ग्रीन इकोनॉमी में नई पहचान बना रहा छत्तीसगढ़, हरित विकास की दिशा में तेजी से बढ़ रहा राज्य : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय
- धन्ना राम चौधरी

- 13 मार्च
- 3 मिनट पठन
भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
रायपुर। छत्तीसगढ़ अब पारंपरिक औद्योगिक विकास के साथ-साथ हरित और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पावर इंजन है और अब ग्रीन इकोनॉमी के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है।
मुख्यमंत्री साय शुक्रवार को रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में आयोजित द्वितीय छत्तीसगढ़ हरित शिखर सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस प्रकार के सम्मेलनों की उपयोगिता इसलिए और अधिक बढ़ जाती है क्योंकि इसके माध्यम से नीति निर्माण से जुड़े लोग, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, शिक्षाविद, शोधकर्ता और पर्यावरण विशेषज्ञ एक ही मंच पर आकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते हैं और समाधान तलाशते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज विश्व जलवायु संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में केवल पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार में भी उतारना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को ध्यान में रखते हुए नीतिगत स्तर पर ठोस कदम उठा रही है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार “विरासत के साथ विकास” की नीति पर कार्य कर रही है। भारत की पारंपरिक जीवनशैली सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित रही है और यही परंपरा आज भी पर्यावरण संरक्षण के लिए मार्गदर्शक है।
मुख्यमंत्री साय ने बताया कि छत्तीसगढ़ देश में स्टील उत्पादन का प्रमुख केंद्र है और इस क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ग्रीन स्टील जैसी तकनीकों को अपनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार उद्योगों को पर्यावरण अनुकूल तकनीकों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जिससे आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सके।
उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट-2023 के अनुसार संयुक्त वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि के मामले में छत्तीसगढ़ ने देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि का श्रेय राज्य सरकार की पर्यावरणीय नीतियों के साथ-साथ प्रदेशवासियों की जागरूकता और प्रकृति के प्रति उनके दायित्वबोध को दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में सोलर रूफटॉप योजना के माध्यम से आम उपभोक्ताओं को ऊर्जा उत्पादक बनाया जा रहा है। इसके अलावा बायो-एथेनॉल जैसे क्षेत्रों में निवेश की भी व्यापक संभावनाएं उभर रही हैं, जो राज्य को हरित ऊर्जा के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान कर सकती हैं।
उन्होंने “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की पहलें लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में धरती को मां का दर्जा दिया गया है और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय उसके संतुलन और स्वास्थ्य का ध्यान रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
मुख्यमंत्री साय ने बताया कि छत्तीसगढ़ एक जनजातीय बहुल राज्य है और राज्य का लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है और वनांचलों में वृक्षों को “सरना” अर्थात देवता के रूप में पूजा जाता है। इतना ही नहीं, कई स्थानों पर इन सरना स्थलों को राजस्व रिकॉर्ड में भी देवस्थल के रूप में दर्ज किया गया है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का भाव जनजातीय समाज से सहज रूप से सीखा जा सकता है और यही भावना राज्य को हरित विकास की दिशा में आगे बढ़ाने में प्रेरणा देती है।
कार्यक्रम में मेघालय के लोकायुक्त सी. पी. मारक, विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद शुक्ला, पीसीसीएफ वी. श्रीनिवास राव, विबग्योर फाउंडेशन के अध्यक्ष शंखदीप चौधरी सहित विषय विशेषज्ञ, प्रोफेसर, प्रबुद्धजन, शोधकर्ता और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
सम्मेलन में हरित ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई तथा भविष्य की रणनीतियों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
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