गौशाला में आग: होसुर-बडे में 1.5 करोड़ का नुकसान, बेंगलुरु गौशाला त्रासदी: आखिर गलती कहाँ हुई?
- धन्ना राम चौधरी

- 21 मार्च
- 2 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 28 मार्च

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
बेंगलूरु। कर्नाटक के होसूर-बंडे बेंगलूरु क्षेत्र स्थित श्री कृष्णा सेवा आश्रम गौशाला में मंगलवार को लगी भीषण आग ने न केवल लाखों की संपत्ति को राख में बदल दिया, बल्कि प्रशासनिक तैयारियों और सुरक्षा इंतजामों की पोल भी खोलकर रख दी। इस अग्निकांड में डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है, जबकि तीन गोमाताओं की दर्दनाक मौत हो गई और कई अन्य अब भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग सुबह करीब 11:30 बजे चारा गोदाम से शुरू हुई। सवाल यह उठता है कि इतने संवेदनशील स्थान पर अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे? सूखे चारे के बड़े भंडारण के बावजूद न तो कोई फायर अलार्म सिस्टम मौजूद था और न ही प्राथमिक स्तर पर आग बुझाने के साधन पर्याप्त थे। परिणामस्वरूप, आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया और दो बड़े शेड को अपनी चपेट में ले लिया।
घटना की सूचना मिलने के बाद दमकल विभाग की गाड़ियां मौके पर तो पहुंचीं, लेकिन आग पर काबू पाने में करीब 24 घंटे का समय लग गया। यह देरी कई गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या दमकल संसाधनों की कमी है या फिर आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र पूरी तरह से लचर हो चुका है?
गौशाला प्रबंधन के मुताबिक, इस हादसे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का चारा और ढांचा जलकर नष्ट हो गया। करीब 60 लाख रुपये की लागत से बने दो शेड पूरी तरह खाक हो गए। तीन गोमाताओं की मौत और कई के गंभीर रूप से झुलसने की घटना ने गौसेवा के नाम पर चल रही व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी है।

गौशाला के संचालक पुखराज महाराज ने इस घटना को संदिग्ध बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी घटना बिना किसी कारण के होना संभव नहीं है, और इसके पीछे किसी साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा है, तो यह केवल एक हादसा नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक लापरवाही या षड्यंत्र का मामला बनता है।
घटना के बाद सैकड़ों गोसेवकों और स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने करीब चार किलोमीटर पैदल मार्च कर बागलूर पुलिस स्टेशन पहुंचकर प्राथमिकी दर्ज कराई और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होता है, जबकि रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
प्रशासन ने जांच शुरू करने और नुकसान का आकलन करने की बात कही है, लेकिन यह वही पारंपरिक प्रतिक्रिया है जो हर बड़ी घटना के बाद दोहराई जाती है। असली सवाल यह है कि क्या इस जांच से कोई ठोस नतीजा निकलेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
हर बार की तरह इस बार भी घटना के बाद ‘जांच’ और ‘कार्रवाई’ के आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और लापरवाह तंत्र पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं यूं ही होती रहेंगी। गौसेवा की आड़ में चल रही व्यवस्थाओं और प्रशासनिक उदासीनता की यह आग केवल संपत्ति ही नहीं, बल्कि संवेदनाओं को भी झुलसा रही है।
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