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सुणजौ रे संसारी लोगों एह्ड़ो जमानो आवेला...

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 6 days ago
  • 9 min read

यह केवल पंक्ति नहीं अपितु पश्चिम राजस्थान के लोक संत कवि राजाराम जी की चेतावनी है, जो लोकत्रंत के आगमन और उसमें निहित सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे सटीक भविष्यवाणी है। संत राजाराम जी लोक में श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में प्रसिद्ध है। संत राजाराम का जन्म जोधपुर के पास शिकारपुरा कस्बे में कलबी (पटेल) कुल में सन् 1882 (संवत 1939, रामनवमी) को हुआ। इसलिए इनकी संत राजाराम की की मुख्य पीठ गाँव शिकारपुरा, तहसील-लूणी, ज़िला जोधपुर, राजस्थान में स्थित है। संत राजाराम जी के अनुयायी मुख्य रूप से राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात में ज्यादा है।


अनुयायी

इनके अनुयायी विशेषकर पटेल समाज के लोग है, जिसे अनेक स्थानों पर अलग अलग नामों से जाना जाता है। राजस्थान के जोधपुर, बालोतरा, बाड़मेर, जालौर और सिरोही में इनके अनुयायी कलबी जाति के है, जिन्हें चौधरी और पटेल भी कहा जाता है। राजस्थान के चितौड़गढ़ जिले और मध्यप्रदेश के उज्जैन और रतलाम जिले में इनके अनुयायियों को आँजणा (पटेल) कहा जाता है। राजाराम जी के जन्म से पहले यह सब जातियाँ की अलग-अलग पहचान थी। मूल रूप से खेती करने वाले लोग इस संप्रदाय के अनुयायी है।

संत राजाराम जी ने सनातन धर्म से अलग कोई नए नियम नहीं बनाये, न ही किसी नई धारा को नहीं पनपाया। जिस समाज में संत का राजाराम का जन्म हुआ, उसी जाति-समाज के सांस्कृतिक गौरव को आगे बढाया। अपनी ही जाति में बढ़ रही रुढियों और अंधविश्वास को मिटाने का प्रयास किया, जिसे एक सामान्य समाज सुधारक करता है। संत राजाराम ने अपने अनुयायियों को इतनी सहूलियत दी कि वह स्वयं कृष्ण भक्त थे, लेकिन स्वयं के नाम के पीछे राम लगा है। भक्ति में निर्गुण राम के स्मरण पर जोर देते हैं जबकि उनके अनुयायी उन्हें कृष्ण अवतार के रूप में पूजते हैं। इस संप्रदाय के अनुयायी सरनेम में आज भी राम नाम लगाते ही है।


उपदेश

इनकी संपूर्ण वाणी लौकिक होने साथ मौखिक वाणी है। इनके बचपन का नाम राजू था। अल्पायु में पिता हरींगाराम और माता मोतीबाई का देहवसान हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई रुघनाथ राम भी साधुओं की जमात में चले गए। सामंती काल में शिक्षा की उपयुक्त व्यवस्था नहीं थी इसलिए वे अल्प शिक्षित रहे। परिस्थिति अनुसार सामंतों के घर हाली (सेवक) का कार्य स्वीकार किया, काम के बदले भोजन मिलता था, जनश्रुति के अनुसार जितना भोजन मिलता उसका आधा हमेशा कुत्तों को डाल देते थे, सामंत प्रतिदिन आधा करता जाता, पर राजाराम के कुत्तों को आधा भोजन देने का क्रम भी निरंतर चलता रहा।


आवे जिणसु आध, कुतों ने नोके।

पावे पछे परसाद, जिणसु सुबरि करे।।


संत राजाराम जी बाल्यावस्था में ही शोषण विहीन, नशामुक्त समाज, पशुप्रेम, अहिंसा, नारी उत्थान जैसे अनेक विषयों पर उपदेश करते हुए समाज सुधार का कार्य किया। वे संत सच्चे संत-भक्त थे। संत भक्त इसलिए कि कृष्ण को निराकार मानकर उनकी आराधना करते थे। निर्गुण राम का जप जीवनपर्यन्त चलता रहा। पश्चिम राजस्थान में भक्ति के बदलते स्वरूप को युगानुकुल आचरण में ढालने वालों में राजाराम संत और समाज सुधारक के रूप में प्रसिद्ध हुए।


