ध्यान और मस्तिष्क विज्ञान का अद्भुत संबंध: मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज ने बताए वैज्ञानिक रहस्य
- धन्नाराम चौधरी

- 4 अग॰
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बेंगलुरु प्रवचन में कहा— ध्यान केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि मस्तिष्क, हार्मोन, पाचन तंत्र और व्यक्तित्व को सकारात्मक रूप से बदलने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

मेनिफेस्टेशन में न्यूरो एवं फिजियो परिवर्तन" विषय पर प्रवचन देते निर्यापक मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज।
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 4 अगस्त, 2026 ध्यान और मस्तिष्क विज्ञान के बीच संबंध को लेकर अक्सर अनेक प्रश्न उठते हैं, लेकिन क्या वास्तव में ध्यान मस्तिष्क की संरचना, हार्मोन, पाचन तंत्र और व्यक्तित्व को बदल सकता है? बेंगलुरु में आयोजित एक विशेष प्रवचन में निर्यापक मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज ने इस विषय पर प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करते हुए बताया कि नियमित ध्यान केवल धार्मिक साधना नहीं, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व को सकारात्मक दिशा देने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
"मेनिफेस्टेशन में न्यूरो एवं फिजियो परिवर्तन वैज्ञानिक तरीके से जानें" विषय पर आयोजित प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि जीवन की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर बैठा आत्मसंदेह, भय और नकारात्मक चिंतन है। यदि व्यक्ति अपने मन को समझकर ध्यान, आत्मचिंतन और सकारात्मक विचारों का अभ्यास करे तो वह अपने जीवन में स्थायी और गहरे परिवर्तन ला सकता है।
मुनि श्री ने आधुनिक न्यूरोसाइंस (Neuroscience) का उल्लेख करते हुए बताया कि जब व्यक्ति भय, क्रोध, चिंता या तनाव में रहता है, तब मस्तिष्क का एमिग्डाला (Amygdala) अधिक सक्रिय हो जाता है। इससे तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन शरीर में अधिक मात्रा में बनने लगते हैं, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करते हैं।
इसके विपरीत, नियमित ध्यान और मानसिक एकाग्रता का अभ्यास मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) को सक्रिय करता है। यह मस्तिष्क का वह भाग है जो निर्णय क्षमता, एकाग्रता, स्मरण शक्ति, भावनात्मक नियंत्रण और सकारात्मक सोच को मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों में मानसिक स्थिरता और भावनात्मक संतुलन अधिक देखा जाता है।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने आंत और मस्तिष्क (Gut-Brain Connection) के संबंध को भी सरल भाषा में समझाया। उन्होंने बताया कि सकारात्मक मानसिक स्थिति का सीधा प्रभाव पाचन तंत्र पर पड़ता है। जब मन शांत और संतुलित रहता है, तब शरीर में लाभकारी जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ती है, जिससे स्वास्थ्य बेहतर होता है।
उन्होंने कहा कि ध्यान के अभ्यास से शरीर में एंडोर्फिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन और डोपामिन जैसे लाभकारी रसायनों का स्राव बढ़ता है। ये रसायन व्यक्ति को प्रसन्नता, आत्मविश्वास, भावनात्मक स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। यही कारण है कि नियमित ध्यान करने वाले लोग तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत शांत और संतुलित बने रहते हैं।
मुनि श्री ने विशेष रूप से वात्सल्य, क्षमा, करुणा और मैत्रीभाव जैसे सकारात्मक गुणों पर जोर देते हुए कहा कि ये केवल आध्यात्मिक मूल्य नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं। उन्होंने कहा कि सकारात्मक भावनाएं शरीर में स्वास्थ्यवर्धक जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय करती हैं।
अपने प्रेरक संबोधन में उन्होंने न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) की अवधारणा को भी समझाया। उन्होंने कहा कि निरंतर सकारात्मक चिंतन, ध्यान और आत्मजागरण के अभ्यास से मस्तिष्क में नए तंत्रिका मार्ग विकसित होते हैं। इससे व्यक्ति अपनी पुरानी नकारात्मक आदतों, भय और मानसिक सीमाओं को पीछे छोड़कर नए और सकारात्मक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री का यह संदेश विशेष रूप से श्रद्धालुओं के मन को छू गया कि "हमारा सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर बैठा आत्मसंदेह है।" उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए केवल परिस्थितियों को दोष देता है, तब वह स्वयं की वास्तविक शक्ति को पहचानने से दूर हो जाता है।
उन्होंने निष्कर्ष रूप में कहा कि ध्यान कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो मन, मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करती है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करे, तो वह न केवल मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है, बल्कि अपने जीवन की दिशा और दशा भी बदल सकता है।
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