top of page
भारतार्थ-logo

बेंगलुरु में पेरेंटिंग शाला, बच्चों की परवरिश और संस्कारों पर विशेष जोर

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 24 अग॰
  • 4 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 5 घंटे पहले

2026 के मंच पर मंदिर पृष्ठभूमि में मुकुट पहने बच्चों का समूह, कुछ हाथ जोड़कर, उत्सवपूर्ण माहौल।

भारतार्थ खबर | Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 24 अगस्त 2026। आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में रविवार को बेंगलुरु में ‘पेरेंटिंग शाला’ का आयोजन किया गया। ‘साथ जुड़ें, साथ सीखें और साथ बढ़ें’ की भावना पर आधारित इस विशेष कार्यक्रम में अभिभावकों और बच्चों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।


आधुनिक जीवनशैली में बच्चों के पालन-पोषण, व्यक्तित्व निर्माण, पारिवारिक संवाद और संस्कारों को लेकर सामने आ रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। इसका उद्देश्य केवल अभिभावकों को बच्चों की परवरिश से जुड़ी जानकारी देना नहीं, बल्कि परिवार में आपसी संवाद, समझ और विश्वास को मजबूत करना भी रहा।


‘सुधारने से पहले जुड़ें’ पर जोर


कार्यक्रम की शुरुआत नाश्ता, पंजीकरण और स्वागत सामग्री वितरण से हुई। इसके बाद ‘सुधारने से पहले जुड़ें’ विषय पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें बच्चों के व्यवहार में बदलाव लाने से पहले उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास और प्रभावी संवाद स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।


अभिभावकों को यह संदेश दिया गया कि बच्चों को केवल निर्देश देने या नियंत्रित करने के बजाय उनकी भावनाओं, आवश्यकताओं और दृष्टिकोण को समझना जरूरी है। संवाद और विश्वास को पारिवारिक संबंधों की मजबूत आधारशिला बताते हुए कहा गया कि सुधार से पहले संबंध और अनुशासन से पहले संवाद आवश्यक है।


बच्चों के लिए रचनात्मक गतिविधियां


पेरेंटिंग शाला में बच्चों के लिए ‘रंगों की दुनिया’ नाम से विशेष चित्रकला गतिविधि आयोजित की गई। बच्चों ने रंगों के माध्यम से अपनी कल्पनाशक्ति और रचनात्मक प्रतिभा को अभिव्यक्त किया। इसके अलावा खेल एवं गतिविधि क्षेत्र में मनोरंजक खेल, रचनात्मक गतिविधियां तथा जैन कथाओं और जीवन-मूल्यों से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए गए।


बच्चों के लिए विशेष जैन फास्ट फूड की व्यवस्था भी की गई। आयोजन का उद्देश्य बच्चों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना रहा, जिसमें वे खेल-खेल में सीख सकें, रचनात्मक रूप से सोच सकें और अपने संस्कारों से जुड़े रहें।


डॉ. रीना जैन ने किया मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शन


कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण अभिभावकों के लिए आयोजित मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शन सत्र रहा। मनोविज्ञान के क्षेत्र में 23 से अधिक वर्षों के अनुभव वाली डॉ. रीना जैन ने बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों और उनके समाधान पर मार्गदर्शन दिया।


उन्होंने बच्चों के व्यवहार को समझने, उनकी भावनाओं को पहचानने, प्रभावी संवाद स्थापित करने तथा बदलते पारिवारिक परिवेश में अभिभावकों की भूमिका जैसे विषयों पर उपयोगी जानकारी साझा की। सत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि बच्चों की कई समस्याओं का समाधान केवल डांट, नियंत्रण या दबाव से नहीं, बल्कि धैर्य, समझ, संवाद और सकारात्मक व्यवहार से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।


‘जड़ें और पंख’ का संदेश


इसके बाद माता-पिता और बच्चों का संयुक्त सत्र ‘जड़ें और पंख’ विषय पर आयोजित किया गया। ‘मजबूत जड़ें, स्वतंत्र पंख’ को सत्र का मूल संदेश बनाया गया। इसमें बच्चों को संस्कृति, परिवार और संस्कारों से जोड़ने के साथ-साथ उनकी प्रतिभा, सोच और व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास के महत्व को रेखांकित किया गया।


अभिभावकों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि बच्चों के प्रत्येक निर्णय को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें इतना सक्षम बनाया जाना चाहिए कि वे भविष्य में विवेकपूर्ण निर्णय स्वयं ले सकें। संयुक्त सत्र ने परिवार में आपसी समझ और संवाद को बढ़ाने का संदेश दिया।


करियर और व्यवहार परामर्श की भी व्यवस्था


कार्यक्रम स्थल पर करियर एवं व्यवहार परामर्श केंद्र की व्यवस्था भी की गई। यहां बच्चों और अभिभावकों को करियर विकल्पों, बच्चों की रुचियों, व्यक्तित्व और व्यवहार से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला।


आज के प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में बच्चों के लिए केवल करियर का चयन ही नहीं, बल्कि उनकी रुचि, क्षमता और व्यक्तित्व को समझना भी महत्वपूर्ण है। इस पहल के माध्यम से बच्चों के वर्तमान व्यवहार से लेकर उनके भविष्य की दिशा तक विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास किया गया।


कार्यक्रम में चित्र स्मृति एवं अभिव्यक्ति दीवार भी आकर्षण का केंद्र रही, जहां परिवारों को साथ समय बिताने और आयोजन से जुड़ी यादों को संजोने का अवसर मिला।


पुण्यार्जक परिवारों का सहयोग


आयोजन में पुण्यार्जक परिवारों एवं संस्थानों का भी सहयोग रहा। धीरज कलमकार, ज्ञानेश जैन (येलहांका), मोहित-प्रियंशी जैन तथा कनॉपी अर्ली ईयर्स प्री-स्कूल ने पेरेंटिंग शाला में पुण्यार्जक के रूप में सहभागिता की। आयोजन समिति एवं जैन समाज की ओर से सहयोगी परिवारों और संस्थानों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।


उल्लेखनीय है कि वर्ष 2026 का पावन वर्षायोग (चातुर्मास) बेंगलुरु में आयोजित हो रहा है। इस दौरान धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों के साथ बच्चों, युवाओं, परिवारों, शिक्षा और संस्कार निर्माण से जुड़ी विभिन्न समाजोपयोगी गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं। इसी क्रम में पेरेंटिंग शाला को आधुनिक अभिभावकत्व की चुनौतियों को जैन जीवन-मूल्यों, संस्कारों और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया।


कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि बच्चों का बेहतर भविष्य केवल अच्छी शिक्षा और सुविधाओं से नहीं, बल्कि मजबूत पारिवारिक संबंधों, संस्कार, संवाद, विश्वास और सही मार्गदर्शन से भी निर्मित होता है। बच्चों को समय देना, उनकी बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें जीवन-मूल्यों से जोड़ना अभिभावकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। मजबूत संस्कारों की जड़ों के साथ स्वतंत्र सोच और आत्मविश्वास के पंख देना ही सार्थक अभिभावकत्व की दिशा है।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page