ज्ञानोदय परिसर में मंगल कलश स्थापना से गूंजा धर्मनाद, वर्षायोग चातुर्मास 2026 का भव्य शुभारंभ
- धन्नाराम चौधरी

- 11 अग॰
- 7 मिनट पठन

मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में उमड़ा श्रद्धा सैलाब; आत्मचिंतन, संयम और धर्मसाधना को जीवन में उतारने का संदेश
भारतार्थ खबर। बेंगलुरु संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 10 अगस्त, 2026। ज्ञानोदय परिसर, इनर रिफ्लेक्शन सेंटर, तुबरहल्ली में रविवार को वर्षायोग चातुर्मास 2026 का भव्य और आध्यात्मिक शुभारंभ हुआ। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में आयोजित मंगल कलश स्थापना समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। मंगल कलशों की विधि-विधानपूर्वक स्थापना के साथ आगामी चार माह के वर्षायोग चातुर्मास 2026 का मंगल आगाज हुआ।
समारोह में धर्म, भक्ति, संयम और आत्मचिंतन का प्रभावशाली वातावरण देखने को मिला। कार्यक्रम के दौरान आचार्य परंपरा का स्मरण, मंगलाचरण, दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरण, प्रवचन, अतिथि सम्मान, श्रीफल अर्पण तथा भक्ति-सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आयोजन को विशेष आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। इसके बाद दीप प्रज्वलन एवं पूज्य आचार्यों के चित्रों का अनावरण किया गया। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज तथा नव आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आचार्य परंपरा का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रतिष्ठाचार्य ब्र. प्रदीप भैया (सुयश) ने किया। श्री मुकेश भाईजी एवं विभिन्न समितियों ने अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया।
स्वागत उद्बोधन में श्री राकेश बरया ने मुनिसंघ, अतिथियों और उपस्थित समाजबंधुओं का अभिनंदन किया। समारोह में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विशिष्ट अतिथियों और समाजजनों की उपस्थिति रही। आईपीसी के प्रबंध निदेशक एवं एनएचपीसी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्री अनिमेष सिन्हा का विशेष सम्मान किया गया। जस्टिस देसाई, डीजी जिनेंद्र जी, बिजापुर से पधारे श्री शीतल जी, आईएएस श्री मनोज पाटनी तथा आईआरएस श्री सौरभ जैन सहित अनेक गणमान्य अतिथियों ने समारोह की शोभा बढ़ाई।
मंगल कलश स्थापना बना समारोह का मुख्य आकर्षण
वर्षायोग चातुर्मास 2026 के शुभारंभ अवसर पर मंगल कलश स्थापना समारोह का प्रमुख आकर्षण रही। विभिन्न आध्यात्मिक भावनाओं और आचार्य परंपराओं को समर्पित मंगल कलशों की विधि-विधान और श्रद्धापूर्वक स्थापना की गई।
इनमें अमृत सर्वार्थ सिद्धि कलश, आचार्य विद्यासागर शिविर कलश, अमृत सिद्धि कलश, सर्वार्थ सिद्धि कलश, सिद्धि कलश, अर्हत परमेष्ठी कलश, सिद्ध परमेष्ठी कलश, आचार्य परमेष्ठी कलश, उपाध्याय परमेष्ठी कलश, साधु परमेष्ठी कलश, आचार्य शांतिसागर कलश और आचार्य समयसागर कलश शामिल रहे।
प्रथम कलश के पुण्यार्जक श्री महेश-मंजू काला, श्री अंकित-कृतिका काला एवं परिवार रहे। काला परिवार ने प्रथम कलश स्थापना का पुण्य प्राप्त करते हुए चातुर्मास के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण व्यक्त किया।
अन्य मंगल कलशों के पुण्यार्जक परिवारों में श्री दिवाकर चित्तौड़ा, श्रीमती शिल्पी, यति, रिति एवं गुणमाला जैन; श्री नाथूलाल जैन, श्रीमती प्रभा जैन, रितेश जैन, शैली जैन, हितार्थ, क्रिशा जैन एवं परिवार; श्री अनिल कुमार जैन एवं श्रीमती उमा देवी जैन, सलामतपुर; श्री कमल, शालिनी, कृति जैन एवं परिवार; श्री नथमल, प्रतीक, अनुश्री, पविद्य एवं श्रेयांशी बाकलीवाल, नागौर-बेंगलुरु; श्रीमती आरती धिरज कलमकर, बेंगलुरु एवं श्री भरत राजकुमार जैन, नागपुर परिवार; श्री सुरेश-शारदा जैन, भानु भारती जैन एवं परिवार; श्री मुकेश, रक्षा भाईजी, आशी, अनिमेष भाईजी एवं परिवार तथा श्री वैभव, नेहा, नेवान, निर्वाण एवं अभय कुमार जी जैन शामिल रहे।

मुनि श्री धवलसागर जी ने समझाया मंगल कलश का आध्यात्मिक अर्थ
