पुस्तक समीक्षा -"प्रेम कलश" खण्डकाव्य
- Ashok kumar Singh

- 1 दिन पहले
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समीक्षक - लालबहादुर चौरसिया 'लाल' साहित्यकार एवं कवि महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई
"प्रेम कलश" पुस्तक आज़मगढ़ जनपद के प्रतिष्ठित कवि श्री रुद्रनाथ चौबे 'रुद्र' जी द्वारा रचित श्रृंगार रस से ओतप्रोत, मनमुग्ध कर देने वाला मनोहारी खण्डकाव्य है। जो कि 'कामायनी प्रकाशन' प्रयागराज से प्रकाशित है। खण्डकाव्य "प्रेम कलश" की विधिवत भूमिका श्रीराम तिवारी 'सहज' जी ने लिखी है, यह बड़े गौरव की बात है। पुस्तक के शीर्षक से ही हमें यह आभास होने लगता है कि यह पुस्तक पूर्ण रूप से श्रृंगारिक रचना होगी और ऐसा है भी। प्रश्न उठता है कि कवि रुद्रनाथ 'रुद्र' जी ने सिर्फ़ प्रेम और कलश को ही क्यों चुना? विषय तो और भी हो सकते थे। तो इसका एकमात्र उत्तर यही है कि कवि के मन में आदर्श और आध्यात्मिक प्रेम की अगाध भावना समाहित है। जिसके परिणामस्वरूप श्री 'रुद्र' जी ने अपनी लेखनी को प्रेम से अभिसिंचित करके "प्रेम कलश" जैसा मनोहारी खण्डकाव्य की रचना की। जो कि अपने आप में श्रेष्ठ है।
कुल पाँच खण्डों में विभक्त खण्डकाव्य, प्रेम की व्यापकता से लबरेज़ है। इस खण्डकाव्य में कुल एक सौ छत्तीस पद हैं। अधिकांश पदों में प्रेम रूपी शब्द विद्यमान है। खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का प्रथम पद ही संपूर्ण पुस्तक की व्याख्या करने का भाव लिए परिलक्षित होता है। जो निम्न है -
"प्रेम कलश की प्रेम भित्ति पर,
प्रेम चिन्ह अंकित था।
स्वास्तिक वंदनवारों से वह,
पूरी तरह अलंकृत था।।"
कविवर श्री 'रुद्र' जी ने प्रतीकों के माध्यम से प्रेम रस के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ होकर पावन कलश की स्थापना को मूर्त रूप देने का सार्थक प्रयास किया है और इस प्रयास में उन्हें भरपूर सफलता भी अर्जित हुई है। वह भी ऐसा कलश जो एक मिट्टी का बना पात्र नहीं, बल्कि उन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को एक कलश के रूप में स्वीकारा है। कलश शीतलता का प्रतीक है, सुख-समृद्धि का प्रतीक है, सकारात्मकता का प्रतीक है, शांति का प्रतीक है, विजय का प्रतीक है। जब इसी स्थूल कलश में प्रकृति और पुरुष का प्रेमालाप होगा तो निश्चित ही मानव मन अभिरंजित होगा। कविवर श्री 'रुद्र' जी ने शिव और शिवा जैसी दैवीय शक्तियों का मानवीकरण करते हुए "प्रेम कलश" खण्डकाव्य को और भी ऊँचाई प्रदान की है।
"प्रेम ही ईश्वर है" इस कथन की व्यापकता "प्रेम कलश" में विस्तृत रूप में विद्यमान है। प्रेम अचानक नहीं होता। जिस प्रकार मिट्टी के अंदर छिपे बीज का एक परिपक्व वृक्ष बन जाने की प्रक्रिया अचानक नहीं होती। एक लंबा सफ़र तय करना पड़ता है। एक लंबा समय लगता है। इस लंबे समय के एक-एक सोपान में उस बीज की जीवन-गाथा समाई होती है। उसी प्रकार सुकवि श्री 'रुद्र' जी ने प्रथम सर्ग से लेकर पंचम सर्ग तक जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव का बखूबी वर्णन किया है। जिसमें अनेकों रसों का समावेश है। वे रस हमारे मन को हर समय आंदोलित करते रहते हैं। कविवर श्री 'रुद्र' जी ने शिव और शिवा के अलावा प्रकृति से जुड़े अनेक गौरवपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला है। कलश और उसमें परिपूर्ण जल की पवित्रता पर अपनी सशक्त लेखनी का परिचय देते हुए कवि 'रुद्र' जी लिखते हैं -