श्रेष्ठ प्रकृति चिंतक

राजाराम जी उनके जीवन के अनेक प्रसंगों से प्रमाणित होता है कि घने जंगल में जाकर तपस्या की और प्रकृति को अपना सहचरी बनाया। शिवरात्रि के पावन अवसर पर लोग इक्कठे हुए, लेकिन अकाल पड़ने के कारण पानी की किल्लत थी, पानी की महत्ता को समझाने के लिए उन्होंने समाज से सरोवर खुदवाया। उसी दिन बारिश से खुदवाया गया सरोवर पानी से भर गया।


रात-रात में रल गयो, भर गयो सागर भाल।

दिन उगा सब देखियाँ, पहुँच गयो जल पाल।


जनता ने पवित्र मानकर सरोवर का पूजन किया। उसके आसपास हरे वृक्ष लगवाए, जिसमें विविध जड़ी बूटियों के पौधे भी लगवाए। राजारामजी ने गाँव वालों से इन सूखे पेड़ो को हरे-भरे रखने का संकल्प करवाया। एक दोहे से स्पष्ट होता है कि उनके सरोवर के पास सघन वृक्ष थे।


फूल-फूलवाड़ी फरकिया, कई-कई जात जरद।

जिणमे देखाण दौ दिया, मेले उभा मरद।।

चंपा, चमेली, मोगरो, गहर, गुलाब, गंभीर।

जूही केतकी केवड़ो, उगा सरवर तीर।।


वे अपने सरोवर को इतना साफ़ रखते थे कि आज भी हर श्रद्धालु उसमें स्नान करना, गंगा स्नान करने के समान मानते हैं। अपने उपदेशों में उन्होंने पशु-पक्षियों के प्रति अपनत्व भाव दिखाते हुए कहा कि-

सरवर तीर के वृक्ष को, काटो मती किसान।

पंछी बैठे पेड़ पर, सांझ पड़े उड़ आन।।

आवे सरवर उपरे पशु, किया प्यासों धाय।

कदे न तिरसो काडणो, पाणी देहु पिलाय।।


अतः प्रमाणित है कि राजारामजी ने पशु-पक्षी, पेड़-पौधों का चिंतन कर पर्यावरण संतुलन की वकालत की तथा वे अहिंसा के भी प्रबल समर्थक थे।


पशु मिनखरी री पांख है, वा टूटा दुख होय।

ताकि रकसा कीजिए, होम किया सुख होय।।


आज पूरा विश्व पर्यावरण संकट को लेकर चिंतित है, लेकिन भारतीय जीवन दृष्टि ने पानी, पशु, पत्थर, कीट-पंतग और यहाँ तक कि कागज में भी ईश्वर के दर्शन किए हैं। इस दृष्टि के पीछे केवल संतों का पूरे विश्व को अपना परिवार मानने वाला जीवंत चिंतन है।


नारी-दृष्टिकोण

राजारामजी ने महिलाओं को पुरुष की अपेक्षा महत्त्वपूर्ण माना है और उन्हें परिवार, समाज और संस्कृति की वाहक मानते हुए भविष्यवाणी में चेतवानी दी, जो आज सटीक साबित हो रही है-


स्त्रियाँ गेणों तज देसी, दो दो चूड़ी राखेला।

स्वाग-भाग सब छोड़ केसा ने सुलजावेला।


यहाँ राजारामजी चेतावनी देते हैं लेकिन समाज को स्त्री के प्रति बहन की दृष्टि से सोचने के लिए आग्रह किया है। मध्यकालीन संतों की संतों की वाणी में स्त्री को माया, डाकिन, सर्पिणी, विरहिणी और जीवात्मा है, लेकिन इनके साहित्य स्त्री बहन है। उनकी समुचित शिक्षा के लिए भी आग्रह करते है।

