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बिहार में नई सरकार के सामने वित्तीय संकट की कड़ी चुनौती

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 14
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

पटना। बिहार की सियासत में बड़े बदलाव के संकेतों के बीच राज्य की आर्थिक स्थिति नई सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनकर उभर रही है। मुख्यमंत्री पद से संभावित इस्तीफे के बाद बनने वाली नई सरकार को खाली खजाने, बढ़ते कर्ज और वित्तीय दबाव के बीच शासन की जिम्मेदारी संभालनी होगी। राज्य में पहली बार भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बनने की चर्चा के बीच विपक्ष ने भी आर्थिक हालात को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि वर्तमान सरकार राज्य की वित्तीय स्थिति को कमजोर स्थिति में छोड़ रही है, जिससे नई सरकार के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी होंगी।


कर्ज के बोझ तले दबा बिहार

बिहार देश के सबसे अधिक कर्जदार राज्यों में गिना जा रहा है। राज्य का कुल बजट लगभग 3.47 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें से बड़ी हिस्सेदारी केंद्र से मिलने वाले करों और कर्ज पर निर्भर है। राज्य की कुल आय में लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से आता है, जो वित्तीय आत्मनिर्भरता पर सवाल खड़े करता है| राज्य की कैपिटल रिसीट का भी अधिकांश हिस्सा कर्ज के रूप में है। इससे स्पष्ट है कि सरकार की आय का बड़ा भाग उधारी पर आधारित है, जो दीर्घकाल में आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकता है।


बढ़ता कर्ज और ब्याज का भारी बोझ

वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, बिहार पर कुल कर्ज 2025-26 में लगभग 3.50 लाख करोड़ रुपये था, जो 2026-27 में बढ़कर करीब 3.88 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। राज्य सरकार को हर दिन औसतन 132 करोड़ रुपये कर्ज और ब्याज चुकाने में खर्च करने पड़ रहे हैं। साल 2026-27 में ही सरकार को करीब 25,364 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान और 22,665 करोड़ रुपये मूलधन चुकाने में खर्च करने होंगे। यह राशि राज्य के विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीमित कर सकती है।


वेतन भुगतान में देरी से बढ़ी चिंता

राज्य की वित्तीय स्थिति का असर अब सरकारी कर्मचारियों पर भी दिखाई देने लगा है। करीब 10 लाख कर्मचारियों में से लगभग आधे को महीने के मध्य तक भी वेतन नहीं मिल पाया है। कई जिलों में वेतन बिल ट्रेजरी तक नहीं पहुंचने की खबरें हैं। सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए ‘स्लो पेमेंट’ की नीति अपनाई है। हालांकि प्रशासन का दावा है कि 15 अप्रैल तक आवंटन पूरा कर 18 अप्रैल तक सभी कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंचा दिया जाएगा।


नई सरकार के सामने बड़ी जिम्मेदारी

ऐसे हालात में बनने वाली नई सरकार के सामने वित्तीय प्रबंधन, राजस्व बढ़ाने और कर्ज नियंत्रण की बड़ी चुनौती होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को खर्चों में संतुलन, निवेश को बढ़ावा और केंद्र पर निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। बिहार की आर्थिक स्थिति केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि विकास की दिशा तय करने वाला अहम कारक बन चुकी है। अब देखना होगा कि नई सरकार इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और राज्य को आर्थिक स्थिरता की राह पर कैसे आगे बढ़ाती है।

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