"नीर भरा था प्रेम कलश में,
फूलों के मकरंद घुले।
आनंद सुगंध सुवासित जल में,
प्रेम शक्ति के छंद मिले।।"
श्री रुद्रनाथ 'रुद्र' जी द्वारा रचित खण्डकाव्य "प्रेम कलश" के पाँचों सर्ग, श्रृंगार रस के विभिन्न बिंदुओं से होकर प्रवाहित होते हैं। प्रथम सर्ग में कवि ने प्रेम कलश व दो काल्पनिक पात्र शिव और शिवा का विधिवत परिचय कराया है। जोकि नितांत आवश्यक था। द्वितीय सर्ग में कवि ने प्रेम कलश रूपी संसार में शिव और शिवा नामक नायक व नायिका के सूक्ष्म मिलन का बड़ा ही रोचक विवरण प्रस्तुत किया है। जब दोनों के हृदय में प्रेम का अंकुर फूटा, तथा नायक और नायिका एक-दूसरे को पसंद करने लगे। इसी प्रकार तृतीय सर्ग में कविवर 'रुद्र' जी ने नायक और नायिका के बीच पनपे प्रेमांकुर को और प्रगाढ़ता की तरफ पहुँचाने का सफल प्रयास किया है। नायिका के सौंदर्य का वर्णन करते हुए 'रुद्र' जी लिखते हैं -
"नई नवेली नूतन सी नायिका,
बन सज के शिवा सँवरी थी।
मानो रति श्रृंगार सजाकर,
आज अवनि पर उतरी थी।।"
चतुर्थ सर्ग में कवि ने नायक-नायिका के वियोग का वर्णन बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है। जो पाठकों के दिलों को आंदोलित करता है, तथा इसी सर्ग में अंकित कई पद हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आने पर एक संबल प्रदान करने में सहायक भी हो सकते हैं। उसकी एक बानगी देखें -
"तन से दूर भले जाऊँ पर,
मन तेरे साथ रहेगा।
पल-पल चिंतन होगा,
तन आस लिए तड़पेगा।।"
पंचम सर्ग जो 'प्रेम कलश' का अंतिम सर्ग है, जिसमें कविवर 'रुद्र' जी ने वियोग व वियोग के लंबे अंतराल के बाद नायक और नायिका का मिलन बड़े ही सराहनीय ढंग से दर्शाया है। इसी प्रेम कलश में शिवा और शिव जो कि इस खण्डकाव्य के काल्पनिक पात्र हैं, वे संसार रूपी कलश में विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार खण्डकाव्य पूर्ण हो जाता है। अर्थात कविवर 'रुद्र' जी के हृदय में समग्र संसार को देखने, समझने व वर्णन करने का जो नज़रिया है, वह बिल्कुल सहज है। जिस प्रकार तुलसीदास जी महाराज ने संपूर्ण जगत को राममय मानते हुए कहा है -
"सियाराम मय सब जग जानी,
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।"
उसी प्रकार 'रुद्र' जी ने संपूर्ण जगत में यदि कहीं भी अपनी दृष्टि डाली है तो उन्हें सिर्फ़ प्रेम का दर्शन और प्रेम का ही आभास हुआ है, जो कि समाज और साहित्य के लिए बड़े गौरव की बात है।
हालाँकि कविवर 'रुद्र' जी ने यह बताने में कुछ कोताही अवश्य की है कि नायक और नायिका का वियोग किस कारणवश हुआ। कौन-सी ऐसी परिस्थितियाँ आईं, जब शिव और शिवा अलगाव की स्थिति में जा पहुँचे। कौन-सी परिस्थितियाँ ऐसी आईं कि जब उनका पुनर्मिलन हुआ।
फिर भी सब मिलाकर यह रससिक्त खंड काव्य मनोहारी है। अतः मैं लालबहादुर चौरसिया 'लाल' कविवर 'रुद्र' जी को उनकी इस प्रेम रस से अभिसिंचित पुस्तक की सर्जना के लिए बहुत-बहुत साधुवाद देता हूँ, तथा ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपका यह "प्रेम कलश" खण्डकाव्य साहित्य जगत में एक नया कीर्तिमान स्थापित करे।

कविवर डॉ रुद्रनाथ चौबे 'रुद्र' जी को अनंत शुभकामनाएँ...
-लालबहादुर चौरसिया 'लाल'
साहित्यकार एवं कवि
महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई
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