पंच बुलावे प्रेम सूं पढ़िए ने निज पास।

करें घणेरी खातरी, बात मान विश्वास।


शिक्षा के प्रभावस्वरूप इनके अनुयायियों का जीवन एकदम सादा-सरल रहता है। सबसे बड़ी बात पटेल समाज में आज भी लिंगानुपात अन्य जातियों की अपेक्षा ज्यादा है। सबसे बड़ा कारण संत राजाराम के उपदेशों के फलस्वरूप दहेज प्रथा से मुक्त समाज है।


राजा का शिष्यत्व स्वीकार करना

संत राजाराम को सेवाभाव और जप-तप के कारण बहुत प्रसिध्दि प्राप्त हुई। प्रकृति से सहज जुड़ाव के कारण उनके उपयोगिता को वे बखूबी जानते थे। जड़ी बूटियों के माध्यम बीमार पशुओं का इलाज सेवाभाव से करते थे। नीम-हाकिमों ने उनको सताना शुरू किया। मारवाड़ के राजा प्रतापसिंह ने भी उनका विरोध किया, लेकिन सच्ची सेवाभाव और ईश्वर-भक्ति के कारण उनको भी नतमस्तक होना पड़ा।


(सोरठा)

सब कपड़ा पर छाप उघड़ी एक दिन।

पिछ्ताया परताप, अरज करी उणवार में।

सर परताप सीखाकर, माफ़ी ले मुनिराय।

अपने भवन आय के, सिद्ध री बात सुनाय।।


मानव मूल्यों का संवर्धन

मनुष्य के जीवन जीने के तरीकों मानवीय मूल्य कहते है। संत राजाराम भी मानवीय मूल्यों के पक्षधर है। दीनों को सताने से, चोरी करने से, गलत तरीके से लगान या कर लेने से व्यक्ति से ईश्वर विमुख हो जाता है और जनता का उन पर से विश्वास भी उठ जाता है। वे लिखते हैं कि-


दुख मत दिजो दीन को म्हारों कयो मान।

हाय बुरी है गरीब की कबहु न निरफल जान।।

चोरी झारी मत करो मतलो हासल चुराय।

ईश्वर ते वेमुख हुवे पत पंचों में जाय ।।


प्रेम

संत राजाराम प्रेमभाव को सर्वोच्च स्थान देते हैं, वे उसे संपत्ति का दर्जा देते हैं। मधुमक्खियाँ की भाँति प्रेम की सीख देते हुए कहते हैं कि प्रेम से किए गए सुकृत कार्य से ईश्वर प्रसन्न होता है तथा देश का भी कल्याण होता हैं।

संपत ऐसी राखजो जैसे मधु की माख

सुख दुःख में सामल रहे देवे अमृत की दाख।।

....सांचे मन शत्रु तब संपत देख सुजाण।

हिलमिल भाँया चलो करो देश कल्याण


मानव मात्र के कल्याण का भाव

संत राजाराम जी का सामजिक चिंतन केवल एक जाति का न होकर संपूर्ण मानव जाति का है। गाँव की प्रत्येक जाति और वंचित तबके के लोगों की भरसक सेवा करने का संकल्प अपने जीवन में किया। समतामूलक समाज की स्थापना को वे धर्म का मार्ग मानते हैं।


राजूराम साची कही सबे मानो संसार।

नीति वचन निभाय के चलो धर्म के लार।

हुवे गरीब निज गाँव में सब जाति के तात।

सेवा करो सब उणरी भाव रखो सब भ्रात,

करो मदद उणरी कहूँ तं मन धन सू तात

सगलो सू संपत रखो जिण सू सुधरे जात।।


इस प्रकार संत राजाराम ने युगीन दृष्टि को ध्यान में रखकर सामाजिक समभाव पर बल दिया। जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिए संतों ने जो कदम उठाया वह हमारे लिए प्रासंगिक है।

