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बंगाल चुनाव में सुरक्षा पर सख्ती, आयोग ने मांगा जवाब

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 4
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मियों के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस नेताओं को दी जा रही सुरक्षा व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने राज्य पुलिस और कोलकाता पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती को लेकर जवाब तलब किया है, जिससे चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


सूत्रों के अनुसार, आयोग ने पाया कि चुनावों की घोषणा से पहले राज्य सरकार ने 832 ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान की थी, जिनका सीधा संबंध सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस से बताया जा रहा है। इनकी सुरक्षा में कुल 2,185 पुलिसकर्मियों को लगाया गया था। इसके अतिरिक्त 144 अन्य लोगों को भी सुरक्षा दी गई, जिनमें पार्टी समर्थक शामिल बताए गए हैं। आयोग ने इस असंतुलन को गंभीर मानते हुए तत्काल समीक्षा के निर्देश दिए हैं।


आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देशित किया है कि वे दो से तीन दिनों के भीतर पूरी सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष और पेशेवर समीक्षा करें। इस दौरान यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि सुरक्षा आवंटन किसी भी प्रकार के राजनीतिक पक्षपात से मुक्त हो।


इससे पहले आयोग ने पश्चिम बंगाल पुलिस से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी थी। यह रिपोर्ट उन निर्देशों के पालन से संबंधित है, जिनमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं से सरकारी सुरक्षा वापस लेने को कहा गया था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि यह आदेश सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होगा, चाहे नेता किसी भी पार्टी से जुड़े हों।


निर्देशों के तहत ऐसे नेताओं को सुरक्षा से वंचित करने को कहा गया है जो जमानत या पैरोल पर बाहर हैं, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं या जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। साथ ही, उन नेताओं पर भी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं जो निर्धारित प्रोटोकॉल के बिना सरकारी सुरक्षा का लाभ उठा रहे थे।


आयोग ने विशेष रूप से उन मामलों पर भी ध्यान देने को कहा है, जहां गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद उनकी तामील नहीं हो सकी है। ऐसे मामलों में संबंधित एजेंसियों को तय समयसीमा में कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। चुनाव के मद्देनज़र आयोग की यह सख्ती प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वास को मजबूती मिलेगी।

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