमेरिका में भी “डीप स्टेट” शब्द को लेकर सरकारी कर्मचारियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर राजनीतिक बहस हुई है; वहीं आलोचकों ने ऐसे आरोपों को प्रशासनिक संस्थाओं के राजनीतिकरण के संदर्भ में देखा है। संपादकीय दृष्टि “डीप स्टेट” जैसे शब्दों की लोकप्रियता यह बताती है कि जनता सत्ता के दिखाई देने वाले ढांचे के पीछे काम करने वाली संस्थाओं और प्रभावों को समझना चाहती है। यह लोकतांत्रिक जिज्ञासा सकारात्मक है। लेकिन जिज्ञासा को निष्कर्ष में बदलने से पहले प्रमाण जरूरी है। आज आवश्यकता किसी एक राजनीतिक पक्ष के दावे को स्वीकार करने की नहीं, बल्कि दावों की जांच करने की संस्कृति को मजबूत करने की है। दस्तावेज क्या कहते हैं? संबंधित संस्था का आधिकारिक पक्ष क्या है? स्वतंत्र स्रोत क्या बताते हैं? घटनाओं के बीच वास्तविक संबंध क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उपलब्ध प्रमाण उस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं? संपादकीय निष्कर्ष यही है कि “डीप स्टेट” पर बहस को न अंधविश्वास में बदलना चाहिए, न अंध-खंडन में। लोकतंत्र में आरोपों की जगह हो सकती है, संदेह की भी जगह हो सकती है, लेकिन अंतिम कसौटी प्रमाण और स्वतंत्र सत्यापन ही होना चाहिए। दावा अपनी जगह है, सत्ता अपनी जगह और राजनीति अपनी जगह—लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी इन सबसे ऊपर सत्यापन को रखना है।

  • UNSC में भारत की स्थायी सीट की दावेदारी को रूस का समर्थन

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com नई दिल्ली, 27 सितंबर 2026। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भारत की लंबे समय से चली आ रही दावेदारी को रूस का समर्थन मिला है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का समर्थन किया। उन्होंने परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की वकालत की। रूस ने भारत और ब्राजील की उम्मीदवारी का समर्थन किया 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन के दौरान लावरोव ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार का उद्देश्य वैश्विक दक्षिण के अधिक देशों को प्रतिनिधित्व देना होना चाहिए। रूस ने विशेष रूप से भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया। लावरोव ने साथ ही पश्चिमी देशों के लिए अतिरिक्त स्थायी सीटें देने का विरोध किया और जर्मनी तथा जापान का विशेष रूप से उल्लेख किया। रूस का रुख यह है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार व्यापक भौगोलिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य, पांच स्थायी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वर्तमान में 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन—हैं, जबकि 10 गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव महासभा द्वारा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए किया जाता है। स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार है। सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना को बदलने के लिए संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से सुधार की प्रक्रिया चल रही है। सुधार की प्रक्रिया अभी जारी संयुक्त राष्ट्र महासभा सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व और सदस्यता बढ़ाने के मुद्दे पर अंतर-सरकारी वार्ता जारी रखे हुए है। महासभा ने 81वें सत्र में भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय किया है। सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव केवल किसी एक देश के समर्थन से संभव नहीं है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया के तहत व्यापक सदस्य-समर्थन की आवश्यकता होती है। भारत के लिए अहम कूटनीतिक मुद्दा भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मौजूदा वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप अधिक प्रतिनिधिक बनाने की मांग करता रहा है। भारत की दावेदारी के समर्थन में अलग-अलग देशों और समूहों की ओर से समय-समय पर बयान सामने आते रहे हैं। रूस का ताजा समर्थन ऐसे समय आया है जब सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है। इससे पहले सितंबर में हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य वाले वीसग्राद समूह ने भी भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया था। व्यापक सहमति से ही आगे बढ़ेगा प्रस्ताव भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को रूस सहित कई देशों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन सुरक्षा परिषद के विस्तार का प्रश्न व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति से जुड़ा है। स्थायी सदस्यों की संख्या, नए सदस्यों के अधिकार और वीटो व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अलग-अलग देशों के रुख में अंतर बना हुआ है। इसलिए रूस का समर्थन भारत की दावेदारी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बयान जरूर है, लेकिन इससे सुरक्षा परिषद की संरचना में तत्काल बदलाव नहीं होता। सुधार प्रक्रिया में आगे की वार्ताएं और सदस्य देशों के बीच सहमति इस मुद्दे की दिशा तय करेंगी।

  • अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर फिर तनाव, 28 लड़ाकों के मारे जाने का काबुल का दावा