आटा-साटा एवं अन्य कुप्रथाओं का विरोध

काल, परिस्थिति सापेक्ष संत राजाराम ने भी स्त्री शिक्षा, संस्कार एवं सशक्तिकरण के लिए भरसक प्रयास किए। तत्कालीन लोक में व्याप्त कुरुतियाँ यथा आटा-साटा प्रथा, पैसा लेकर लड़की की शादी करना, मृत्युभोज करना और नशाखोरी जैसी बुराइयों पर प्रहार किया जो आज भी नासूर बनी हुई है। लड़की की शादी के बदले पैसा लेना जीव हत्या के समान मानते हुए कहते हैं-


लेवे पईसो लोभकर, रूठे जिण सूं राम।

हाड़ मांस कुं बेचकर किउं करो कसाई काम।।

काज किरयावर मत करो, करो न मोसर कोय।

...उमर भर दुख भोगवो शोभा घड़ी एक होय।


समाज के पंचों को उपदेश

आज समाज का युवा वर्ग पुरानी न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास जाहिर कर न्यायालय का रास्ता अपना रहे हैं लेकिन गुरुदेव भगवान ने बहुत समय पहले ही सही न्याय करने के लिए उपदेश दिया-


राजाराम तुम सूं कहे सुणजो पंच सुजान।

करो पंचायत न्याय सू पक्ष पाट तज आण।।

ईशवर को तुम डर राखो करो न्याय इखलाफ।

शत्रु हो चाहे भाई सगो अदल करो इनसाफ़।।


सत्संग एवं सतगुरु महिमा के उपदेश

संत राजाराम भी सत्संग को अध्यात्म का मार्ग बताते हुए उनकी महत्ता को स्थापित करते हैं।


सांची संगत बिन सूरता नहीं जागी, नहीं होवे ज्ञान ब्रह्मा रो।


संत राजाराम भी सतगुरु की महिमा को अपने पदों में गाया है। सतगुरु महिमा में उनके साहित्य पर नाथ संप्रदाय का प्रभाव उल्ल्लेखित हैं।


राजाराम हरि गुण गाया, सात गुरु मोहि आय जगाया।

सतगुरु मो पर कृपा किनी ओम सोऽहं की सुमिरन दिनी

सुरता जाय नुरत सूं लागी, ईड़ा पिंगला सुकमणा जागी।।


नाम स्मरण पर जोर (नाम जप)

संत राजाराम मूलतः निर्गुण संत थे, क्योंकि मध्यकालीन संतों की तरह उनके स्वानुभूत नैतिक उपदेश ज्यादा है। उन्होंने सगुण की दोनों धाराओं का सम्मान किया, तो जनता ने इसे श्रीकृष्ण का अवतार मानकर पूजा की। निर्गुण राम की महिमा का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि-


निर्गुण राम सकल घट माही, पुरुष नारी में वोही समाई।

धरा आसमान सुन में समायो, ज्यारी करो ओलखाई।।


यहाँ लोक प्रसिद्ध मुहावरा ‘करो ओलखाई’ से तात्पर्य ‘पहचान करना’ है। संत राजाराम इस मुहावरे के माध्यम से ईश्वरीय पहचान की बात करते हैं।


मनोविकारों का त्याग

राजाराम जी मनोविकारों का त्याग की बात करते हैं जो व्यक्तिगत सुख के लिए सहायक है।


काम क्रोध मद मोह तजो तजो द्रोह को तात।

कूड़ कपट आगो करो जनम सुधारो तात।


सटीक भविष्यवाणी

संत राजाराम की वाणी आज चेतावनी के भजनों के रूप में लोक प्रसिद्ध है, उनकी एक भविष्यवाणी जो उनके जन्म के तीस साल बाद अर्थात सन् 1912 के आसपास की जिसमें उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आने वाले वैश्विक संकटों और राजनीतिक परिवर्तनों को अनुभूत कर लिया था जो आज हूबहू हमारे सामने है।


