top of page
भारतार्थ-logo

मन पर विजय ही आत्मविकास की पहली सीढ़ी: मुनि श्री वीरसागर जी

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 13 अग॰
  • 5 मिनट पठन

नकारात्मक विचारों पर लगाम, क्षमा-विनय-कृतज्ञता से आत्मपरिवर्तन का संदेश; बोले—संसार में रहें, लेकिन उसकी नकारात्मकता को भीतर प्रवेश न करने दें

मंच पर नग्न-सी छाती वाले पुरुष माइक्रोफोन से बोलते हुए, पीछे मंदिर-सा बैकड्रॉप; नीचे फाइल फोटो लिखा है

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 12 अगस्त 2026। ज्ञानोदय परिसर, इनर रिफ्लेक्शन सेंटर, तुबरहल्ली में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचनों के क्रम में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने मन की प्रकृति, नकारात्मक विचारों, आत्मसंयम और सकारात्मक जीवन-दृष्टि पर प्रेरणादायी संदेश दिया। मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में वास्तविक आत्मविकास तब शुरू होता है, जब वह यह समझता है कि वह मन नहीं, बल्कि मन का साक्षी और स्वामी है।


मुनिश्री ने कहा कि मन में उठने वाला प्रत्येक विचार व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं होता। मन विचारों के प्रवाह का माध्यम है और व्यक्ति को विवेक के आधार पर यह तय करना चाहिए कि किस विचार को स्वीकार करना है और किसे वहीं रोक देना है। उनके अनुसार मन पर विजय का अर्थ मन को दबाना नहीं, बल्कि उसके विचारों को पहचानकर उन्हें सही दिशा देना है।

उन्होंने समझाया कि आंखें देखने का माध्यम हैं, जिह्वा स्वाद ग्रहण करने का साधन है, उसी प्रकार मन विचारों के प्रवाह का माध्यम है। यदि व्यक्ति मन में उठने वाले प्रत्येक विचार को अपना स्वरूप मान लेता है, तो वह चिंता, भय, क्रोध और नकारात्मकता के चक्र में फंस सकता है। इसके विपरीत जागरूकता और संयम के साथ विचारों का निरीक्षण किया जाए तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है।


बार-बार दोहराए विचार बन जाते हैं मानसिक आदत


मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने नकारात्मक विचारों की आदत को समझाने के लिए पानी के प्रवाह का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार ढलान पर लगातार बहता पानी एक ही स्थान पर गहरी लकीर बना देता है, उसी प्रकार किसी विचार को बार-बार दोहराने से मन में उसका एक निश्चित मार्ग बन जाता है।

चिंता, भय, क्रोध, ईर्ष्या, अनावश्यक कल्पनाएं और नकारात्मक चिंतन भी इसी प्रक्रिया के कारण धीरे-धीरे मानसिक आदतों का रूप ले सकते हैं। व्यक्ति को कई बार यह महसूस भी नहीं होता कि वह किसी विचार को नियंत्रित कर रहा है या वही विचार उसके व्यवहार को नियंत्रित करने लगा है।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को सजग रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि पुराने मानसिक मार्गों को बदलने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। नकारात्मक विचार आते ही उनके पीछे बहने के बजाय व्यक्ति को उन्हें पहचानना चाहिए और अपने विवेक से आत्मकल्याणकारी विचारों की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मपरिवर्तन केवल इच्छा से नहीं, बल्कि जागरूकता, संयम और निरंतर अभ्यास से संभव होता है।


समुद्र में जहाज जैसा हो जीवन


प्रवचन में मुनिश्री ने संसार में रहते हुए भी उसकी नकारात्मकता से स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में चलने वाले जहाज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जहाज समुद्र के पानी में रहकर भी सुरक्षित आगे बढ़ता है, क्योंकि समुद्र का पानी उसके बाहर रहता है। जैसे ही पानी जहाज के भीतर प्रवेश करता है, उसके डूबने का खतरा पैदा हो जाता है।

इसी प्रकार मनुष्य को संसार से भागने की आवश्यकता नहीं है। उसे परिवार, व्यवसाय, नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए संसार में रहना है, लेकिन तनाव, द्वेष, क्रोध, नकारात्मकता और विकारों को अपने भीतर स्थायी स्थान नहीं देना है।

उन्होंने कहा कि संसार के बीच रहते हुए अपनी आंतरिक शांति को सुरक्षित रखना ही वास्तविक साधना है। बाहरी परिस्थितियां हमेशा व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं बदल सकतीं, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास व्यक्ति स्वयं कर सकता है।