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com काबुल, 27 सितंबर 2026। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने रविवार को दावा किया कि पूर्वी नूरिस्तान प्रांत के कामदेश इलाके में सीमा पार से दाखिल हुए एक सशस्त्र समूह के खिलाफ कार्रवाई में 28 लड़ाके मारे गए और 32 अन्य घायल हुए। मंत्रालय के अनुसार, समूह में इस्लामिक स्टेट से जुड़े लड़ाके भी शामिल थे। हालांकि, इन दावों और हताहतों के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान से घुसपैठ का अफगान आरोप अफगान रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सशस्त्र समूह शनिवार को पाकिस्तान की ओर से नूरिस्तान के कामदेश क्षेत्र में दाखिल हुआ था। अफगान सुरक्षा बलों ने इसके बाद अभियान चलाया। मंत्रालय का दावा है कि मारे गए लोगों में बड़ी संख्या पूर्व अफगान सरकार के सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों की थी। अफगान पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ पाकिस्तानी मिलिशिया ने इस समूह को सहयोग दिया था। मंत्रालय ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी पर पूर्व अफगान सुरक्षा कर्मियों को प्रशिक्षण देकर सीमा पार भेजने का आरोप भी लगाया है। ये आरोप फिलहाल अफगान पक्ष के दावों के रूप में ही सामने आए हैं। पाकिस्तान की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया नहीं रॉयटर्स के अनुसार, घटना को लेकर पाकिस्तान की सेना और सूचना मंत्रालय की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई थी। ऐसे में अफगान रक्षा मंत्रालय द्वारा बताए गए 28 मृतकों और 32 घायलों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं है। पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान पर अपनी जमीन से पाकिस्तान-विरोधी सशस्त्र समूहों को गतिविधियां संचालित करने की अनुमति देने का आरोप लगाता रहा है। अफगान पक्ष इन आरोपों को खारिज करता रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा पार हिंसा को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगातार जारी हैं। 21 सितंबर की हवाई कार्रवाई के बाद बढ़ा तनाव ताजा घटनाक्रम से कुछ दिन पहले 21 सितंबर को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में हवाई कार्रवाई की थी। पाकिस्तान ने दावा किया था कि कार्रवाई में 28 आतंकवादी मारे गए। इसके विपरीत अफगान अधिकारियों ने नागरिकों के मारे जाने की बात कही थी। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन अफगानिस्तान (UNAMA) ने उस घटना में तीन नागरिकों—एक पुरुष, एक महिला और एक बच्ची—की मौत की पुष्टि की थी। पाकिस्तान ने कार्रवाई को सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ अभियान बताया था, जबकि अफगान सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया। सीमा पर लगातार बनी हुई है संवेदनशील स्थिति अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा क्षेत्र में हाल के दिनों में सैन्य गतिविधियों और गोलीबारी की घटनाएं बढ़ी हैं। 25 सितंबर को भी पाकिस्तानी सुरक्षा सूत्रों ने अफगान सीमा से जुड़े इलाके में गोलीबारी के दौरान अफगान तालिबान के कुछ सदस्यों के मारे जाने का दावा किया था। नूरिस्तान की ताजा घटना ऐसे समय हुई है जब दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधी आरोप लगातार तीखे हो रहे हैं। सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों, सैन्य कार्रवाई और जवाबी कदमों को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। फिलहाल नूरिस्तान में 28 लोगों के मारे जाने और 32 के घायल होने संबंधी आंकड़े अफगान रक्षा मंत्रालय के दावे पर आधारित हैं। स्वतंत्र सत्यापन और पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही घटनाक्रम की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

  • एशियन गेम्स में भारत की स्क्वैश में डबल सिल्वर, अनाहत और अभय ने रचा इतिहास

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com नागोया, 27 सितंबर 2026। जापान के आइची-नागोया में जारी एशियन गेम्स 2026 में भारतीय स्क्वैश ने रविवार को इतिहास रच दिया। अनाहत सिंह और अभय सिंह ने महिला एवं पुरुष एकल स्पर्धाओं में रजत पदक जीतकर भारत की झोली में दो पदक जोड़े। दोनों भारतीय खिलाड़ी फाइनल में मलेशियाई प्रतिद्वंद्वियों से हार गए, लेकिन एक ही एशियन गेम्स में पुरुष और महिला एकल के फाइनल तक पहुंचने की उपलब्धि भारतीय स्क्वैश के लिए महत्वपूर्ण रही। अभय सिंह को पुरुष एकल में रजत पुरुष एकल के फाइनल में भारत के अभय सिंह का सामना मलेशिया के एनजी ईन योउ से हुआ। मलेशियाई खिलाड़ी ने मुकाबला 11-9, 11-5, 11-5 से जीतकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। अभय को रजत पदक मिला। एनजी ईन योउ ने इस जीत के साथ एशियन गेम्स में अपना खिताब बरकरार रखा। अभय ने इससे पहले सेमीफाइनल में पाकिस्तान के मुहम्मद इरफान को 3-0 से हराकर फाइनल में जगह बनाई थी। अनाहत सिंह ने रचा ऐतिहासिक अध्याय महिला एकल के फाइनल में 18 वर्षीय अनाहत सिंह का मुकाबला मलेशिया की सिवसंगरी सुब्रमण्यम से हुआ। सिवसंगरी ने 11-4, 11-4, 11-7 से जीत दर्ज कर स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि अनाहत को रजत पदक मिला। अनाहत ने इससे पहले सेमीफाइनल में जापान की सातोमी वतनाबे के खिलाफ पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए 3-2 से जीत दर्ज की थी। इस जीत के साथ वह एशियन गेम्स के महिला स्क्वैश एकल फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं। पहली बार दोनों भारतीय एकल फाइनलिस्ट अनाहत और अभय की उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय रही क्योंकि एशियन गेम्स में पहली बार भारत के पुरुष और महिला स्क्वैश एकल खिलाड़ी एक ही संस्करण में फाइनल तक पहुंचे। इससे पहले भारत के लिए स्क्वैश में व्यक्तिगत स्पर्धाओं में पदक आते रहे हैं, लेकिन दोनों एकल वर्गों में एक साथ फाइनल तक पहुंचने का यह पहला अवसर रहा। अनाहत के लिए यह एशियन गेम्स में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने 2023 हांगझोउ एशियन गेम्स में मिश्रित युगल और टीम स्पर्धाओं में कांस्य पदक भी जीते थे। वहीं अभय ने हांगझोउ में टीम स्पर्धा में स्वर्ण और मिश्रित युगल में कांस्य पदक हासिल किया था। स्क्वैश में भारत का पदक अभियान मजबूत अनाहत और अभय के दो रजत पदकों के अलावा भारत ने स्क्वैश में मिश्रित युगल स्पर्धा में जोशना चिनप्पा और वेलावन सेंथिलकुमार के जरिए कांस्य पदक भी हासिल किया है। इस तरह एशियन गेम्स 2026 में स्क्वैश से भारत के पदकों की संख्या कम से कम तीन हो गई है। 27 सितंबर को इन मुकाबलों के बाद उपलब्ध पदक तालिका के अनुसार भारत के खाते में 4 स्वर्ण, 14 रजत और 14 कांस्य सहित कुल 32 पदक दर्ज हो गए थे।अनाहत सिंह और अभय सिंह के रजत पदकों ने भारतीय स्क्वैश के अभियान में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। स्वर्ण से चूकने के बावजूद दोनों खिलाड़ियों का एकल फाइनल तक पहुंचना एशियन गेम्स में भारतीय स्क्वैश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को रेखांकित करता है।

  • मन की बात में सर्जिकल स्ट्राइक की 10वीं वर्षगांठ से स्वच्छता तक पीएम मोदी का संदेश

