आकर्षण के सिद्धांत का वास्तविक मनोविज्ञान: विचार ही गढ़ते हैं व्यक्तित्व, कर्म और भविष्य — मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज
- धन्नाराम चौधरी

- 2 अग॰
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'साइकोलॉजी ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन' प्रवचन श्रृंखला में जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत समन्वय, सकारात्मक विचारों से जीवन परिवर्तन का दिया संदेश
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 2 अगस्त, 2026 आकर्षण के सिद्धांत का वास्तविक मनोविज्ञान केवल इच्छाओं की पूर्ति का सिद्धांत नहीं, बल्कि विचार, विश्वास, भाव और कर्म के समन्वय का विज्ञान है। यही संदेश रविवार को तुबरहल्ली स्थित ज्ञानोदय परिसर (इनर रिफ्लेक्शन सेंटर) में आयोजित "साइकोलॉजी ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन" प्रवचन श्रृंखला में पूज्य मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने दिया। उन्होंने आध्यात्मिकता, आधुनिक विज्ञान और जैन दर्शन को सरल एवं व्यवहारिक भाषा में प्रस्तुत करते हुए बताया कि मनुष्य का भविष्य उसके विचारों से निर्मित होता है।
अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति सुख, शांति, सफलता और समृद्धि चाहता है, लेकिन केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं होता। यदि मन में भय, संदेह, नकारात्मक धारणाएँ और विरोधाभासी विचार बने रहें, तो व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता तक नहीं पहुँच पाता। उन्होंने कहा कि आकर्षण का सिद्धांत तभी प्रभावी होता है, जब विचार, विश्वास और कर्म एक ही दिशा में प्रवाहित हों।

मुनि श्री ने आधुनिक न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान के उदाहरण देते हुए समझाया कि हमारा मस्तिष्क कल्पना और वास्तविक अनुभव के बीच बहुत कम अंतर करता है। जब व्यक्ति बार-बार भय, असफलता या चिंता की कल्पना करता है, तो शरीर में उसी प्रकार के रासायनिक और हार्मोनल परिवर्तन होने लगते हैं, जैसे वे घटनाएँ वास्तव में घट रही हों। इसके विपरीत सकारात्मक, उद्देश्यपूर्ण और आत्मविश्वास से भरे विचार व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार को नई दिशा देते हैं।
उन्होंने जैन आगमों में वर्णित तंदुल मत्स्य की प्रेरक कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि कर्मबंधन केवल बाहरी कार्यों से नहीं, बल्कि मन के भीतर उत्पन्न होने वाले भावों और संकल्पों से भी होता है। यदि व्यक्ति निरंतर ईर्ष्या, भय, क्रोध या नकारात्मक चिंतन में डूबा रहता है, तो वही भाव भविष्य के कर्मों का आधार बनते हैं। वहीं शुद्ध भाव, करुणा, संयम और सकारात्मक चिंतन आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में परिवर्तन लाने के लिए सबसे पहले स्वयं पर विश्वास विकसित करना आवश्यक है। बाहरी परिस्थितियाँ सफलता की सबसे बड़ी बाधा नहीं हैं, बल्कि मन के भीतर छिपे नकारात्मक संस्कार और सीमित धारणाएँ व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकती हैं। जब व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं, विश्वासों और कर्मों को एक दिशा में समन्वित कर लेता है, तभी वास्तविक सफलता और आत्मिक विकास संभव होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि "साइकोलॉजी ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन" प्रवचन श्रृंखला का उद्देश्य जैन दर्शन को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन, मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और सकारात्मक जीवनशैली की ओर प्रेरित करना है। इस श्रृंखला के माध्यम से युवा, विद्यार्थी, व्यवसायी और परिवार सभी वर्गों को जीवन प्रबंधन के व्यावहारिक सूत्र प्रदान किए जा रहे हैं।
प्रवचन के समापन पर मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से अपने विचारों की शुद्धता बनाए रखने, सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि "मनुष्य जैसा निरंतर सोचता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व, कर्म और भविष्य बनता है।" उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रवचन को अत्यंत प्रेरणादायी बताते हुए इसे आत्मपरिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन माना।
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