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कर्नाटक में ‘गारंटी’ पर चुनाव आयोग की सख्ती

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 5 days ago
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। कर्नाटक में उपचुनाव से ठीक पहले कांग्रेस सरकार की चर्चित ‘गारंटी योजनाएं’ राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के केंद्र में आ गई हैं। भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई) ने इन योजनाओं के तहत कथित रूप से धन वितरण को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है, जिससे सियासी माहौल गरमा गया है।

आयोग ने राज्य की मुख्य सचिव शालिनी रजनीश को 2 अप्रैल 2026 को पत्र भेजकर पूछा है कि आचार संहिता लागू रहने के दौरान बिना पूर्व अनुमति लाभार्थियों को धनराशि जारी करने का निर्णय किस स्तर पर और किन अधिकारियों द्वारा लिया गया। आयोग ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि किसी योजना के तहत धनराशि अभी तक वितरित नहीं हुई है, तो उसे आयोग की अनुमति के बिना जारी न किया जाए।


मामला उस समय तूल पकड़ गया जब कांग्रेस ने मंगलवार को इस पत्र को सार्वजनिक किया। जानकारी के अनुसार, दावणगेरे और बागलकोट जिलों में ‘गृह लक्ष्मी’, ‘युवा निधि’, ‘शक्ति’, ‘गृह ज्योति’ और ‘अन्न भाग्य’ जैसी योजनाओं के तहत लाभार्थियों को हाल में भुगतान किए जाने की बात सामने आई है। चुनाव आयोग ने इसे आचार संहिता लागू होने के दौरान नई वित्तीय लाभ वितरण की श्रेणी में माना है, जो नियमों के विरुद्ध है। राजनीतिक मोर्चे पर भी इस मुद्दे ने तेजी से तूल पकड़ लिया है। राज्य के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे भारतीय जनता पार्टी की साजिश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा गरीबों, महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को मिलने वाले लाभों को रोकने की कोशिश कर रही है।


शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि मार्च माह की किस्तें पहले ही समय पर वितरित की जा चुकी हैं और अप्रैल की राशि उपचुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही जारी की जाएगी। उन्होंने भरोसा जताया कि जनता इस मुद्दे पर अपना निर्णय वोट के जरिए देगी।

उधर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक में ‘गारंटी योजनाएं’ कांग्रेस सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में रही हैं और इन पर चुनाव आयोग की सख्ती से चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह विवाद न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बल्कि चुनावी नैतिकता पर भी व्यापक बहस को जन्म दे रहा है। फिलहाल, सभी की नजरें चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई और राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि ‘गारंटी राजनीति’ का यह मुद्दा चुनावी नतीजों को किस हद तक प्रभावित करता है।

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