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com नई दिल्ली, 27 सितंबर 2026। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ के 138वें एपिसोड में देशवासियों से संवाद करते हुए सर्जिकल स्ट्राइक की 10वीं वर्षगांठ, जनगणना-2027, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, खेल प्रतिभाओं की तलाश, स्थानीय उत्पादों, पोषण और सांस्कृतिक विरासत सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकों और स्थानीय समुदायों की ओर से किए जा रहे सामाजिक एवं जनभागीदारी के प्रयासों को भी रेखांकित किया। सर्जिकल स्ट्राइक के 10 वर्ष पूरे होने का उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने 28-29 सितंबर 2016 को नियंत्रण रेखा के पार आतंकवादी ठिकानों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक का उल्लेख किया। उन्होंने इसे आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना बताया और कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने आतंकवाद के प्रति अपनी नीति को विभिन्न कार्रवाइयों के माध्यम से स्पष्ट किया है। आधिकारिक भाषण में उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक को भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का एक उदाहरण बताया। जनगणना को बताया राष्ट्रीय जिम्मेदारी प्रधानमंत्री ने जनगणना-2027 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके पहले चरण में देशभर में 32 करोड़ से अधिक परिवारों की जानकारी दर्ज की जा चुकी है। उन्होंने नागरिकों से जनगणना प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की और स्व-गणना की डिजिटल सुविधा का उपयोग करने की बात कही। सरकार के अनुसार जनगणना-2027 दो चरणों में आयोजित की जा रही है। पहले चरण में मकान सूचीकरण एवं आवास संबंधी जानकारी और दूसरे चरण में जनसंख्या गणना की जाएगी। नागरिकों को पहली बार ऑनलाइन स्व-गणना की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। स्वच्छता को जनभागीदारी से जोड़ने पर जोर ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता से जुड़े देश के विभिन्न हिस्सों के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने नदियों, तालाबों, कुओं, समुद्र तटों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई में युवाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वच्छता केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि जनभागीदारी से जुड़ा सामाजिक दायित्व है। उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के सबसे सुंदर तरीकों में स्वच्छता को भी शामिल किया। पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय पहल का उल्लेख प्रधानमंत्री ने पर्यावरण संरक्षण को केवल पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की सुरक्षा तक सीमित न मानते हुए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने विभिन्न राज्यों में युवाओं और स्थानीय लोगों द्वारा जलस्रोतों तथा समुद्र तटों की सफाई जैसे प्रयासों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, जब एक व्यक्ति पहल करता है और धीरे-धीरे अन्य लोग उससे जुड़ते जाते हैं, तो यह जनभागीदारी का व्यापक रूप ले लेती है। गांवों से खेल प्रतिभाओं की तलाश पर जोर प्रधानमंत्री ने ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों से खेल प्रतिभाओं को सामने लाने की आवश्यकता पर भी बात की। उन्होंने पंजाब के हॉकी प्रशिक्षक राजिंदर सिंह के प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराने और नई प्रतिभाओं की पहचान करने पर काम किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के अनुसार, ऐसे प्रयासों से उन क्षेत्रों के खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है, जहां खेल प्रशिक्षण की सुविधाएं सीमित हैं। प्रतापगढ़ का आंवला बना स्थानीय अर्थव्यवस्था का उदाहरण ‘मन की बात’ में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के आंवले का भी उल्लेख हुआ। प्रधानमंत्री ने बताया कि क्षेत्र में आंवला आधारित प्रसंस्करण और स्थानीय उत्पादों से जुड़े उद्यमों को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं द्वारा आंवले से मुरब्बा, मिठाई, रस, अचार और अन्य उत्पाद तैयार किए जाने का उल्लेख किया। ‘एक जिला, एक उत्पाद’ पहल के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ने और ग्रामीण स्तर पर आर्थिक अवसर बढ़ाने की बात भी सामने रखी गई। पोषण और नशामुक्ति पर भी चर्चा प्रधानमंत्री ने सितंबर माह में चल रहे पोषण संबंधी अभियानों का उल्लेख करते हुए स्थानीय और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को दैनिक आहार में शामिल करने पर जोर दिया। उन्होंने विभिन्न राज्यों में पोषण वाटिका, मोटे अनाज और स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने वाली पहलों का उल्लेख किया। इसके अलावा, उन्होंने युवाओं के बीच नशामुक्ति के लिए चल रहे अभियानों का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने युवाओं से स्वयं नशे से दूर रहने और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करने का आह्वान किया। सामाजिक और सांस्कृतिक पहलों को मंच ‘मन की बात’ के इस एपिसोड में प्रधानमंत्री ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों में चल रही जनभागीदारी की पहलों को सामने रखा। कार्यक्रम में सुरक्षा और जनगणना जैसे राष्ट्रीय मुद्दों के साथ स्वच्छता, पर्यावरण, खेल, पोषण, नशामुक्ति और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े उदाहरणों के जरिए नागरिक भागीदारी पर जोर दिखाई दिया। प्रधानमंत्री का संदेश मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहा कि स्थानीय स्तर पर शुरू की गई छोटी पहल भी सामूहिक भागीदारी से व्यापक सामाजिक अभियान का रूप ले सकती है।

