मन पर विजय से बनें सच्चे लीडर, जन्मजात नेतृत्व क्षमता जगाने का मंत्र — मुनि श्री वीरसागर महाराज
- धन्नाराम चौधरी

- 24 जुल॰
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चातुर्मास प्रवचन में आत्मनिरीक्षण, सकारात्मक सोच और नेतृत्व विकास का दिया प्रभावशाली संदेश

ज्ञानोदय परिसर, तूबरहल्ली में श्रद्धालुओं को संबोधित करते निर्यापक श्रमण पूज्य मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज।
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 24 जुलाई, 2026 मन पर विजय ही वास्तविक नेतृत्व की पहली पहचान है। यदि व्यक्ति अपने मन, विचारों और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर ले, तो वह न केवल अपने जीवन का सफल नेतृत्व कर सकता है, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है। यही प्रेरणादायी संदेश निर्यापक श्रमण पूज्य मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज ने बेंगलुरु के तूबरहल्ली स्थित ज्ञानोदय परिसर में आयोजित चातुर्मास प्रवचनमाला में दिया।
'लीडरशिप क्वालिटी पैदा करने का अचूक उपाय' विषय पर आयोजित प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही नेतृत्व क्षमता लेकर आता है। करोड़ों संभावनाओं में विजेता बनकर जन्म लेना स्वयं इस बात का प्रमाण है कि नेतृत्व मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। आवश्यकता केवल उस जन्मजात क्षमता को पहचानने, उसे जागृत करने और सही दिशा देने की है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य परिस्थितियों का नहीं, बल्कि अपने विचारों, संस्कारों और निर्णयों का निर्माता होता है। जब व्यक्ति अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचान लेता है और मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तभी वह अपने जीवन का वास्तविक नेतृत्व कर पाता है।
मुनि श्री ने कहा कि आज अधिकांश लोग अपनी वास्तविक क्षमता इसलिए नहीं पहचान पाते क्योंकि वे स्वयं को दूसरों की नजर से देखने लगते हैं। गलत संगति, नकारात्मक सोच, आत्मविश्वास की कमी और निरंतर नकारात्मक मानसिक आहार धीरे-धीरे व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता को दबा देते हैं। परिणामस्वरूप वह स्वयं निर्णय लेने के बजाय दूसरों का अनुसरण करने लगता है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने 'बाज और मुर्गियों' की प्रसिद्ध प्रेरक कथा सुनाते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को बार-बार उसकी सीमाएँ बताई जाएँ तो वह अपनी वास्तविक शक्ति को कभी पहचान नहीं पाता। बाज में आकाश की असीम ऊँचाइयों तक उड़ने की क्षमता होती है, लेकिन यदि उसका पालन-पोषण मुर्गियों के बीच हो तो वह स्वयं को भी मुर्गी समझने लगता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य की सबसे बड़ी बाधा बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति बनी सीमित और नकारात्मक धारणाएँ होती हैं।
मुनि श्री ने वर्षा की एक बूंद का उदाहरण देकर समझाया कि वही निर्मल जल धूल में गिरकर कीचड़, नीम पर गिरकर कड़वाहट, सर्प के मुख में विष और सीप में पहुँचकर मोती बन जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि वातावरण और संगति का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर अत्यंत गहरा पड़ता है। उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ जीवन के लिए श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ संगति और सकारात्मक मानसिक आहार का चयन आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आज केवल 'माइंडफुलनेस' की चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने मन के प्रति निरंतर सजग रहना अधिक आवश्यक है। आत्मनिरीक्षण ही जीवन परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन अपनी छह इंद्रियों—आंख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श और मन का परीक्षण करने की प्रेरणा दी।
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को प्रतिदिन स्वयं से छह प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए—क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे और कितना? यदि इन प्रश्नों के माध्यम से वह यह जांचने लगे कि वह क्या देख रहा है, क्या सुन रहा है, क्या बोल रहा है, क्या सोच रहा है और अपने मन को किस प्रकार का आहार दे रहा है, तो उसका जीवन स्वतः अनुशासित और सफल बनने लगेगा।
उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे अपनी असफलताओं के लिए भाग्य, परिस्थितियों या कर्मों को दोष देने के बजाय अपने विचारों और कर्मों का निष्पक्ष आत्ममूल्यांकन करें। वास्तविक परिवर्तन उसी दिन से प्रारंभ होता है जब व्यक्ति अपने मन की दिशा बदलने का निर्णय लेता है।
प्रवचन के समापन पर मुनि श्री ने कहा कि नेतृत्व केवल किसी संस्था, संगठन या समाज का नेतृत्व करना नहीं है। सबसे बड़ा नेतृत्व स्वयं के मन, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं पर विजय प्राप्त करना है। जो स्वयं का नेतृत्व करना सीख जाता है, वही समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।
ज्ञानोदय परिसर में आयोजित इस प्रेरणादायी प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आध्यात्मिक दर्शन और व्यवहारिक जीवन के सुंदर समन्वय से परिपूर्ण इस प्रवचन ने आत्मजागरण, सकारात्मक चिंतन, आत्मानुशासन और सतत आत्मनिरीक्षण के माध्यम से सफल एवं संतुलित जीवन का सशक्त संदेश दिया।
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