गिग वर्कर्स जांच पर महाराष्ट्र में सियासत तेज
- धन्ना राम चौधरी

- 8 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
मुंबई। महाराष्ट्र में फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स सेक्टर से जुड़े गिग वर्कर्स के वेरिफिकेशन को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और कथित भेदभाव जैसे मुद्दों के बीच राज्य सरकार सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष इसे आम कामगारों को परेशान करने की साजिश बता रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार जल्द ही स्विगी, ज़ोमैटो और ब्लिंकिट जैसे प्लेटफॉर्म से जुड़े डिलीवरी कर्मियों के लिए अनिवार्य पहचान और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन लागू कर सकती है। इस प्रस्तावित व्यवस्था में दस्तावेजों की गहन जांच और पहचान सत्यापन को अनिवार्य बनाया जाएगा।
इस मुद्दे को सबसे पहले प्रमुखता से उठाने वाले बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने दावा किया है कि गिग वर्क सेक्टर में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए काम कर रहे हैं, जिनमें कुछ आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने मांग की है कि डिलीवरी कर्मचारियों का पासपोर्ट स्तर का सख्त सत्यापन किया जाए। वहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने गृह और श्रम विभाग की बैठक में इस दिशा में सख्त एसओपी लाने के संकेत दिए हैं। सरकारी सूत्रों का कहना है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि जमीनी स्तर पर गिग वर्कर्स के बीच इस प्रस्ताव को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ डिलीवरी कर्मियों और कैब ड्राइवरों का मानना है कि मौजूदा थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन सिस्टम में खामियां हैं, जिससे बाहरी तत्वों की घुसपैठ संभव हो जाती है। ऐसे में सख्त जांच से ईमानदार कामगारों की पहचान सुरक्षित रहेगी। वहीं दूसरी ओर, कई वर्कर्स ने आशंका जताई है कि जांच के नाम पर भेदभाव बढ़ सकता है। उनका कहना है कि वे वैध दस्तावेजों के साथ काम कर रहे हैं और किसी भी समुदाय विशेष को निशाना बनाना उचित नहीं है।
राजनीतिक स्तर पर विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आसिम आजमी, एआईएमआईएम के वारिश पठान और कांग्रेस के कई नेताओं ने आरोप लगाया है कि यह कार्रवाई खास तौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश है। उनका कहना है कि अगर अवैध घुसपैठ हुई है तो यह सरकार की विफलता है, लेकिन आम कामगारों को परेशान करना समाधान नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि गिग इकॉनमी में तेजी से बढ़ती भागीदारी के साथ पारदर्शी और संतुलित वेरिफिकेशन प्रणाली की आवश्यकता है, ताकि सुरक्षा और रोजगार—दोनों के बीच संतुलन कायम रह सके।
फिलहाल गिग वर्कर्स के वेरिफिकेशन का मुद्दा “सुरक्षा बनाम सियासत” के बीच फंसा नजर आ रहा है। अब सबकी नजर सरकार की आगामी एसओपी पर टिकी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी या फिर यह विवाद को और गहरा करेगी।
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