  • खैबर पख्तूनख्वा में भीषण धमाका, चेकपोस्ट पर हमला; 12 की मौत, 35 घायल

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com डेरा इस्माइल खान, 27 सितंबर 2026। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के डेरा इस्माइल खान जिले के दराज़िंदा इलाके में अमन मेला संयुक्त चेकपोस्ट को निशाना बनाकर किए गए शक्तिशाली विस्फोट में कम से कम 12 लोगों की मौत और 35 लोगों के घायल होने की सूचना है। अधिकारियों के अनुसार, मृतकों में नौ पुरुष, दो महिलाएं और एक बच्चा शामिल हैं। घटना में एक सीमा शुल्क अधिकारी के मारे जाने की भी जानकारी सामने आई है। विस्फोटक लदे वाहन को चेकपोस्ट से टकराने का दावा प्रारंभिक जांच के अनुसार, विस्फोटक से लदे एक वाहन को अमन मेला चेकपोस्ट से टकराया गया, जिसके बाद जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट से चेकपोस्ट का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और पास का एक मकान भी ढह गया। घटना के बाद इलाके में गोलीबारी की आवाजें सुनाई देने की जानकारी स्थानीय अधिकारियों ने दी। अमन मेला चेकपोस्ट डेरा इस्माइल खान–क्वेटा मार्ग पर दराज़िंदा और मुगल कोट के निकट स्थित है। यह क्षेत्र खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान की सीमा के पास होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है। यहां पुलिस और सीमा शुल्क से जुड़ी जांच गतिविधियां संचालित होती हैं। बचाव अभियान के दौरान एंबुलेंस पर भी गोलीबारी घटना के बाद राहत और बचाव दल घायलों तथा मृतकों को अस्पताल पहुंचाने में जुट गए। इसी दौरान एक रेस्क्यू 1122 एंबुलेंस पर गोलीबारी की गई। अधिकारियों के अनुसार, एंबुलेंस में विस्फोट के पीड़ितों के शव ले जाए जा रहे थे। इस गोलीबारी में एक बचावकर्मी की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हुए। उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। इसके बावजूद बचाव दलों ने राहत एवं बचाव अभियान जारी रखा। 35 घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया रेस्क्यू 1122 और स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, घटना में 35 लोग घायल हुए हैं। घायलों को डेरा इस्माइल खान और दराज़िंदा के चिकित्सा केंद्रों में ले जाया गया। कुछ घायलों की स्थिति गंभीर बताई गई है। बचाव अभियान में कई एंबुलेंस, बचावकर्मी और अग्निशमन वाहन लगाए गए। घटना के बाद सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया और तलाशी अभियान शुरू किया। बम निरोधक दल को भी घटनास्थल पर भेजा गया, ताकि विस्फोट में इस्तेमाल सामग्री और घटना की परिस्थितियों की जांच की जा सके। हमले की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावे हमले की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। पाकिस्तान टुडे ने प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े एक समूह द्वारा जिम्मेदारी लेने की जानकारी दी है, जबकि शुरुआती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में तत्काल किसी संगठन द्वारा जिम्मेदारी स्वीकार किए जाने की पुष्टि नहीं थी। इसलिए जांच पूरी होने तक जिम्मेदारी के दावे को आधिकारिक रूप से स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान नेतृत्व ने की घटना की निंदा पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने घटना की निंदा करते हुए मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की और घायलों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने भी घटना पर चिंता जताई और प्रांत में सुरक्षा नीति की समीक्षा की आवश्यकता बताई। बढ़ती हिंसा से सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खैबर पख्तूनख्वा लंबे समय से हिंसक हमलों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है। दराज़िंदा की घटना में सुरक्षा प्रतिष्ठान के साथ-साथ आम नागरिक और राहतकर्मी भी प्रभावित हुए हैं। विशेष रूप से बचाव अभियान के दौरान एंबुलेंस पर गोलीबारी की घटना ने आपातकालीन सेवाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा की है। घटना की जांच, जिम्मेदार लोगों की पहचान और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा अब स्थानीय प्रशासन तथा सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। साथ ही, घायलों को समय पर उपचार और प्रभावित परिवारों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना राहत व्यवस्था की प्राथमिकता बनी हुई है।