मंगल कलश स्थापना के प्रथम आध्यात्मिक चरण में मुनि श्री 108 धवलसागर जी महाराज ने प्रभावशाली मंगल प्रवचन दिया। उन्होंने कलश के आध्यात्मिक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि मंगल कलश केवल मिट्टी या धातु का पात्र नहीं, बल्कि मनुष्य के घट यानी शरीर और आत्मा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मंगल कलश में पवित्र जल और औषधियों की स्थापना की जाती है, उसी प्रकार चातुर्मास का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के हृदय रूपी घट को सम्यक्त्व, संयम, भक्ति और वात्सल्य के भावों से भरना है।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि केवल बाहरी रूप से कलश की स्थापना कर देना पर्याप्त नहीं है। उसके साथ व्यक्ति को अपने भीतर भी मंगल भावों की स्थापना करनी चाहिए। वर्षायोग चातुर्मास 2026 आत्मनिरीक्षण का ऐसा अवसर है, जिसमें व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को देखकर उनमें सकारात्मक परिवर्तन का प्रयास कर सकता है।
इनर रिफ्लेक्शन सेंटर के संदर्भ में उन्होंने बेंगलुरु जैसे आधुनिक और तकनीकी महानगर में आत्मचिंतन की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक और निरंतर भागदौड़ से भरे जीवन में मनुष्य को समय निकालकर अपने भीतर लौटने और स्वयं को देखने की आवश्यकता है।
उन्होंने साधर्मिक वात्सल्य और संघबद्धता को भी चातुर्मास की महत्वपूर्ण भावना बताया। उनके अनुसार चातुर्मास केवल व्यक्तिगत साधना का अवसर नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, सहयोग, वात्सल्य और धर्मप्रभावना को मजबूत करने का भी समय है।
मुनि श्री वीरसागर जी का ‘आत्म-सिलिकॉन वर्षायोग’ संदेश
समारोह का विशेष आकर्षण निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज का मंगल प्रवचन रहा। उन्होंने बेंगलुरु की पहचान सिलिकॉन सिटी के रूप में करते हुए धर्म, तकनीक और आत्मविकास के बीच एक प्रेरणादायी संबंध प्रस्तुत किया।
उन्होंने ‘आत्म-सिलिकॉन वर्षायोग’ की संकल्पना समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार सिलिकॉन चिप तकनीक और संचार की बाहरी दुनिया में विभिन्न प्रणालियों को जोड़ने का माध्यम बनती है, उसी प्रकार धर्म, संयम, ध्यान और आत्मचिंतन व्यक्ति को आत्मिक विकास की दिशा में जोड़ सकते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि बाहरी तकनीकी प्रगति के साथ यदि व्यक्ति अपने भीतर का विकास भी करता है, तभी जीवन अधिक सार्थक बन सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने भीतर मौजूद क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को पहचानने और उन्हें कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
उन्होंने विशेष रूप से लोभ और बढ़ती तृष्णा के प्रभाव को समझाते हुए कहा कि अधिक पाने की निरंतर इच्छा मानसिक अशांति और अनेक विकारों का कारण बन सकती है।
मुनिश्री ने मान और आत्मसम्मान के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि मान बाहरी प्रशंसा और दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर करता है, जबकि आत्मसम्मान भीतर से उत्पन्न होने वाली स्थिर भावना है। जब व्यक्ति अपने मान को दूसरों के व्यवहार से जोड़ देता है और अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता, तो असंतोष और क्रोध पैदा हो सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि चातुर्मास के दौरान अपने भावों को पहचानें, आत्मचिंतन करें और भावशुद्धि की दिशा में निरंतर आगे बढ़ें।
अतिथियों का सम्मान, मंदिर प्रतिनिधियों ने अर्पित किए श्रीफल
कार्यक्रम के अगले चरण में मंगल कलश स्थापना, अतिथि सम्मान और विभिन्न जैन मंदिरों के पदाधिकारियों एवं प्रतिनिधियों द्वारा श्रीफल भेंट करने का क्रम हुआ।
आईपीसी के प्रबंध निदेशक एवं एनएचपीसी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्री अनिमेष सिन्हा का जीवदया, परोपकार, समाजसेवा और निःस्वार्थ सेवा के क्षेत्र में योगदान के लिए विशेष अभिनंदन किया गया।
जस्टिस देसाई, डीजी जिनेंद्र जी, बिजापुर से आए श्री शीतल जी, आईएएस श्री मनोज पाटनी और आईआरएस श्री सौरभ जैन सहित अनेक गणमान्य अतिथियों का भी सम्मान किया गया।
बेंगलुरु के विभिन्न जैन मंदिरों के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने मुनिसंघ के वर्षायोग के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए श्रीफल अर्पित किए। इससे समारोह को व्यापक सामाजिक और धार्मिक स्वरूप मिला।
मुनि श्री विशालसागर जी ने दिया संयमित जीवन का संदेश

मुनि श्री 108 विशालसागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में सम्यक दर्शन, श्रावक धर्म और संयमित जीवनशैली को चातुर्मास की साधना का महत्वपूर्ण आधार बताया।
उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन केवल धार्मिक सिद्धांतों को जानना या ग्रंथों का अध्ययन करना नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब धार्मिक विचार व्यक्ति के जीवन और व्यवहार का हिस्सा बनते हैं।
