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कांग्रेस में मतभेद उजागर, विदेश नीति पर मोदी सरकार को मिली अंदरूनी सराहना

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 4 अप्रैल
  • 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ उस समय सामने आया जब कांग्रेस के भीतर ही विदेश नीति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे। जहां एक ओर राहुल गांधी केंद्र सरकार की कूटनीति पर लगातार सवाल उठा रहे हैं, वहीं पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेता खुलकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार की विदेश नीति की सराहना करते नजर आ रहे हैं।


पूर्व विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने हाल ही में दिए अपने बयान में सरकार की कूटनीतिक रणनीति को “परिपक्व और संतुलित” बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मौजूदा वैश्विक संकट के दौर में भारत का किसी एक पक्ष की ओर झुकाव दिखाना न केवल कूटनीतिक रूप से गलत होता, बल्कि देशहित के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता था। उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को नया आयाम दे दिया है।


आनंद शर्मा ने यह भी रेखांकित किया कि भारत के सामने चुनौती केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय भी है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। ऐसे में संतुलित और व्यावहारिक नीति ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने भारतीय राजनयिकों के प्रयासों की भी सराहना करते हुए कहा कि वे कठिन परिस्थितियों में देश की प्रतिष्ठा और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं।


गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरकार की विदेश नीति को समर्थन दिया हो। इससे पहले शशि थरूर और मनीष तिवारी भी सार्वजनिक रूप से सरकार के संतुलित रुख की प्रशंसा कर चुके हैं। मनीष तिवारी ने तो स्पष्ट कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संकट “भारत का युद्ध नहीं” है और देश ने रणनीतिक स्वायत्तता का सही परिचय दिया है।


हालांकि, पार्टी के भीतर एक अन्य धड़ा अब भी सरकार की आलोचना में मुखर है। पवन खेड़ा और जयराम रमेश जैसे नेता केंद्र की विदेश नीति को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन जब पार्टी के ही अनुभवी नेता सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं, तो यह मतभेद केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर वैचारिक विभाजन का संकेत देता है।


विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित किया है। कच्चे तेल और गैस पर निर्भर देशों के लिए यह संकट गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। ऐसे में भारत का संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी साख को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।


आनंद शर्मा ने अपने बयान में यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का परिचय देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के मुद्दों का राजनीतिकरण देशहित के विरुद्ध हो सकता है।


वर्तमान घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के भीतर विदेश नीति को लेकर एकरूपता का अभाव है। जहां एक ओर नेतृत्व स्तर पर सरकार की आलोचना जारी है, वहीं अनुभवी नेताओं का व्यावहारिक दृष्टिकोण अलग तस्वीर पेश कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस आंतरिक असहमति को किस प्रकार संतुलित करती है।


कुल मिलाकर, विदेश नीति जैसे गंभीर मुद्दे पर उभरते ये मतभेद न केवल कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को उजागर करते हैं, बल्कि भारतीय राजनीति में परिपक्व बहस की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं।

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