  • समाज के विद्रूपता का दर्पण है "पतिव्रता वेश्या" उपन्यास

    समीक्षक -लालबहादुर चौरसिया लाल,"पतिव्रता वेश्या" उपन्यास हिंदी साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी की सद्यः प्रकाशित कृति है। उपन्यास का शीर्षक पढ़कर मन में एक अजीब-सा प्रश्न कौंध उठता है। आखिर दो विरोधी शब्द, दो विरोधी भाव एक ही व्यक्ति या एक ही शीर्षक के लिए कैसे प्रयुक्त हो सकते हैं? एक तरफ "पतिव्रता" और दूसरी तरफ "वेश्या"। शीर्षक में जिज्ञासा का बोध भरपूर है। इन्हीं शब्दों के इर्द-गिर्द इस उपन्यास का ताना-बाना बुना गया है। समाज का एक कड़वा सच, जिससे हम सभी हमेशा रूबरू होते हैं, परंतु कह नहीं पाते। इस सच को साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी ने बड़े ही सलीके से इस उपन्यास में वर्णित किया है। उपन्यास के नायक राज सिंह राणा हैं, जो एक ख्यातिप्राप्त चित्रकार हैं। नायिका के रूप में बबीता है, जो एक वेश्या है। बबीता के कोठे तक पहुँचने की कहानी रोंगटे खड़ी कर देने वाली है। यही पात्र इस कहानी का प्राण-तत्त्व है। कोई महिला जानबूझकर वेश्या नहीं बनती। किसी महिला को वेश्यालय तक पहुँचाने में पुरुष वर्ग का ही हाथ होता है। यह बात इस कहानी से सिद्ध होती है। वह छोटी लड़की, जिसके अंदर प्रेम था, संस्कार थे, सपने थे, पूरा परिवार था, किंतु समाज ने इंटरमीडिएट की छात्रा बबीता के पंख कुतर दिए। सब कुछ रहते हुए वह लड़की आज बेबस हो गई। वह ऐसे दलदल में धकेल दी गई, जिसका जिम्मेदार पुरुष वर्ग है। किंतु जब समय ने करवट बदली, तो वही वेश्या के रूप में स्थापित स्त्री एक सच्ची पतिव्रता के रूप में स्थापित होती है। उसकी उड़ान को पंख मिलते हैं। बरसों से सुषुप्त प्रेम की रसधार फूट पड़ती है। वह सिर्फ भोग्या नहीं, शक्ति और प्रेम का पर्याय हो जाती है। राज सिंह राणा के जीवन में सब कुछ है, किंतु प्रेम नहीं है। राणा की दो-दो शादियाँ हो चुकी हैं, लेकिन उनकी शादी लंबे समय तक चल नहीं पाई। उन दोनों पत्नियों से उन्हें बहुत बड़ा धोखा मिला। लेकिन जब बबीता उनके जीवन में आई, तो राणा की दावाग्नि से झुलसी प्रेम की वाटिका पुनः हरी-भरी हो जाती है। पूरा उपन्यास एक वेश्या का जीवन जी रही स्त्री के पतिव्रता स्त्री बनने तक की करुण यात्रा है। "पतिव्रता वेश्या" उपन्यास में हमें समाज के कई कड़वे रूप देखने को मिलते हैं, जो बिल्कुल यथार्थ लगते हैं। कोई बनावटीपन नहीं है। पूरे उपन्यास की बुनावट एक स्त्री के आंतरिक सौंदर्य की करुण गाथा है। समाज के विद्रूप चेहरे को साहित्यकार ने परत-दर-परत खोला है। वेश्यालय की दशा, पुलिस-प्रशासन का चरित्र, नारी-संवेदना जैसे तमाम भाव हमें चिंतन करने पर विवश कर देते हैं। उपन्यास के बीच-बीच में साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी ने कुछ उपदेशात्मक वाक्यों का भी प्रयोग किया है, जो समाज को दिशा देने में कारगर सिद्ध होंगे। कितनी वैज्ञानिकता है इस वाक्य में, इसकी एक बानगी देखें- (दुख और वेदना का सम्मिश्रण हर प्रकार की आभा और उत्साह का रावण की तरह अपहरण कर लेता है।) जब एक स्त्री दलदल में धकेल दी जाती है, तो वह फड़फड़ाती है। दलदल से निकलने का भरपूर प्रयास करती है और जब निकल नहीं पाती, तो वह टूट जाती है, निरीह हो जाती है, परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर जीने के लिए बाध्य हो जाती है। एक स्त्री की पीड़ा को साहित्यकार ने कितने साहित्यिक अंदाज़ में दर्शाया है, देखें- (बदली हुई परिस्थितियों ने उसके मूल स्वभाव का कैसे निर्ममतापूर्वक हरण कर लिया था। उसकी अल्हड़ता, शालीनता और निर्मलता को भी तो निर्ममतापूर्वक मारा गया था। ऐसे मारा गया था कि बचने की गुंजाइश ही नहीं बची थी। उन गुणों से रिक्त हुए स्थान को इस मायावी निर्ममता ने बड़ी चालाकी से भर दिया। ओह! मैं क्या से क्या हो गई। आँखें डबडबाने लगीं।) साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी ने अपने इस उपन्यास में बबीता रूपी चरित्र के माध्यम से एक युवती को वेश्या बनाने में सामाजिक घटकों को कितने तार्किक और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास सिर्फ एक उपन्यास नहीं है, यह समाज पर दागा गया एक प्रश्न है। इसके उत्तर में ही छिपी है हमारी दूषित मानसिकता। जो कितना प्रामाणिक है, देखें- (वह सोचने लगी - एक स्त्री को वेश्या बनने के लिए अनेक पुरुष वेश्याओं की आवश्यकता होती है। यदि एक स्त्री के साथ एक ही पुरुष संसर्ग करे तो वह पतिव्रता कहलाती है, किंतु अनेक पुरुष करें तो वेश्या। सोचने वाली बात यह है कि फिर तो कथित सभ्य समाज में कथित वेश्याओं से न जाने कितने अधिक या लाखों-लाख पुरुष वेश्या होंगे। फिर यह समाज ऐसे पुरुषों को पुरुष वेश्या क्यों नहीं कहता, जो अलग-अलग महिलाओं से संबंध बनाते हैं? अगर हम रंडी हैं तो ये रंडे क्यों नहीं? यह पुरुषवादी समाज का दोगलापन नहीं तो क्या है?) साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी ने इस उपन्यास को बिल्कुल अपनी रौ में लिखा है। कथानक पाठक के मनोभावों को छूता हुआ चलता है। पढ़ते समय ऐसा लगता है कि हम अमुक घटनाक्रम को पढ़ नहीं, आँखों के समक्ष देख रहे हों। यही साहित्यकार की प्रमुख विशेषता है। कहानी की यात्रा सिलसिलेवार, परत-दर-परत खुलती चली जाती है। हर पृष्ठ में जिज्ञासा समान रूप से बनी रहती है। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि कहानी की गति बड़ी ही तीव्र है, परंतु कहानी कहीं-कहीं स्थायित्व लिए हुए आगे बढ़ती है। उपन्यास "पतिव्रता वेश्या" हमारे आंतरिक मनोभाव में स्थान बनाने में सक्षम है। मन-मस्तिष्क को भी दौड़ने पर विवश कर देता है। कुल मिलाकर साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी द्वारा रचित यह उपन्यास एक सामाजिक दंश में छिपा एक नायाब मोती है। इसमें दुख भी है, पीड़ा भी है, आक्रोश भी है, चेतना भी है, प्रेम भी है, समर्पण भी है, त्याग भी है, आशा और उम्मीद भी है। इस उपन्यास को पढ़कर हम वेश्या जैसे शब्द से घृणा नहीं, प्रेम करने लगेंगे। क्योंकि इस वेश्या स्त्री में छिपी है एक पतिव्रता स्त्री। इस उपन्यास-लेखन के लिए साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी को बहुत-बहुत धन्यवाद। समीक्षक -लालबहादुर चौरसिया लाल, (महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई) 094520 88890

