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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ईडी रेड में दखल पर ममता बनर्जी को झटका, कहा– “आप हम पर हुक्म नहीं चला सकते”

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Mar 18
  • 2 min read

Updated: Mar 20


भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में आई-पैक (I-PAC) कार्यालय पर हुई प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी से जुड़े मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी और उनकी सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप “असामान्य” और “गलत” था।


मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा मामले को टालने की कोशिश पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई और दो टूक कहा— “आप हम पर हुक्म नहीं चला सकते, हम हर पहलू पर विचार करेंगे।”


ईडी रेड में हस्तक्षेप पर कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस घटना पर विशेष टिप्पणी की, जब ईडी की छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी अचानक मौके पर पहुंच गई थीं और अधिकारियों के साथ उनका आमना-सामना हुआ था।


कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति “किसी भी दृष्टि से उचित नहीं” थी और इस तरह की घटनाएं जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। अदालत ने इसे “असामान्य व्यवहार” करार देते हुए सख्त असंतोष व्यक्त किया।


क्या है पूरा मामला

दरअसल, साल की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय ने चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के ठिकानों पर छापेमारी की थी।


यह कार्रवाई कथित हवाला कारोबार और कोयला तस्करी से जुड़े मामलों में की गई थी। छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री के पहुंचने और एजेंसी के अधिकारियों से बहस करने का मामला विवाद का कारण बना।


ममता बनर्जी ने उस समय आरोप लगाया था कि ईडी संवेदनशील राजनीतिक डेटा और हार्ड डिस्क जब्त कर रही है, जिसे लेकर उनकी आपत्ति थी।


सुनवाई टालने की मांग पर कोर्ट सख्त

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की। उनका कहना था कि ईडी द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे पर प्रतिक्रिया देने के लिए और समय चाहिए।


हालांकि, ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया और इसे “देरी की रणनीति” बताया।


इस पर कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि हलफनामा पहले ही दाखिल हो चुका है और अब सुनवाई टालने का कोई ठोस आधार नहीं है।


संविधान पीठ को मामला भेजने की मांग

राज्य सरकार ने इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने की मांग भी की। सरकार का तर्क था कि यह विवाद केंद्र-राज्य संबंधों और संविधान के अनुच्छेद 32 की व्याख्या से जुड़ा है।


सरकार की ओर से कहा गया कि केंद्रीय एजेंसी द्वारा सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करना संघीय ढांचे को प्रभावित करता है और इसकी संवैधानिक समीक्षा जरूरी है।


हालांकि, कोर्ट ने संकेत दिए कि मौजूदा पीठ इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी और सभी पहलुओं पर विचार करेगी।

अदालत की सख्त टिप्पणी से बढ़ी सियासी हलचल


सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। एक ओर जहां विपक्षी दल इसे केंद्र के दखल का मामला बता रहे हैं, वहीं भाजपा इसे कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों के अधिकारों का मुद्दा बता रही है।


फिलहाल, मामले की अगली सुनवाई में यह तय होगा कि जांच एजेंसियों के अधिकारों और राज्य सरकार के हस्तक्षेप की सीमा क्या होगी, जो भविष्य में केंद्र-राज्य संबंधों की दिशा भी तय कर सकती है।

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