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पप्पू यादव के बयान पर बिहार राज्य महिला आयोग सख्त

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 23
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

पटना। बिहार की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव के महिलाओं को लेकर दिए गए आपत्तिजनक बयान पर बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष (अप्सरा) ने तीखी प्रतिक्रिया दी। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने सांसद के बयान को न सिर्फ महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बताया, बल्कि उनके आचरण को जनप्रतिनिधि के पद के अनुरूप न होने वाला करार दिया।

अध्यक्ष ने कड़े शब्दों में कहा कि उनके फोटो का गलत तरीके से इस्तेमाल कर उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया है, जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा, “सांसद ने गलत नंबर डायल कर दिया है, अब मैं उन्हें हर स्तर पर जवाब दूंगी।”

विवाद की पृष्ठभूमि

दरअसल, विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें पप्पू यादव ने दावा किया था कि “90 प्रतिशत महिलाओं का राजनीतिक करियर नेताओं के बेड से शुरू होता है।” इस बयान के बाद उन्होंने एक फेसबुक लाइव के दौरान सांसद पप्पू यादव के साथ महिला आयोग अध्यक्ष की तस्वीर दिखाते हुए उनके राजनीतिक सफर पर सवाल उठाए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए आयोग अध्यक्ष ने इसे “मानसिक दिवालियापन” करार दिया और कहा कि ऐसे बयान समाज को गलत दिशा में ले जाते हैं।

30 अप्रैल तक का नोटिस

महिला आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सांसद को नोटिस जारी किया है और 30 अप्रैल 2026 तक साक्ष्यों के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि “पप्पू यादव पर पहले से कई मामले दर्ज हैं, एक और जुड़ जाएगा तो शायद उन्हें फर्क न पड़े, लेकिन सच्चाई जनता के सामने लाई जाएगी।”

संघर्ष से यहां तक पहुंची हूं

अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हुए (अप्सरा) ने कहा कि उन्होंने छात्र राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के जरिए अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने कहा, “मैं पूर्णिया की बेटी हूं, मेरा दामन साफ है। मैंने संघर्ष कर यह मुकाम हासिल किया है और महिलाओं के सम्मान से कोई समझौता नहीं करूंगी।”

संवैधानिक गरिमा पर सवाल

सांसद द्वारा आयोग के नोटिस को सार्वजनिक रूप से खारिज करने की बात पर भी अध्यक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि एक सांसद का इस तरह संवैधानिक संस्था की अवमानना करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि नोटिस का जवाब देने के बजाय सोशल मीडिया के जरिए आयोग की शक्तियों को चुनौती देना गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है।

राजनीतिक हलकों में हलचल

इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस बयान की आलोचना करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। अब सभी की नजर 30 अप्रैल 2026 पर टिकी है, जब यह तय होगा कि यह विवाद कानूनी मोड़ लेता है या राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है।


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