  • SIR पर सियासी घमासान तेज, चुनाव आयोग से पारदर्शिता पर स्पष्टीकरण की मांग

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com संवाददाता अशोक कुमार सिंह नई दिल्ली, 26 सितंबर 2026। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच बहस तेज हो गई है। हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे विषय शामिल थे। आयोग के भीतर मतभेदों की रिपोर्ट से बढ़ी चर्चा द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त परामर्श नहीं होने तथा मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे उठाए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ आपत्तियां नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच और SIR से जुड़े मामलों में अपील की प्रक्रिया को लेकर थीं। हालांकि, इन रिपोर्टों के बीच चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग विचार या टिप्पणियां सामने आना संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, SIR सहित महत्वपूर्ण निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से किए गए हैं। विपक्ष ने मांगी जवाबदेही और स्पष्टता SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग से अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर विरोध कार्यक्रमों की घोषणा भी की है। तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस ने 28 सितंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन की बात कही है। राजनीतिक विवाद के बीच भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को प्रमाण और तथ्यों के साथ रखने की बात कही है। इस तरह SIR का मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के प्रशासनिक पुनरीक्षण तक सीमित न रहकर चुनावी प्रक्रिया में संस्थागत पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास से जुड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। NDA के सहयोगी दलों ने भी मांगा स्पष्टीकरण दिलचस्प रूप से, चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग केवल विपक्ष की ओर से ही नहीं आई है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और तेलुगु देशम पार्टी जैसे NDA सहयोगी दलों ने भी SIR को लेकर उठ रहे सवालों पर आयोग से जनता के बीच स्पष्टता लाने की अपील की है। LJP (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने कहा कि यदि आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो चुनाव आयोग, विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त, को अपना पक्ष स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखना चाहिए। TDP की ओर से भी पारदर्शिता को सार्वजनिक विश्वास मजबूत करने से जोड़ा गया है। मतदाता सूची और अधिकारों से सीधे जुड़ा मुद्दा SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों की समीक्षा और उनमें पात्र मतदाताओं की जानकारी को अद्यतन करना है। प्रक्रिया के दौरान नाम, पते, पुराने रिकॉर्ड से मिलान और अन्य विसंगतियों की जांच की जा रही है। ऐसे में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटने या सत्यापन में तकनीकी समस्या आने की आशंका चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण विषय बन जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में अपीलें लंबित हैं। वहीं दिल्ली में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं को कथित रिकॉर्ड विसंगतियों के संबंध में नोटिस दिए गए हैं। वर्तमान विवाद में दो स्तरों पर चर्चा हो रही है—एक ओर मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाने की प्रशासनिक आवश्यकता, दूसरी ओर यह सुनिश्चित करने की मांग कि प्रक्रिया के दौरान कोई पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न हो। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण, राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं और न्यायिक कार्यवाही पर इस बहस की दिशा काफी हद तक निर्भर रहेगी।

  • भारत का कबड्डी में स्वर्णिम डबल, ईरान को हराकर पुरुष टीम ने फिर रचा इतिहास

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com आइची-नागोया, जापान, 26 सितंबर 2026। भारतीय पुरुष कबड्डी टीम ने एशियन गेम्स 2026 के फाइनल में ईरान को 40-34 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत के साथ भारत ने पुरुष कबड्डी में अपना खिताब बरकरार रखा और एशियाई खेलों में इस स्पर्धा में नौवां स्वर्ण पदक हासिल किया। आइची-नागोया के टोकाई सिटिजन्स जिम्नेजियम में खेले गए फाइनल में भारत और ईरान के बीच शुरुआत से ही कड़ा मुकाबला देखने को मिला। ईरान ने पहले हाफ में भारतीय टीम पर दबाव बनाए रखा और मध्यांतर तक 18-17 की बढ़त हासिल की। दूसरे हाफ में भारतीय खिलाड़ियों ने खेल की गति और रणनीति में बदलाव करते हुए मुकाबले पर पकड़ मजबूत की। रेडिंग में आक्रामकता और डिफेंस में बेहतर तालमेल के दम पर भारतीय टीम ने लगातार अंक जुटाए और ईरान की चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया। मुकाबले के निर्णायक दौर में भारत ने अपनी बढ़त कायम रखी। अंतिम सीटी बजने तक स्कोर 40-34 रहा और भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया। भारतीय टीम पूरे टूर्नामेंट में अजेय रही और फाइनल में भी दबाव के बावजूद संयम बनाए रखा। महिला टीम ने भी ईरान को हराकर जीता स्वर्ण भारत के लिए 26 सितंबर का दिन कबड्डी में दोहरी स्वर्णिम सफलता लेकर आया। पुरुष टीम के फाइनल से पहले भारतीय महिला कबड्डी टीम ने भी ईरान को 37-34 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। इसके साथ महिला टीम ने एशियन गेम्स में अपना खिताब बरकरार रखा। इस तरह एशियन गेम्स 2026 में भारत ने कबड्डी के पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक हासिल किए। महिला टीम के लिए यह एशियाई खेलों में चौथा स्वर्ण पदक है। पुरुष टीम की जीत विशेष रूप से उल्लेखनीय रही क्योंकि ईरान एशियाई कबड्डी में भारत की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी टीमों में शामिल रही है। 2026 के फाइनल में भी ईरान ने भारतीय टीम को कड़ी चुनौती दी, लेकिन दूसरे हाफ में भारत ने बेहतर सामंजस्य और प्रभावी खेल के जरिए मुकाबला अपने पक्ष में कर लिया। कबड्डी में दोनों स्वर्ण पदकों ने एशियन गेम्स में भारत के पदक अभियान को भी मजबूती दी है। पुरुष टीम की यह सफलता भारतीय कबड्डी के एशियाई खेलों में लंबे इतिहास में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज हुई है।