क्रोध में वस्तु फेंकने से नुकसान हमारा


मुनिश्री ने जैन परंपरा में वर्णित अजीव आसादना के संदर्भ में भी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। प्रतिक्रमण के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यवहार और भावों का आत्मावलोकन करता है तथा निर्जीव वस्तुओं के प्रति किए गए अनुचित व्यवहार के लिए भी क्षमा-भाव रखता है।

उन्होंने कहा कि क्रोध में मोबाइल, गिलास, थैला या किसी अन्य वस्तु को पटकने अथवा फेंकने से वस्तु को भावनात्मक पीड़ा नहीं होती, लेकिन ऐसा व्यवहार व्यक्ति के अपने मानसिक संतुलन को प्रभावित करता है। क्रोध में की गई ऐसी प्रतिक्रिया भीतर के असंयम को मजबूत करती है।

मुनिश्री ने संदेश दिया कि क्रोध की स्थिति में तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुकना, विचार करना और फिर निर्णय लेना आत्मसंयम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। व्यक्ति जितना अपने व्यवहार को देखने लगेगा, उतना ही वह अपनी कमजोरियों को पहचानकर उनमें सुधार कर पाएगा।


क्षमा, विनय और कृतज्ञता से सकारात्मक बदलाव


आत्मपरिवर्तन की दिशा में मुनिश्री ने क्षमा, विनय और कृतज्ञता को तीन महत्वपूर्ण भाव बताया। उन्होंने कहा कि सबसे पहले व्यक्ति को अपने व्यवहार और गलतियों का ईमानदारी से आत्मावलोकन करना चाहिए। अपनी भूल स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसुधार की पहली सीढ़ी है।

इसके बाद जीवन में विनय का भाव विकसित करना आवश्यक है। विनम्र व्यक्ति सीखने और अपनी कमियों को सुधारने के लिए अधिक तैयार रहता है। अहंकार व्यक्ति को अपनी भूल देखने से रोकता है, जबकि विनय उसे लगातार सीखने की क्षमता देता है।

तीसरा महत्वपूर्ण भाव कृतज्ञता है। जीवन में उपलब्ध अवसरों, गुणों और दूसरों के सहयोग को पहचानने की आदत मन को शिकायत से निकालकर संतोष और सकारात्मकता की ओर ले जाती है। कृतज्ञता केवल किसी व्यक्ति को धन्यवाद कहने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की प्रक्रिया है।


गुणग्राही दृष्टि से बदलती है जीवन की दिशा


मुनिश्री ने गुणग्राही दृष्टि को जीवन में शांति और सकारात्मकता का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति लगातार दूसरों की कमियां खोजता रहेगा, तो उसका मन भी उसी दिशा में सोचने लगेगा। इसके विपरीत यदि वह दूसरों के गुणों को देखने और उनसे सीखने का अभ्यास करता है, तो उसके भीतर भी अच्छे भाव विकसित होंगे।

उन्होंने चुंबक का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार चुंबक अपने अनुकूल धातु को आकर्षित करता है, उसी प्रकार गुणों को देखने वाली दृष्टि व्यक्ति के भीतर सकारात्मक भावों को विकसित करती है।

परिवार और समाज में भी गुणग्राही दृष्टि का विशेष महत्व है। यदि हर व्यक्ति केवल दूसरे की कमी खोजने के बजाय उसके अच्छे गुणों को पहचानने का प्रयास करे, तो रिश्तों में कटुता कम हो सकती है और आपसी सम्मान बढ़ सकता है।


आत्मपरिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से शुरू होता है


मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति अक्सर जीवन की समस्याओं का कारण परिस्थितियों, लोगों और बाहरी वातावरण को मानता है। लेकिन स्थायी परिवर्तन का रास्ता स्वयं के भीतर से शुरू होता है।

यदि व्यक्ति परिस्थितियों को बदलने में सक्षम न हो, तो भी वह अपनी प्रतिक्रिया बदल सकता है। किसी घटना पर क्रोध करना या शांत रहना, शिकायत करना या सीख लेना, दोष देखना या गुण पहचानना—इन विकल्पों में व्यक्ति की अपनी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने मन का स्वामी बनने का प्रयास करना चाहिए। जब मनुष्य अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को विवेकपूर्ण दिशा देने लगता है, तब बाहरी परिस्थितियां उसके जीवन की पूरी दिशा तय नहीं कर पातीं।


मुनिश्री का संदेश आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार के बीच विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है। तकनीक, प्रतिस्पर्धा, व्यस्तता और निरंतर बदलती परिस्थितियों के बीच व्यक्ति के लिए अपने मन की शांति को बनाए रखना बड़ी चुनौती है। ऐसे में आत्मनिरीक्षण, संयम, क्षमा, विनय, कृतज्ञता और गुणग्राही दृष्टि जीवन को संतुलित बनाने के प्रभावी आध्यात्मिक सूत्र बन सकते हैं।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page