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मदरसों में वंदे मातरम् विवाद: कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 5 अग॰
  • 3 मिनट पठन

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा— 'ईसाई स्कूलों में भी प्रार्थना होती है, वंदे मातरम् गाने से आसमान नहीं गिर जाएगा'; अनिवार्यता पर याचिकाकर्ताओं ने जताई आपत्ति।


Ornate red-and-cream Gothic building with a central tower and trees in front; small Hindi text फाइल फोटो at bottom right.

कलकत्ता हाई कोर्ट में मदरसों में वंदे मातरम् से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान न्यायालय की कार्यवाही।

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता | 5 अगस्त, 2026 मदरसों में वंदे मातरम् के छह छंदों को अनिवार्य किए जाने से जुड़े विवाद पर कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई सुनवाई ने राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती की मौखिक टिप्पणियां चर्चा का विषय बन गईं। न्यायालय ने कहा कि यदि ईसाई विद्यालयों में सभी छात्र प्रार्थना में शामिल होते हैं, तो वंदे मातरम् गाने से "आसमान नहीं गिर जाएगा"। हालांकि अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि मामले के संवैधानिक और अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी।


यह मामला मदरसों में वंदे मातरम् के छह छंदों को अनिवार्य बनाने के विरोध में दायर जनहित याचिकाओं से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविधान निर्माण के समय व्यापक विचार-विमर्श के बाद केवल पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया था। ऐसे में सभी छह छंदों को अनिवार्य करना संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।


सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से वंदे मातरम् गाना चाहता है तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन इसे अनिवार्य बनाना उचित नहीं है। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसा कदम सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव को प्रभावित कर सकता है। उनका कहना था कि किसी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।


इस पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हजारों ईसाई विद्यालयों में छात्र नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं और इससे कोई असाधारण स्थिति उत्पन्न नहीं होती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति से उसके धर्म से अलग कोई कथन दोहराने को कहा जाए, तो क्या इससे उसकी धार्मिक पहचान समाप्त हो जाएगी? अदालत की यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से की गई, जिस पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी आना बाकी है।


पीठ ने यह भी पूछा कि क्या अब तक किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई की गई है जिसने वंदे मातरम् नहीं गाया हो। अदालत ने संकेत दिया कि यदि अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है, तो अंतरिम राहत देने की आवश्यकता पर भी विचार किया जाएगा।


मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल धीरज कुमार त्रिवेदी ने अंतरिम रोक की मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कुछ जनहित याचिकाएं केवल प्रचार प्राप्त करने के उद्देश्य से दायर की जाती हैं। वहीं अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि इस विषय पर संसद में पहले भी विस्तृत बहस हो चुकी है।


सुनवाई के दौरान अदालत ने मुख्य रूप से यह जानने का प्रयास किया कि संबंधित अधिसूचना जारी करने का अधिकार क्षेत्र क्या था और क्या उसके तहत किसी प्रकार की बाध्यकारी या दंडात्मक व्यवस्था बनाई गई है। फिलहाल अदालत ने मामले की सुनवाई जारी रखते हुए सभी पक्षों के तर्क दर्ज किए हैं।


इसी बीच न्यायपालिका से जुड़े एक अन्य कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि आज के डिजिटल युग में न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियां कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए न्यायिक टिप्पणियों को संदर्भ सहित समझने की आवश्यकता पर बल दिया।


इस पूरे मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। अंतिम निर्णय आने तक इस मामले पर सभी की निगाहें कलकत्ता हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी रहेंगी।

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