स्वस्थ शरीर से ही धर्माराधना संभव: साध्वी प्रियश्रद्धांजना श्री जी ने बताए निरोगी काया के सूत्र
- धन्नाराम चौधरी

- 8 अग॰
- 3 मिनट पठन

बसवनगुडी में चातुर्मास प्रवचन के दौरान संतुलित-सात्विक आहार, संयम और स्वास्थ्य को बताया धर्म साधना का आधार
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु, कर्नाटक | 08 अगस्त, 2026 स्वस्थ शरीर से ही धर्माराधना संभव है।” बेंगलुरु के बसवनगुडी स्थित श्री जिन कुशल सूरी जैन दादावाड़ी ट्रस्ट के तत्वावधान में चातुर्मास के अवसर पर आयोजित विशेष प्रवचन में प. पू. साध्वी श्री प्रियश्रद्धांजना श्री जी म. सा. ने श्रद्धालुओं को निरोगी काया, संयमित आहार और संतुलित जीवनशैली का महत्व समझाया। “पहला सुख निरोगी काया” विषय पर आयोजित प्रवचन में साध्वीश्री ने कहा कि शरीर स्वस्थ रहेगा तो व्यक्ति सहजता से धर्माराधना, सेवा और आध्यात्मिक साधना कर सकेगा।
उन्होंने कहा कि शरीर में किसी प्रकार की व्याधि या अस्वस्थता होने पर व्यक्ति के दैनिक जीवन के साथ-साथ उसकी धार्मिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं। साध्वीश्री ने निरोगी शरीर को मनुष्य की महत्वपूर्ण संपदा बताते हुए कहा कि संसार की अनेक भौतिक वस्तुएं धन खर्च करके प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन अच्छी सेहत को केवल धन के बल पर खरीदा नहीं जा सकता। उन्होंने इसे पुण्य और सदाचरण से जुड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
आहार और पानी को बताया जीवन का आधार
प्रवचन के दौरान साध्वी श्री प्रियश्रद्धांजना श्री जी ने आहार और पानी को जीवन का मूल आधार बताते हुए संयमित एवं संतुलित भोजन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो शरीर के लिए हितकारी हो और जीवन में सात्विकता को बढ़ावा दे।
उन्होंने श्रद्धालुओं को भोजन के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि स्वाद के आकर्षण में आवश्यकता से अधिक या अनुचित भोजन करने के बजाय शरीर की आवश्यकता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। उनके अनुसार, भोजन केवल स्वाद की पूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने का महत्वपूर्ण आधार है।
साध्वीश्री ने भोजन और पानी ग्रहण करने की आदतों को लेकर भी कई पारंपरिक सुझाव साझा किए। उन्होंने कहा कि भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना, पानी को धीरे-धीरे पीना और आहार में संयम रखना दैनिक जीवन के लिए उपयोगी अनुशासन हो सकता है।
‘प्रियकारी’ नहीं, ‘श्रेयकारी’ आहार पर जोर
प्रवचन में साध्वीश्री ने प्रियकारी और श्रेयकारी आहार के बीच अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि जो भोजन केवल जीभ को अच्छा लगे, वह जरूरी नहीं कि शरीर के लिए भी हितकारी हो। इसलिए व्यक्ति को स्वाद के बजाय स्वास्थ्य और संयम को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने भोजन में संतुलन और सात्विकता बनाए रखने की प्रेरणा दी तथा कहा कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आहार संबंधी अनुशासन आवश्यक है। विशेष रूप से रात के भोजन, विभिन्न खाद्य पदार्थों के संयोजन और खाली पेट कुछ चीजों के सेवन से जुड़े पारंपरिक नियमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं को सजग रहने का संदेश दिया।
वात, पित्त और कफ के संतुलन का उल्लेख
साध्वीश्री ने भारतीय पारंपरिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए वात, पित्त और कफ के संतुलन को महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने जीवन में अनुशासन, उचित आहार और संयम को स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक बताया।
उन्होंने प्राचीन आयुर्वेदिक परंपरा और आचार्य वाघभट्ट से जुड़े ग्रंथों का उल्लेख करते हुए भोजन और दैनिक जीवन से संबंधित कई पारंपरिक नियमों की जानकारी दी। इनमें सुबह पानी पीने, भोजन को अच्छी तरह चबाने और भोजन-पानी की आदतों में संयम रखने जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
इन बातों को साध्वीश्री ने धार्मिक एवं पारंपरिक जीवनशैली के संदर्भ में श्रद्धालुओं के सामने रखा और नियमित जीवन में अनुशासन अपनाने का संदेश दिया।
प्रतिक्रमण को बताया अनुशासन और साधना का माध्यम
प्रवचन के दौरान जैन धर्म की प्रतिक्रमण परंपरा का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि विधिपूर्वक प्रतिक्रमण करना व्यक्ति के धार्मिक अनुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने इसे शरीर और मन दोनों को साधना से जोड़ने वाली प्रक्रिया के रूप में समझाया।
उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्माराधना के साथ-साथ अपने दैनिक व्यवहार, आहार और जीवनचर्या पर भी ध्यान देने का आह्वान किया। साध्वीश्री के अनुसार, आध्यात्मिक जीवन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि संयमित और जागरूक जीवन जीना भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रविवार को होगा विशेष आयोजन
कार्यक्रम में बताया गया कि रविवार को विशेष कार्यक्रम के दौरान पुण्यशाली शालीभद्र की “99 पेटियां उतारने” से जुड़े प्रसंग का विस्तृत विवेचन किया जाएगा। इस प्रसंग को जीवंत नाटिका के माध्यम से भी प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं को धार्मिक कथा और उसके संदेश को सहज रूप से समझने का अवसर मिलेगा।
आयोजकों के अनुसार, इस विशेष प्रस्तुति का उद्देश्य धार्मिक प्रसंग के माध्यम से त्याग, पुण्य, संयम और आध्यात्मिक मूल्यों को जनमानस तक पहुंचाना है।
चातुर्मास के दौरान आयोजित यह प्रवचन श्रृंखला श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाने का संदेश भी दे रही है। “पहला सुख निरोगी काया” के माध्यम से साध्वीश्री ने यह संदेश दिया कि स्वस्थ शरीर को केवल भौतिक सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि धर्म, सेवा और आत्मिक उन्नति के लिए उपयोगी साधन के रूप में देखना चाहिए।
_edited.jpg)



टिप्पणियां