अवचेतन मन की शक्ति से आत्मपरिवर्तन संभव: मुनि वीरसागर
- धन्नाराम चौधरी

- 8 अग॰
- 4 मिनट पठन

“विज़ुअलाइज़ेशन शेखचिल्ली बनना नहीं”, वर्तमान में जीने और ज्ञाता-द्रष्टा भाव से बदलेगा जीवन
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 08 अगस्त, 2026 बेंगलुरु, 8 अगस्त 2026। मन की शक्ति, अवचेतन मन की कार्यप्रणाली और आत्मपरिवर्तन की आध्यात्मिक प्रक्रिया को सरल एवं प्रभावशाली ढंग से समझाते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने “क्या विज़ुअलाइज़ेशन करना शेखचिल्ली बनना है?” विषय पर प्रेरक प्रवचन दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कल्पनाओं में खो जाना और किसी श्रेष्ठ लक्ष्य को विश्वास, संकल्प, पुरुषार्थ तथा निरंतर साधना के साथ अपने जीवन में उतारना एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में केवल जाग्रत चेतना ही सक्रिय नहीं रहती, बल्कि अवचेतन मन के स्तर पर भी अनुभव, संस्कार, विचार और प्रतिक्रियाएं लगातार अपना प्रभाव डालते रहते हैं। यदि व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और जागरूकता के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना सीख ले, तो आत्मनिरीक्षण और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
कल्पना और संकल्प में समझें अंतर
प्रवचन का प्रमुख केंद्र विज़ुअलाइज़ेशन, सकारात्मक चिंतन और संकल्प रहा। मुनि श्री ने शेखचिल्ली के उदाहरण के माध्यम से समझाया कि केवल बड़े-बड़े सपने देखना और उनके लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं करना कल्पना मात्र है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक संकल्प वह है जिसमें व्यक्ति अपने श्रेष्ठ लक्ष्य को केवल सोचता नहीं, बल्कि उसके प्रति आंतरिक विश्वास विकसित करता है और फिर उसी दिशा में निरंतर पुरुषार्थ करता है। सकारात्मक चिंतन का अर्थ वास्तविकता से भागना नहीं, बल्कि अपनी चेतना को सकारात्मक दिशा देकर कर्म और आचरण में उसका प्रभाव दिखाई देना है।

“भूत सपना, वर्तमान अपना, भावी कल्पना”
मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने वर्तमान क्षण के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रसिद्ध पंक्ति “भूत सपना, वर्तमान अपना, भावी कल्पना” का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि बीता हुआ समय वापस नहीं आता और भविष्य अभी हमारे सामने उपस्थित नहीं है। इसके बावजूद मनुष्य अक्सर अतीत के पश्चाताप और भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान गंवा देता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत वर्तमान क्षण में जागरूक होकर जीने से होती है। व्यक्ति के पास जो समय और अवसर अभी उपलब्ध है, उसका विवेकपूर्ण उपयोग ही जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है।
“मैं क्रोधित हूं” नहीं, “मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हो रहा है”
प्रवचन में ज्ञाता-द्रष्टा भाव को आत्मपरिवर्तन की महत्वपूर्ण कुंजी के रूप में समझाया गया। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने क्रोध, भय, चिंता और अन्य भावनाओं का दास बनने के बजाय उनका साक्षी बनने का अभ्यास करना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “मैं क्रोधित हूं” और “मेरे भीतर क्रोध का भाव उत्पन्न हो रहा है”—इन दोनों वाक्यों में दृष्टिकोण का बड़ा अंतर है। दूसरे भाव में व्यक्ति अपने भीतर उठ रहे विचार या भावना को देखने वाला बनता है। इससे तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय सजग होकर स्थिति को समझने की संभावना बढ़ती है।
मुनि श्री ने कहा कि जब व्यक्ति अपने भावों को पहचानना और उन्हें बिना तत्काल प्रतिक्रिया के देखना सीखता है, तो वह धीरे-धीरे प्रतिक्रियाशीलता से आत्मनिरीक्षण और आत्मसंयम की ओर बढ़ सकता है।
“शुद्धोऽहम्” और “आनंदस्वरूपोऽहम्” के भाव का अभ्यास
मुनि श्री ने जैन आध्यात्मिक परंपरा में आत्मबोध से जुड़े “शुद्धोऽहम्” और “आनंदस्वरूपोऽहम्” जैसे भावों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल शब्दों का उच्चारण करना ही पर्याप्त नहीं है।

उन्होंने समझाया कि साधना का वास्तविक उद्देश्य इन भावों को अपने अंतर्मन में अनुभव करने का प्रयास करना है। जब कोई व्यक्ति किसी श्रेष्ठ भाव को बार-बार जागरूकता के साथ धारण करता है और उसके अनुरूप अपने व्यवहार को दिशा देने का प्रयास करता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया विकसित हो सकती है।
मुनि श्री के अनुसार, विचारों और भावनाओं के प्रति सजगता व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समझने तथा अपने आचरण में आवश्यक सुधार करने का अवसर देती है।
अवचेतन मन को समझने पर जोर
प्रवचन के दौरान अवचेतन मन की शक्ति को समझाते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य के भीतर अनेक पुराने अनुभव, संस्कार और प्रतिक्रियाएं अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कई बार व्यक्ति बिना पूरी जागरूकता के भी किसी परिस्थिति पर प्रतिक्रिया कर देता है।
ऐसे में आत्मनिरीक्षण का अभ्यास व्यक्ति को यह पहचानने में मदद कर सकता है कि उसके भीतर कौन-से विचार और भाव सक्रिय हैं। मुनि श्री ने चेतना को जागृत करने और अपने मन को देखने की प्रक्रिया को आत्मपरिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
उन्होंने कहा कि मन को दबाने के बजाय उसे समझना और उसके प्रति सजग होना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को देखने वाला बनता है, तब वह अपने व्यवहार में अधिक विवेक और संयम लाने का प्रयास कर सकता है।
सामूहिक जाप और निर्देशित ध्यान से साधना
प्रवचन के अंतिम चरण में मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को निर्देशित ध्यान और सामूहिक जाप का अभ्यास कराया। इस दौरान साधकों को मन को शांत करने तथा अपने भीतर पवित्रता, शांति और आत्मबोध के भाव जागृत करने की प्रेरणा दी गई।
“शुद्धोऽहम्” के भाव के साथ श्रद्धालुओं को अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की ओर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास कराया गया। इससे प्रवचन का वातावरण आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन से भर उठा।
संकल्प के साथ शुरू होता है परिवर्तन
प्रवचन के दौरान मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने संदेश दिया कि परिवर्तन किसी दूर के भविष्य में नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में जागरूकता के साथ शुरू होता है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने भीतर सकारात्मक भाव को विश्वास और संकल्प के साथ धारण करता है तथा उसे अपने पुरुषार्थ और आचरण से जोड़ता है, तो उसके विचार और व्यवहार भी उसी दिशा में विकसित होने लगते हैं।
मुनि श्री के इस संदेश ने श्रद्धालुओं को यह समझने की प्रेरणा दी कि सकारात्मक चिंतन केवल कल्पना नहीं, बल्कि जागरूकता, संकल्प, साधना और पुरुषार्थ से जुड़ी जीवन प्रक्रिया है।
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