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तमिलनाडु में राहुल-स्टालिन दूरी के सियासी मायने

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 20
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

चेन्नई। राहुल गांधी के तमिलनाडु दौरे ने जहां चुनावी माहौल को गरमाया, वहीं उनकी और M. K. स्टालिन के बीच मंच साझा न करने को लेकर नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है। गठबंधन की मजबूती के दावों के बीच दोनों नेताओं का अलग-अलग सभाएं करना कई संकेत दे रहा है।


शनिवार को राहुल गांधी ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में जनसभाएं कर (डीएमके), कांग्रेस और (वीसीके) के उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाया। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए स्थानीय मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाया। हालांकि, इन सभाओं में मुख्यमंत्री स्टालिन की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए। चुनाव से पहले कयास लगाए जा रहे थे कि संसद में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर दिखी विपक्षी एकजुटता तमिलनाडु में भी दिखाई देगी। माना जा रहा था कि राहुल और स्टालिन का साझा मंच गठबंधन के लिए बड़ा संदेश देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सूत्रों के मुताबिक, सीट बंटवारे को लेकर पहले से ही कांग्रेस और डीएमके के बीच खींचतान रही है। इस विवाद में मणिक्कम टैगोर की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बताया जाता है कि स्टालिन ने राहुल गांधी को संदेश भेजकर स्थिति संभालने का आग्रह किया था, लेकिन इस पर कोई ठोस पहल नहीं हुई।


राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि टैगोर अब राहुल गांधी के करीबी सलाहकार के रूप में उभर रहे हैं और संगठनात्मक निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ गई है। यहां तक कि K. C. वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता भी कई मामलों में टैगोर के जरिए संवाद कर रहे हैं। ऐसे में यदि टैगोर मंच साझा करने के पक्ष में नहीं थे, तो राहुल का रुख भी उसी दिशा में रहने की संभावना जताई जा रही है। तमिलनाडु कांग्रेस के कुछ नेता इसे भविष्य की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं, जहां पार्टी राज्य में अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करना चाहती है। वहीं, डीएमके खेमे में इसे गठबंधन के भीतर बढ़ती दूरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व अब भी कायम है और एआईएडीएमके और डीएमके के बीच मुख्य मुकाबला रहता है। राष्ट्रीय पार्टियां अभी तक राज्य में निर्णायक विकल्प के रूप में पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाई हैं। ऐसे में राहुल गांधी और स्टालिन का अलग-अलग मंचों से प्रचार करना केवल एक घटनाक्रम नहीं, बल्कि गठबंधन की आंतरिक रणनीति और शक्ति संतुलन का संकेत भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दूरी महज रणनीतिक है या इसके पीछे गहरे राजनीतिक मतभेद छिपे हैं।

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