top of page

“भारतार्थ खबर – खबर नहीं, उसका अर्थ”“हर खबर का सही विश्लेषण – भारतार्थ खबर”“सच्ची खबर, सही अर्थ – भारतार्थ खबर”“जहाँ खबरों का होता है असली विश्लेषण”“ताज़ा खबरें, सटीक विश्लेषण – भारतार्थ खबर”“हर खबर की गहराई तक – भारतार्थ खबर”“Breaking News से लेकर विशेष रिपोर्ट तक”“देश-दुनिया की हर बड़ी खबर – भारतार्थ खबर”

नोएडा एयरपोर्ट का उद्घाटन: क्या “हर दो मिनट में उड़ान” भारत के विकास मॉडल की नई पहचान है?

कर्ज में डूबे किसान की पुकार: “न्याय नहीं तो इच्छामृत्यु दे दो”

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 1 day ago
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

चंद्रपुर (महाराष्ट्र)। साहूकारी कर्ज के जाल में फंसे एक किसान की दर्दनाक दास्तान ने एक बार फिर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नागभीड़ तहसील के मिंथूर गांव निवासी किसान रोशन कुडे, जो कर्ज के बोझ से तंग आकर अपनी किडनी बेचने तक को मजबूर हुए, अब न्याय न मिलने से हताश होकर इच्छामृत्यु की मांग कर रहे हैं। “अगर न्याय नहीं मिल रहा तो जीकर क्या करूं?”—यह सवाल उन्होंने प्रशासन के सामने रखते हुए अपनी पीड़ा बयां की। उनकी यह पुकार न सिर्फ स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे राज्य के लिए एक चेतावनी बन गई है।


कर्ज के जाल में फंसा जीवन

रोशन कुडे की कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की हकीकत है जो अवैध साहूकारों के शिकंजे में फंसकर अपना सब कुछ खो देते हैं। आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई कि उन्हें विदेश जाकर अपनी किडनी बेचने का कठोर फैसला लेना पड़ा। यह मामला उजागर होने के बाद प्रदेशभर में हलचल मची, लेकिन हालात आज भी जस के तस हैं।


सरकारी आदेश भी बेअसर

विधानसभा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री ने अवैध साहूकारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ित किसानों को राहत देने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, डेढ़ महीने बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। किसान का आरोप है कि उनकी जमीन अब भी उनके कब्जे से बाहर है और उन्हें न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।


न्याय की आस टूटी, उठी इच्छामृत्यु की मांग

लगातार अनदेखी और प्रशासनिक उदासीनता से टूट चुके रोशन कुडे ने अब इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। उनका कहना है कि जब जीवन जीने के सारे आधार छिन जाएं और न्याय की उम्मीद खत्म हो जाए, तो जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उन्होंने कहा, “मैं पिछले चार महीनों से न्याय के लिए भटक रहा हूं। मेरी खेती चली गई, शरीर भी कमजोर हो चुका है। मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे। अब या तो मुझे मेरी जमीन वापस दिलाई जाए या इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।”


प्रशासन पर उठते सवाल

इस मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या अवैध साहूकारों के खिलाफ कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित है? क्या एक किसान को न्याय पाने के लिए अपने जीवन की बलि देने की बात करनी पड़ेगी? किसान संगठनों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक किसान असंतोष का कारण बन सकता है।


अब निगाहें प्रशासन पर

हाल ही में पदभार संभालने वाली नई जिलाधिकारी वसुमना पंत के सामने यह एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। पूरे जिले और राज्य की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इस मामले में कितनी संवेदनशीलता और तत्परता दिखाता है। रोशन कुडे की यह पुकार केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि उस तंत्र की विफलता का आईना है, जहां न्याय की उम्मीद टूटने पर जीवन ही बोझ बन जाता है।

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page