उन्होंने मुनिसंघ की वैयावृत्ति, देव-शास्त्र-गुरु की भक्ति एवं पूजन तथा क्षमता के अनुसार व्रत और नियम धारण करने की प्रेरणा दी।
मुनिश्री ने मान और अहंकार से बचने का संदेश देते हुए कहा कि धार्मिक उपलब्धियां, सम्मान या किसी धार्मिक दायित्व को व्यक्ति की प्रतिष्ठा और अहंकार की संतुष्टि का साधन नहीं बनना चाहिए। धर्म का उद्देश्य भीतर के अहंकार को कम करना और विनम्रता विकसित करना है। उन्होंने युवा पीढ़ी को जैन संस्कारों से जोड़ने पर भी जोर दिया। दैनिक जीवन में धार्मिक अनुशासन, रात्रि भोजन त्याग, देवदर्शन, स्वाध्याय और शुद्ध खान-पान जैसे नियमों को अपनाने की प्रेरणा दी।
‘प्रभु को जीवन साथी बनाएं’—मुनि श्री वीरसागर जी
कार्यक्रम के अंतिम आध्यात्मिक चरण में मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने पुनः मंगल प्रवचन दिया। उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म को केवल धार्मिक अवसरों तक सीमित न रखते हुए जीवन की नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने व्यापार, नौकरी और जीवन में मूलनायक भगवान एवं इष्टदेव को सहभागी बनाए। मुनिश्री ने शुद्ध आय का कम से कम दस प्रतिशत दान, जीवदया, मुनि-वैयावृत्ति और धर्मकार्यों के लिए समर्पित करने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों और आय में धर्म को भी सहभागी बनाता है तो जीवन केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रहता। सेवा, दान, जीवदया, गुरु-वैयावृत्ति और स्वाध्याय को जीवन की प्राथमिकताओं में स्थान देने से आत्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने बेंगलुरु में हो रहे विभिन्न धार्मिक एवं मंदिर निर्माण कार्यों के लिए मंगल आशीर्वाद देते हुए समस्त जैन समाज को आगामी चार माह तक संयम, स्वाध्याय, धर्मसाधना और गुरु-वैयावृत्ति से जुड़े रहने की प्रेरणा दी।
भक्ति और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
आध्यात्मिक प्रवचनों के साथ समारोह में भक्ति और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी श्रद्धालुओं को भावविभोर किया। संगीतकार सुनील ने अपनी संगीत प्रस्तुति से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। बच्चों की मनोहारी नृत्य प्रस्तुति ने भी उपस्थित अतिथियों और श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
बच्चों की प्रस्तुतियों में धार्मिक भावनाओं और संस्कारों की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली। इससे समारोह में आध्यात्मिकता के साथ सांस्कृतिक रंग भी जुड़ गया।
चार माह तक धर्म-साधना का केंद्र बनेगा ज्ञानोदय परिसर
दिगंबर जैन परंपरा में वर्षायोग चातुर्मास का विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु में मुनिराज एक स्थान पर स्थिर रहकर साधना, ध्यान, स्वाध्याय और धर्मप्रभावना करते हैं। यह अवधि श्रावकों के लिए भी मुनिसंघ के सान्निध्य में धर्मश्रवण, तप, संयम और आत्मचिंतन का विशेष अवसर प्रदान करती है।
ज्ञानोदय परिसर, इनर रिफ्लेक्शन सेंटर, तुबरहल्ली में वर्षायोग चातुर्मास 2026 के दौरान विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन होगा। इनमें अभिषेक एवं शांतिधारा, मंगल प्रवचन, स्वाध्याय, प्रश्न-समाधान, आरती, भक्ति और अन्य धार्मिक कार्यक्रम शामिल रहेंगे।
मंगल कलश स्थापना के साथ शुरू हुआ यह चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने, अहंकार कम करने, भावशुद्धि, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है।
यह आयोजन स्वर्गीय श्री मिश्रीलाल जी काला एवं स्वर्गीय श्रीमती फूलादेवी काला के परिवार के पुण्यार्जकत्व में सम्पन्न हुआ। इसमें महेश कुमार एवं मंजू देवी काला, अंकित एवं कृतिका काला तथा परिवारजनों का विशेष योगदान रहा।
समापन अवसर पर श्री वैभव जैन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुनिसंघ, सभी अतिथियों, पुण्यार्जक परिवारों, मंदिर पदाधिकारियों, श्रद्धालुओं और कार्यक्रम में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी समाजबंधुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
समारोह के बाद सभी अतिथियों एवं श्रद्धालुओं ने वात्सल्य भोजन में सहभागिता की।
मंगल कलश स्थापना के साथ वर्षायोग चातुर्मास 2026 का शुभारंभ ज्ञानोदय परिसर में आध्यात्मिक जागरण के नए अध्याय की शुरुआत के रूप में हुआ। आगामी चार माह मुनिसंघ के सान्निध्य में धर्म, संयम, स्वाध्याय, सेवा, आत्मचिंतन और साधना के संदेश को समाज तक पहुंचाने का अवसर बनेंगे।
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