अन्न और पानी का संकट

अन्न और पानी एक वैश्विक समस्या बनकर खड़ी होगी, भूमि की उर्वरकता समाप्त हो जाएगी। अकाल या बेमौसम बरसात से जनजीवन प्रभावित होगा। अत्यधिक जनसंख्या बढने से भूखमरी बढ़ेगी, जिसे आज विशव भुगत रहा है।


एक सेर रो धान बिकेला, पाणी टांक तुलावेला।

भूमि बीज उपज तज देसी, इंद्र नहीं बरसावेला।

मानखो बध जासी ज्यादा धान हाथ नहीं आवेला।

एक रोटी रे कारण लड़कर अपनो प्राण गमावेला।।


ईश्वर में अविश्वास

वे कहते हैं कि लोग हमारी सनातन परंपरा को छोड़कर ईश्वरीय शक्तियों न मानते हुए, आर्थिक नियोजन के पीछे भागते दिखेंगे।


नेम धर्म अरू करम तज देसी, सब दिन टका कमावेला।

ईश्वर ने ईश्वर नी जाणे, आप ब्रह्म बण जावेला।


वैश्विक युद्धों से मानवता पर संकट

आज चल रहे युद्धों से संत राजाराम जी मानव के बदलते स्वभाव के कारण परिचित थे। राजा-रजवाड़े समाप्त होने बाद लोकतंत्र की स्थापना और साम्राज्यवाद के भाव को पहचान कर समाज को जागृत करते है-


समदा पार विलायत केसी, आपस में लड़ जावेला,

धुआं धार घोर जुध मचसी, लाखा ही खप जावेला।


इसलिए आज संत राजाराम की स्वानुभूत वाणी हमें युगीन अनुभूत हो रही है। संत राजाराम जी ने लोक से अनुभूत विषयों से समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करके समाज को आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाया। वे तो समाज की चेतना के जागरण में अग्रगण्य रहे। वे पहले कबीर की भाँति पहले समाज सुधारक हैं फिर संत। संत राजाराम महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद भी समाज सेवा, शिक्षा और आध्यात्मिकता के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं। जिसका प्रभाव इनके अनुयायियों पर पड़ा।


प्रतिवर्ष मेला

संत राजाराम ने सन् 1943 को शिकारपुरा गाँव में जीवित समाधि ली। आज भी उनके जन्म दिन अर्थात रामनवमी को शिकारपुरा में विशाल मेला भरता है, जिसमें पर्यावरण चिंतन के साथ लोकनृत्य गेर का आयोजन होता है जिसमें राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के लोग शामिल होते हैं। इनके अनुयायी वर्तमान में बड़ी संख्या में व्यापार में भागीदारी करने लगे हैं।

गद्दी परंपरा और आश्रम

संत राजाराम जी के बाद गद्दी परंपरा आरंभ हुई, फिर उनके उतराधिकारी संत देवाराम जी (1943 से 1996 तक) बने। उसके बाद शिक्षा जगत में क्रांति लाने वाले संत किशनराम जी (1996-2007) और वर्तमान में गादीपति संत दयाराम जी 2007 से लगातार है। जो नशा के खिलाफ अभियान छेड़कर पूरे समाज को नशा मुक्ति की ओर ले जा रहे है। शिकारपुरा के अलावा पाली जिले के चेंडा गाँव में राजाराम संप्रदाय की प्रमुख पीठ है। इसके अलवा पारलु (बालोतरा), फ़रेड़ी आश्रम (गुड़ामालानी) और लुम्बा की ढाणी (जालौर) में संत राजाराम जी के प्रमुख मंदिर है।



डॉ. वीरमाराम पटेल

युवा लेखक और विचारक

गाँव-ढीमड़ी, तहसील-गुड़ामालानी, बाड़मेर, (राज.)

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