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मलक्का पर नजर, भारत की नई समुद्री रणनीति

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 2 hours ago
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। वैश्विक समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की राजनीति में एक नया मोड़ आने के संकेत मिल रहे हैं। जिस तरह में ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया, उसी तर्ज पर अब भी एक बड़े और तकनीकी रूप से उन्नत मॉडल पर काम कर रहा है। इस रणनीति का केंद्र है —एक ऐसा समुद्री मार्ग जो की ऊर्जा और व्यापारिक जीवनरेखा माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है, जहां ईरान ने सस्ते समुद्री माइंस, ड्रोन बोट, एंटी-शिप मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के जरिए बार-बार वैश्विक बाजार में अस्थिरता पैदा करने की क्षमता दिखाई है। इस रणनीति का मूल सिद्धांत है—पूरी तरह विनाश नहीं, बल्कि भय और अनिश्चितता का माहौल बनाना।


मलक्का: चीन की ‘लाइफलाइन’ पर नजर

इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भारत अब मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह मार्ग चीन के लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात और बड़े हिस्से के व्यापार के लिए अहम है। भारत के पास के रूप में एक मजबूत भौगोलिक बढ़त है, जो मलक्का के पश्चिमी प्रवेश द्वार के बेहद करीब स्थित है।


‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति को बल

भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति पहले से ही हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए तैयार की गई है। अब को अत्याधुनिक सैन्य हब में तब्दील किया जा रहा है। यहां लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान, पनडुब्बियां, उन्नत रडार सिस्टम और तेज अटैक क्राफ्ट तैनात किए जा रहे हैं।


पूरी नाकाबंदी नहीं, ‘सी डिनायल’ पर फोकस

रणनीति का मुख्य उद्देश्य पूर्ण नाकाबंदी नहीं, बल्कि ‘सी डिनायल’ है—यानी समुद्री मार्ग को इतना जोखिमपूर्ण बना देना कि दुश्मन को वैकल्पिक और लंबे रास्तों का सहारा लेना पड़े। इससे न केवल समय और लागत बढ़ेगी, बल्कि आर्थिक दबाव भी गहराएगा।


ड्रोन तकनीक बनेगी गेम चेंजर

इस नई रणनीति में ड्रोन तकनीक की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। भारत स्वदेशी स्तर पर हजारों ड्रोन विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है, जिनमें निगरानी, हमला और लॉजिस्टिक्स क्षमताएं शामिल होंगी। लंबी दूरी के एआई आधारित स्वार्म ड्रोन सामूहिक हमले कर सकते हैं, छोटे एफपीवी और कामिकाजे ड्रोन लगातार सस्ते और प्रभावी हमले संभव बनाते हैं,

यूएसवी (अनमैन्ड सरफेस व्हीकल) और यूयूवी (अंडरवॉटर ड्रोन) समुद्री माइंस बिछाने और पनडुब्बियों की ट्रैकिंग में उपयोगी होंगे।


ईरान से अलग, ज्यादा मजबूत मॉडल

जहां ईरान सीमित संसाधनों के साथ यह रणनीति अपनाता है, वहीं भारत के पास मजबूत औद्योगिक आधार, तेजी से बढ़ता प्राइवेट ड्रोन सेक्टर, जैसी संस्थाओं का समर्थन और एक आधुनिक नौसेना की ताकत है। इससे भारत लंबे समय तक बड़े पैमाने पर ऑपरेशन संचालित करने में सक्षम हो सकता है।


चीन के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में कोई सैन्य टकराव होता है, तो भारत को हर जहाज को निशाना बनाने की जरूरत नहीं होगी। कुछ सीमित हमले, माइंस या नेविगेशन में बाधा ही शिपिंग कंपनियों के लिए जोखिम बढ़ाने के लिए पर्याप्त होंगे। इससे बीमा लागत में वृद्धि, व्यापार में देरी और चीन पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। ईरान द्वारा प्रदर्शित ‘चोकपॉइंट रणनीति’ अब वैश्विक सामरिक सोच का हिस्सा बनती दिख रही है। भारत यदि इसे बड़े और हाई-टेक स्तर पर लागू करता है, तो हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है और मलक्का जलडमरूमध्य चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी बन सकता है।

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