ध्यान और मस्तिष्क की तरंगों से बदल सकता है अवचेतन मन: मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज
- धन्नाराम चौधरी

- 6 अग॰
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बेंगलुरु प्रवचन में बताया— मस्तिष्क की पाँच तरंगों, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से तनावमुक्त, संतुलित और सफल जीवन का निर्माण संभव।

श्री ज्ञानोदय दिगम्बर जैन परिसर, तुबरहल्ली में मस्तिष्क विज्ञान एवं ध्यान पर प्रवचन देते निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज।
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) 5 अगस्त, 2026 | बेंगलुरु ध्यान और मस्तिष्क की तरंगें यदि सही दिशा में समझी जाएं, तो व्यक्ति अपने अवचेतन मन (Subconscious Mind) का सकारात्मक रूपांतरण कर सकता है। यही प्रेरणादायी संदेश निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने बुधवार को श्री ज्ञानोदय दिगम्बर जैन परिसर, तुबरहल्ली, बेंगलुरु में आयोजित विशेष प्रवचन के दौरान दिया। उन्होंने आध्यात्मिक दर्शन और आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करते हुए बताया कि ध्यान, सजगता और आत्मचिंतन केवल धार्मिक साधनाएं नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ऐसी प्रक्रियाएं हैं, जो व्यक्ति के मस्तिष्क, विचारों और व्यक्तित्व में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।
प्रवचन के आरंभ में मुनि श्री ने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी बाधा बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की कमी, भय, नकारात्मक सोच और स्वयं पर संदेह हैं। जब व्यक्ति अपने मन में लगातार नकारात्मक विचारों को स्थान देता है, तब उसकी निर्णय क्षमता, रचनात्मकता और सफलता प्रभावित होने लगती है। उन्होंने कहा कि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है और ध्यान उसका सबसे प्रभावी माध्यम है।
मुनि श्री ने आधुनिक तंत्रिका विज्ञान का उल्लेख करते हुए बताया कि तनाव की स्थिति में शरीर का सहानुभूति तंत्र (Sympathetic Nervous System) सक्रिय हो जाता है, जिससे मस्तिष्क का भय-केन्द्र व्यक्ति को संघर्ष अथवा पलायन (Fight or Flight) की अवस्था में पहुंचा देता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति ध्यान, प्राणायाम और सजग श्वास का नियमित अभ्यास करता है, तब परानुभूति तंत्र (Parasympathetic Nervous System) सक्रिय होता है। इससे मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन, निर्णय क्षमता और विवेक में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने मस्तिष्क की पाँच प्रमुख तरंगों (Brain Waves) का अत्यंत सरल और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि डेल्टा तरंगें गहन निद्रा और गहरे ध्यान की अवस्था का संकेत देती हैं। थीटा तरंगें अवचेतन मन तक पहुंचने, रचनात्मकता और अंतर्ज्ञान को विकसित करती हैं। अल्फा तरंगें मानसिक शांति, तनावमुक्ति और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं। बीटा तरंगें सामान्य दैनिक कार्य, विश्लेषण और निर्णय प्रक्रिया से जुड़ी होती हैं, जबकि गामा तरंगें उच्च चेतना, गहन एकाग्रता और आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति ध्यान के माध्यम से अल्फा और थीटा अवस्था तक पहुंचने का अभ्यास करता है, तो वह अपने अवचेतन मन में सकारात्मक संस्कार स्थापित कर सकता है। यही प्रक्रिया आत्मविश्वास बढ़ाने, भय दूर करने और जीवन में स्थायी परिवर्तन लाने का आधार बनती है।
मुनि श्री ने वर्तमान समय में बढ़ती डिजिटल निर्भरता पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर नकारात्मक सामग्री का लगातार उपभोग मनुष्य की मानसिक ऊर्जा को कमजोर करता है। डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल से दूर रहकर आत्मचिंतन, ध्यान और प्रेरणादायक साहित्य के अध्ययन में लगाएं।
प्रवचन के अंतिम चरण में मुनि श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को लगभग 15 मिनट का विशेष ध्यान-सत्र कराया। इसमें गहरी उदर-श्वास, प्रणव ध्वनि (ॐ) का उच्चारण, आज्ञा चक्र पर सात पंखुड़ियों वाले कमल का ध्यान तथा सकारात्मक आत्म-संकल्पों का अभ्यास कराया गया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार का नियमित अभ्यास मस्तिष्क को तनावपूर्ण सक्रिय अवस्था से निकालकर शांति, एकाग्रता और अवचेतन मन की ग्रहणशील अवस्था में पहुंचाता है।
अपने समापन संदेश में मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने कहा कि "वास्तविक परिवर्तन बाहरी दुनिया बदलने से नहीं, बल्कि अपने विचारों, भावों और चेतना के रूपांतरण से प्रारंभ होता है। जब मन, मस्तिष्क और आत्मा में संतुलन स्थापित हो जाता है, तब सफलता, आत्मिक शांति और आनंद स्वतः प्राप्त होने लगते हैं।"
प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने ध्यान-सत्र में भाग लेकर मानसिक शांति एवं आत्मविकास का अनुभव किया।
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