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संस्थाएं भी मुआवजे की हकदार: कर्नाटक हाईकोर्ट

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 14 अप्रैल
  • 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए एक महत्वपूर्ण और नजीर स्थापित करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के लिए मुआवजे का दावा केवल उसके जैविक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि वे संस्थाएं भी मुआवजे की हकदार हैं, जो मृतक पर आर्थिक या कार्यात्मक रूप से निर्भर थीं।

जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस त्यागराज एन. इनावल्ली की खंडपीठ ने वर्ष 2011 के एक सड़क हादसे से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। इस दुर्घटना में एक जीप और ट्रक की आमने-सामने टक्कर में एक मठ के स्वामी की मृत्यु हो गई थी।


संकीर्ण दृष्टिकोण पर अदालत की टिप्पणी

मामले में पहले मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) ने केवल संपत्ति नुकसान और अंतिम संस्कार के लिए 1.2 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। अधिकरण ने ‘आश्रितता के नुकसान’ के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक का कोई पारिवारिक आश्रित नहीं था।

हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को “संकीर्ण और सीमित” करार देते हुए कहा कि आश्रितता का अर्थ केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है। यह आर्थिक, सामाजिक और कार्यात्मक संबंधों तक भी विस्तृत होता है।


मठ को मिला न्याय

अदालत ने माना कि मठाधिपति केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्था का प्रतिनिधि होता है। उसकी सेवाएं, नेतृत्व और योगदान संस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उसकी मृत्यु से संस्था को वास्तविक नुकसान होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘मोंटफोर्ड ब्रदर्स’ मामले का हवाला देते हुए मठ को कुल 5.94 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही बढ़ी हुई 4.74 लाख रुपये की राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के निर्देश भी जारी किए गए।


संस्थागत आश्रितता को मिली मान्यता

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजा कानून का उद्देश्य केवल पारिवारिक हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन सभी पक्षों को न्याय दिलाना है जो किसी व्यक्ति पर निर्भर थे। अदालत ने कहा कि संस्थागत निर्भरता को भी समान रूप से मान्यता मिलनी चाहिए।


बीमा कंपनी को निर्देश

अदालत ने संबंधित बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह निर्धारित मुआवजा राशि चार सप्ताह के भीतर जमा करे।


व्यापक प्रभाव वाला फैसला

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में कई मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा। इससे धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं को भी राहत मिलेगी, जो अपने प्रमुख व्यक्तियों पर निर्भर रहती हैं। यह फैसला न केवल न्यायिक संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि मुआवजा कानून की व्याख्या को अधिक मानवीय और व्यावहारिक बनाता है।

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