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संप्रदायों से ऊपर उठे हिंदू समाज: सुप्रीम कोर्ट ने किस मामले में ऐसी अहम टिप्पणी

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 23
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और समानता के जटिल सवालों पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India की संविधान पीठ ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिसने व्यापक बहस को जन्म दे दिया है। न्यायालय ने कहा कि किसी भी धर्म की हर प्रथा को “आवश्यक धार्मिक प्रथा” मान लेना संभव नहीं है, खासकर तब जब वह नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य के मानकों पर खरी न उतरती हो।


नौ जजों की इस संविधान पीठ में शामिल न्यायमूर्ति Justice B. V. Nagarathna ने विशेष रूप से हिंदू समाज के भीतर बढ़ती संप्रदायिक विभाजन की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पंथों और परंपराओं में बंटकर रहने से समाज कमजोर होता है। उनके अनुसार, “हम उनके मंदिर नहीं जा सकते, वे हमारे मंदिर नहीं आ सकते”—इस प्रकार की सोच न केवल सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं को भी सीमित कर देती है। यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत Sabarimala Temple समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक भेदभाव से जुड़े मामलों पर सातवें दिन की सुनवाई कर रही थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्णतः निरंकुश नहीं है। यदि कोई प्रथा सामाजिक नैतिकता या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ जाती है, तो उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता Gopal Subramanium ने भी धर्म और विवेक की स्वतंत्रता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और स्वतंत्रता को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने अनुच्छेद 25(2)(बी) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी सुधारात्मक कानून को उसके उद्देश्य और आवश्यकता के संदर्भ में सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए।


संविधान पीठ ने यह भी माना कि हर धर्म और उसके संप्रदायों की अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं, इसलिए सभी के लिए एक समान मानक तय करना व्यावहारिक रूप से कठिन है। अदालत ने संकेत दिया कि “आवश्यक धार्मिक प्रथा” की पहचान करना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं का संतुलित मूल्यांकन जरूरी है। इस महत्वपूर्ण सुनवाई ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के भीतर संवाद और आत्ममंथन की भी आवश्यकता को रेखांकित करती है।


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