₹2584 करोड़ की लघु जलविद्युत योजना को मंजूरी, पहाड़ी क्षेत्रों में विकास की रफ्तार तेज—लाखों रोजगार सृजन का लक्ष्य
- धन्ना राम चौधरी

- 18 मार्च
- 2 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 20 मार्च
भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए लघु जलविद्युत परियोजनाओं (स्मॉल हाइड्रो प्रोजेक्ट्स-एसएचपी) के लिए 2,584.60 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू की जाएगी।
सरकार द्वारा स्वीकृत ‘स्मॉल हाइड्रो पावर डेवलपमेंट स्कीम’ के तहत 1 से 25 मेगावाट क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित किए जाएंगे। विशेष रूप से पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में इस योजना से बड़े पैमाने पर लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, जहां जलविद्युत की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के माध्यम से निर्माण चरण में ही करीब 51 लाख मानव-दिवस रोजगार सृजित होंगे। वहीं, परियोजनाओं के संचालन और रखरखाव के दौरान भी स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। चूंकि ये परियोजनाएं ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में स्थापित होंगी, इससे क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलेगी।
योजना के तहत पूर्वोत्तर राज्यों और अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती जिलों में परियोजनाओं को विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में केंद्र सरकार प्रति मेगावाट 3.6 करोड़ रुपये या कुल परियोजना लागत का 30 प्रतिशत (जो भी कम हो) तक सहायता देगी, जिसकी अधिकतम सीमा 30 करोड़ रुपये प्रति परियोजना निर्धारित की गई है। वहीं अन्य राज्यों के लिए यह सहायता 2.4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 20 प्रतिशत (अधिकतम 20 करोड़ रुपये) तय की गई है।
सरकार ने इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए करीब 2,532 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त, लगभग 200 परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने हेतु केंद्र एवं राज्य एजेंसियों को 30 करोड़ रुपये की सहायता भी दी जाएगी।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना से लघु जलविद्युत क्षेत्र में करीब 15,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हो सकता है, जिससे देश में स्वच्छ और हरित ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती देते हुए सभी परियोजनाओं में 100 प्रतिशत उपकरण और मशीनरी देश में ही निर्मित की जाएगी।
लघु जलविद्युत परियोजनाएं विकेंद्रीकृत प्रकृति की होती हैं, जिससे लंबी ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता कम होती है और बिजली के नुकसान में भी कमी आती है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी ये परियोजनाएं अपेक्षाकृत अनुकूल मानी जाती हैं, क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण, वन कटाई और विस्थापन की आवश्यकता नहीं होती।
सरकार का दावा है कि इस पहल से दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी, स्थानीय निवेश बढ़ेगा और दीर्घकालीन रोजगार के अवसर सृजित होंगे। उल्लेखनीय है कि इस प्रकार की परियोजनाओं की आयु सामान्यतः 40 से 60 वर्षों या उससे अधिक होती है, जिससे स्थायी विकास सुनिश्चित होता है।
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