  • ULI: डिजिटल ऋण की दुनिया में बदलाव, आसान कर्ज के साथ भरोसे की भी परीक्षा

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अब केवल पैसे के लेन-देन को आसान बनाने तक सीमित नहीं है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अगला बड़ा विस्तार ऋण और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। इसी दिशा में यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (ULI) ऐसी तकनीकी व्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है, जिसका उद्देश्य ऋणदाताओं को विभिन्न डिजिटल डेटा और सत्यापन सेवाओं से मानकीकृत तरीके से जोड़ना है। सवाल केवल यह नहीं है कि इससे कर्ज कितनी तेजी से मिलेगा, बल्कि यह भी है कि डिजिटल ऋण व्यवस्था कितनी सुरक्षित, पारदर्शी और समावेशी बन पाएगी। ULI का पायलट अगस्त 2023 में शुरू हुआ था। बाद में इसे व्यापक डिजिटल ऋण व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया। केंद्र सरकार के मार्च 2026 के संसदीय उत्तर के अनुसार, 27 फरवरी 2026 तक 100 ऋणदाता ULI से जुड़े थे, जिनमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, लघु वित्त बैंक तथा NBFC शामिल थे। कर्ज की प्रक्रिया में डिजिटल पुल परंपरागत ऋण प्रक्रिया में बैंक को आवेदक की पहचान, आय, संपत्ति, क्रेडिट इतिहास और अन्य दस्तावेजों की जानकारी अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त और सत्यापित करनी पड़ सकती है। ULI का उद्देश्य इसी बिखरी हुई व्यवस्था के बीच तकनीकी पुल उपलब्ध कराना है। RBI Innovation Hub के अनुसार ULI मानकीकृत API के माध्यम से ऋणदाताओं को विभिन्न डेटा सेवा प्रदाताओं से जोड़ता है। इसमें पहचान सत्यापन, क्रेडिट पात्रता, संपत्ति संबंधी जानकारी और वाहन संबंधी सेवाओं जैसी सुविधाएं शामिल हैं। किसान क्रेडिट कार्ड, MSME और वाहन ऋण जैसे ऋण-जर्नी में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि ULI स्वयं किसी व्यक्ति का ऋण मंजूर करता है। अंतिम ऋण निर्णय संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था के नियमों, जोखिम आकलन और पात्रता मानकों पर निर्भर करता है। यही अंतर आम उपभोक्ता के लिए समझना जरूरी है। आंकड़े बता रहे हैं बढ़ता विस्तार 31 अगस्त 2026 तक RBI Innovation Hub के आंकड़ों के अनुसार ULI पर 136 ऋणदाता, 64 सेवा प्रदाता और 143 सेवाएं लाइव थीं। अगस्त महीने में प्लेटफॉर्म के माध्यम से लगभग 2.50 करोड़ API अनुरोध संसाधित किए गए। 13 राज्यों में भूमि रिकॉर्ड सेवाएं भी उपलब्ध थीं। ये आंकड़े बताते हैं कि ULI अब केवल एक प्रयोगात्मक अवधारणा नहीं रह गया है। इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है और अलग-अलग प्रकार के ऋणदाताओं तथा डेटा सेवाओं को जोड़ने की दिशा में इसका दायरा विस्तृत हो रहा है। किसान और छोटे कारोबारियों के लिए अवसर भारत में औपचारिक ऋण तक पहुंच की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक विश्वसनीय और आसानी से सत्यापित होने वाली जानकारी का अभाव रहा है। खासकर छोटे किसान, सूक्ष्म उद्यमी और ऐसे कारोबारी जिनके पास पारंपरिक दस्तावेज सीमित हैं, उनके लिए ऋण मूल्यांकन की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। ULI में भूमि रिकॉर्ड, क्रेडिट सूचना और अन्य डिजिटल सेवाओं तक मानकीकृत पहुंच का उद्देश्य इस समस्या को कम करना है। कृषि क्षेत्र में भूमि और संबंधित डिजिटल जानकारी, जबकि छोटे कारोबारियों के मामले में उपलब्ध वित्तीय एवं व्यावसायिक सूचनाएं ऋण मूल्यांकन को अधिक व्यवस्थित बनाने में सहायक हो सकती हैं। लेकिन डिजिटल सुविधा का अर्थ अपने-आप सस्ता या हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध ऋण नहीं है। ब्याज दर, जोखिम, आय, पुनर्भुगतान क्षमता और ऋणदाता की नीतियां आगे भी महत्वपूर्ण रहेंगी। सुविधा के साथ डेटा सुरक्षा की चुनौती डिजिटल ऋण की सबसे बड़ी ताकत डेटा है और यही उसका सबसे संवेदनशील पक्ष भी है। पहचान, आय, बैंकिंग गतिविधि, संपत्ति और क्रेडिट इतिहास से जुड़ी जानकारी किसी व्यक्ति की वित्तीय गोपनीयता का हिस्सा है। इसलिए डिजिटल ऋण व्यवस्था में गति के साथ सहमति, डेटा सुरक्षा और जवाबदेही को समान महत्व देना होगा। RBI की डिजिटल लेंडिंग व्यवस्था में साइबर सुरक्षा, डेटा भंडारण और ग्राहक संबंधी सूचनाओं के संरक्षण से जुड़े नियामकीय प्रावधान पहले से मौजूद हैं। यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या नागरिक को स्पष्ट रूप से पता होगा कि उसकी कौन-सी जानकारी, किस उद्देश्य से और किस संस्था के माध्यम से इस्तेमाल की जा रही है? डिजिटल व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए इस सवाल का स्पष्ट उत्तर जरूरी है। डिजिटल खाई को भी नजरअंदाज न किया जाए भारत की डिजिटल प्रगति प्रभावशाली है, लेकिन हर नागरिक की डिजिटल क्षमता समान नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों, बुजुर्गों, कम डिजिटल साक्षरता वाले लोगों और कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में केवल डिजिटल प्रक्रिया पर निर्भरता नई बाधाएं भी पैदा कर सकती है। इसलिए ULI जैसी व्यवस्था को वित्तीय समावेशन का साधन बनाते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक उन लोगों को बाहर न कर दे जिन्हें औपचारिक ऋण की सबसे अधिक आवश्यकता है। डिजिटल माध्यम के साथ आवश्यक मानवीय सहायता और वैकल्पिक सेवा व्यवस्था भी बनी रहनी चाहिए। संपादकीय दृष्टिकोण ULI को केवल बैंकिंग तकनीक का नया अध्याय मानना इसके व्यापक महत्व को कम करके देखना होगा। UPI ने भुगतान के क्षेत्र में डिजिटल ढांचे को नया स्वरूप दिया; ULI का उद्देश्य ऋण वितरण की प्रक्रिया को अधिक एकीकृत और डेटा-सक्षम बनाना है। RBI के स्तर पर भी ULI को डिजिटल वित्तीय ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन किसी भी डिजिटल व्यवस्था की सफलता केवल उसके API, उपयोगकर्ताओं या लेन-देन की संख्या से तय नहीं होती। असली कसौटी यह होगी कि क्या छोटे किसान, सूक्ष्म कारोबारी, स्वरोजगार से जुड़े लोग और सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक कागजी जटिलता के औपचारिक ऋण तक पहुंच बना पाते हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि तेज ऋण वितरण के नाम पर जोखिम आकलन कमजोर न हो। आसान कर्ज और जिम्मेदार कर्ज—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता के लिए अनिवार्य है। भारत की डिजिटल यात्रा अब भुगतान से आगे बढ़कर क्रेडिट इन्फ्रास्ट्रक्चर के चरण में प्रवेश कर रही है। ULI इस परिवर्तन की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। इसके माध्यम से ऋणदाता और डिजिटल डेटा सेवाओं के बीच तकनीकी एकीकरण बढ़ने की संभावना है, जिससे ऋण प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। परंतु तकनीक तभी जनहितकारी मानी जाएगी जब सुविधा के साथ पारदर्शिता, सहमति, डेटा सुरक्षा, जिम्मेदार ऋण और डिजिटल समावेशन भी सुनिश्चित हों। भविष्य की डिजिटल ऋण व्यवस्था का लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि कर्ज जल्दी मिले, बल्कि यह भी होना चाहिए कि सही व्यक्ति को सही जानकारी के आधार पर, उचित शर्तों पर और सुरक्षित तरीके से ऋण मिले। यही ULI की वास्तविक परीक्षा होगी—डिजिटल ऋण को तेज बनाने से आगे बढ़कर उसे भरोसेमंद और समावेशी बनाना।

