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चार राज्यों के चुनाव: कांग्रेस के लिए सियासी अग्निपरीक्षा, केरल पर टिकी सबसे बड़ी उम्मीद

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 5 days ago
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए निर्णायक साबित होने जा रहे हैं। पार्टी के सामने जहां अपनी साख बचाने की चुनौती है, वहीं कई राज्यों में संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक खींचतान उसके लिए चिंता का विषय बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।


केरल में सबसे अधिक उम्मीद, लेकिन राह कठिन

कांग्रेस की सबसे बड़ी उम्मीद केरल से जुड़ी हुई है, जहां पार्टी को पिनारयी विजयन के नेतृत्व वाली वाम सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर का लाभ मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। हालांकि, चुनाव प्रचार की धीमी शुरुआत और नेतृत्व को लेकर आंतरिक मतभेदों ने पार्टी की राह को जटिल बना दिया है।


मुख्यमंत्री पद को लेकर केसी वेणुगोपाल, वी.डी. सतीशान और रमेश चेन्निथला जैसे नेताओं के बीच खींचतान भी सामने आई है, जिससे संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल उठे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस के लिए केरल में जीत बेहद अहम मानी जा रही है।


असम में भाजपा से सीधी टक्कर, चुनौतियां भारी

असम में कांग्रेस का मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा से है, जहां पिछले एक दशक से पार्टी सत्ता से बाहर है। चुनाव से ठीक पहले दो प्रमुख नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है।


गौरतलब है कि यहां पार्टी संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी नए नेतृत्व को दी गई है, लेकिन समय की कमी और संसाधनों के प्रबंधन में देरी पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ा रही है। प्रियंका गांधी वाड्रा की भूमिका भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


तमिलनाडु में गठबंधन पर निर्भर भविष्य

तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है और उसकी स्थिति सहयोगी दल की ही बनी हुई है। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में गठबंधन की वापसी की संभावना जताई जा रही है, लेकिन कांग्रेस के भीतर सत्ता-साझेदारी को लेकर असंतोष भी उभर कर सामने आया है।


वहीं अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके की सक्रियता ने राज्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है, जिससे भविष्य में गठबंधन समीकरण बदलने की आशंका भी जताई जा रही है।


पश्चिम बंगाल में ‘एकला चलो’ रणनीति

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने इस बार वाम दलों से दूरी बनाते हुए “एकला चलो” की रणनीति अपनाई है। पार्टी 2006 के बाद पहली बार सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।


हालांकि, राज्य में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के मजबूत प्रभाव के बीच कांग्रेस के लिए अपनी जमीन फिर से तैयार करना आसान नहीं होगा।


पुडुचेरी में भी स्थिति अनिश्चित

केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत नहीं मानी जा रही है। यहां क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है, जिससे परिणाम अनिश्चित बने हुए हैं।


नेतृत्व के संकेत और सियासी संदेश

चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल के बयान और राहुल गांधी की प्रतिक्रियाओं से भी यह संकेत मिला कि पार्टी को केरल और तमिलनाडु से अधिक उम्मीदें हैं, जबकि अन्य राज्यों को लेकर सतर्क रुख अपनाया गया है।


कुल मिलाकर, आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं। केरल में जीत पार्टी के लिए राहत लेकर आ सकती है, जबकि अन्य राज्यों में कमजोर प्रदर्शन उसके राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

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