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बाड़मेर मस्जिद विध्वंस विवाद: हिंदू-मुस्लिम एकता ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 5 जुल॰
  • 2 मिनट पठन
Four men stand beside the rubble of a collapsed building in a dusty rural area under a bright sky, looking somber.
बाड़मेर में ध्वस्त मस्जिद के मलबे के बीच खड़े ग्रामीण और बची हुई मीनार का दृश्य

सीमावर्ती गांवों में मस्जिदों पर बुलडोजर कार्रवाई के बाद सद्भाव की मिसाल, दोनों समुदाय साथ आए

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बाड़मेर | 05 जुलाई, 2026 राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर और बीकानेर जिलों में मस्जिदों पर हुई बुलडोजर कार्रवाई ने जहां राजनीतिक और कानूनी बहस को तेज कर दिया है, वहीं दूसरी ओर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अंतरराष्ट्रीय सीमा के 15 किलोमीटर दायरे में कथित अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई के तहत 12 मस्जिदों को ध्वस्त किए जाने के बाद स्थानीय ग्रामीणों में भारी नाराजगी है।


बाड़मेर के केरकोरी गांव में मस्जिद का मलबा अभी भी बिखरा पड़ा है। गांव के मौलवी हिशामुद्दीन सिंधी का कहना है कि यह मस्जिद ग्रामीणों के चंदे और वर्षों की मेहनत से बनाई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उचित समय और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना ही कार्रवाई कर दी।


इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ी बात यह रही कि गांवों में हिंदू और मुस्लिम समुदाय एक साथ खड़े दिखाई दिए। विरोध प्रदर्शन के दौरान “सर्व धर्म शांति सभा” के बैनर तले दोनों समुदायों ने रैलियां निकालीं और प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। स्थानीय निवासी हरला राम मेघवाल ने कहा कि मुसलमानों ने विरोध में खाना बनाना बंद किया तो हिंदू परिवारों ने उनके घर भोजन पहुंचाया।


ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने केवल मुस्लिम धार्मिक ढांचों को निशाना बनाया, जबकि गोचर भूमि पर बने अन्य निर्माणों पर कार्रवाई नहीं हुई। वहीं प्रशासन और राज्य सरकार का कहना है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा क्षेत्र में अवैध निर्माण से जुड़ा हुआ है। सरकार ने अदालत में कहा कि सीमा पट्टी में धार्मिक ढांचे बनाने से पहले अनुमति लेना अनिवार्य है।


इस विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्षी दलों ने भाजपा सरकार पर पंचायत चुनावों से पहले सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया है। वहीं स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि थार क्षेत्र में वर्षों से सामाजिक सौहार्द कायम रहा है और ऐसी घटनाएं लोगों के बीच अविश्वास पैदा कर सकती हैं।


राजस्थान हाई कोर्ट में दायर याचिका में प्रभावित पक्षों ने दावा किया है कि उन्हें नोटिस बहुत देर से मिले और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी, जिस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं।

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