  • दिल्ली में भक्ति का नया अंदाज, ‘भजन क्लबिंग’ में शामिल हुए प्रधानमंत्री मोदी

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह Bhaarataarth.com नई दिल्ली, 26 सितंबर 2026। राजधानी दिल्ली में शुक्रवार शाम आयोजित ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर दीनदयाल उपाध्याय पार्क में हुए इस आयोजन में पारंपरिक भजनों को आधुनिक संगीत कार्यक्रम जैसी प्रस्तुति के साथ पेश किया गया। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी दर्शकों के बीच अग्रिम पंक्ति में बैठे नजर आए। उन्होंने भक्ति गीत सुने, तालियों के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाया और एक मंजीरेनुमा वाद्य यंत्र भी बजाया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोग मौजूद थे। पारंपरिक भजनों को आधुनिक प्रस्तुति का रंग ‘भजन क्लबिंग’ ऐसी प्रस्तुति शैली है, जिसमें पारंपरिक भजन, कीर्तन और भक्ति गीतों को लाइव कॉन्सर्ट जैसे माहौल में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें मंचीय प्रकाश व्यवस्था, आधुनिक ध्वनि प्रणाली और सामूहिक गायन जैसे तत्व शामिल होते हैं, जबकि भजनों की मूल आध्यात्मिक प्रकृति बरकरार रहती है। दिल्ली के कार्यक्रम में भगवान राम और अन्य देवी-देवताओं से जुड़े भक्ति गीत प्रस्तुत किए गए। दर्शकों ने गीतों के साथ तालियां बजाकर और सामूहिक रूप से गाकर सहभागिता की। युवाओं के बीच उभरता सांस्कृतिक प्रारूप ‘भजन क्लबिंग’ को विशेष रूप से युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहे भक्ति संगीत के नए प्रारूप के रूप में देखा जा रहा है। इसमें पारंपरिक धार्मिक संगीत को आधुनिक मंचीय वातावरण में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे युवा दर्शकों की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले जनवरी 2026 में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी भजन क्लबिंग का उल्लेख कर चुके हैं। उन्होंने इसे भक्ति, संस्कृति, आध्यात्मिकता और आधुनिकता के मेल के रूप में बताया था। दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर आयोजन यह कार्यक्रम पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती से जुड़े आयोजनों का हिस्सा था। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके ‘अंत्योदय’ के विचार का उल्लेख किया था। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की मौजूदगी ने भक्ति संगीत की इस आधुनिक प्रस्तुति को व्यापक सार्वजनिक चर्चा में ला दिया। हालांकि, ‘भजन क्लबिंग’ का स्वरूप स्वयं पारंपरिक भक्ति संगीत को आधुनिक मंचीय प्रस्तुति से जोड़ने वाली एक उभरती सांस्कृतिक शैली के रूप में सामने आया है।

  • KYC की पहली धार्मिक यात्रा में कुक्के सुब्रमण्या, धर्मस्थल और सौथड्का महागणपति के दर्शन

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 26 सितंबर 2026। खंडेलवाल युवा चैप्टर बेंगलुरु (KYC), की ओर से आध्यात्मिक एवं सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पहली बार दो दिवसीय धार्मिक यात्रा का आयोजन किया गया। यात्रा के दौरान सदस्यों ने कर्नाटक के धर्मस्थल क्षेत्र और आसपास स्थित प्रमुख मंदिरों में दर्शन कर परिवार, समाज और सभी सदस्यों के सुख-शांति, समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना की। यात्रा के दौरान श्री कुक्के सुब्रमण्या स्वामी मंदिर, श्री मंजुनाथ स्वामी मंदिर, धर्मस्थल और सौथड्का श्री महागणपति मंदिर में श्रद्धापूर्वक दर्शन किए गए। प्रतिभागियों ने मंदिरों में पूजा-अर्चना कर आध्यात्मिक शांति और सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना की। प्रमुख तीर्थस्थलों के किए दर्शन कुक्के सुब्रमण्या स्वामी मंदिर कर्नाटक के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है और भगवान सुब्रमण्या की आराधना के लिए श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है। वहीं श्री मंजुनाथ स्वामी मंदिर, धर्मस्थल दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में अपनी धार्मिक परंपरा और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यात्रा में सौथड्का श्री महागणपति मंदिर के भी दर्शन किए गए। प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित इस धार्मिक स्थल पर सदस्यों ने भगवान महागणपति की आराधना कर सभी के लिए मंगलकामना की। चार सदस्यों ने की सहभागिता KYC की इस पहली पहल में श्री मितेश, श्री राकेश, श्री विवेक और श्री प्रतीक ने सहभागिता की। सदस्यों ने विभिन्न मंदिरों में दर्शन और पूजा-अर्चना कर परिवारों तथा समाज की सुख-समृद्धि की कामना की। आयोजकों के अनुसार, यह खंडेलवाल युवा चैप्टर बेंगलुरु की ओर से धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने की दिशा में शुरुआती पहल है। पहली यात्रा होने के कारण सभी सदस्य इसमें शामिल नहीं हो सके। आगे भी जारी रखने की उम्मीद KYC से जुड़े सदस्यों ने उम्मीद जताई कि भविष्य में अधिक से अधिक सदस्य ऐसी धार्मिक यात्राओं से जुड़ेंगे और सामूहिक रूप से आध्यात्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन तक सीमित न रहकर सदस्यों के बीच धर्म, संस्कार, एकता और सेवा की भावना को मजबूत करना भी बताया गया। यात्रा के समापन पर सभी परिवारों के सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए प्रार्थना की गई। खंडेलवाल युवा चैप्टर बेंगलुरु ने धार्मिक यात्रा को अपनी सामूहिक आध्यात्मिक पहल की शुरुआत बताते हुए भविष्य में भी ऐसी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की भावना व्यक्त की।

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