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आंबेडकर जयंती विशेष: मजदूरों के हक की बुलंद आवाज बने बाबासाहेब

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 14
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। देशभर में आज आंबेडकर जयंती के अवसर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर को याद किया जा रहा है। उन्हें सिर्फ संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि मजदूरों और वंचित वर्गों के सशक्त अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मसीहा के रूप में भी देखा जाता है। उनके जीवन के कई ऐसे प्रसंग हैं, जो उन्हें श्रमिकों का सच्चा हितैषी सिद्ध करते हैं। स्वतंत्रता पूर्व भारत में जब राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष अपने चरम पर थे, उस दौर में भी बाबासाहेब ने मजदूरों के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने सत्ता और बहुमत की राजनीति पर तीखा प्रहार करते हुए चेताया था कि “अपरिमित बहुमत भ्रष्टाचार को जन्म देता है और अंततः लोकतंत्र को कमजोर करता है।” यह विचार उन्होंने एक सभा में व्यक्त किया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।


‘काला कानून’ के खिलाफ बुलंद हुई आवाज

साल औद्योगिक कलह विधेयक 1938 के दौरान बाबासाहेब का संघर्ष मजदूर इतिहास में एक अहम अध्याय बन गया। 15 सितंबर 1938 को बंबई विधानसभा में पेश इस विधेयक का उन्होंने कड़ा विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि यह कानून मजदूरों के हड़ताल जैसे मौलिक अधिकार को खत्म कर देगा और उन्हें असहाय बना देगा। उन्होंने विभिन्न मजदूर संगठनों के साथ मिलकर इस विधेयक के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा किया। 7 नवंबर 1938 को लगभग 60 से अधिक श्रमिक संगठनों ने मिलकर ऐतिहासिक हड़ताल का आह्वान किया। बंबई के मजदूर मैदान में करीब 80 हजार मजदूरों की विशाल सभा ने इस आंदोलन को नई दिशा दी। बाबासाहेब के नेतृत्व में यह आंदोलन इतना प्रभावशाली हुआ कि इसे देशभर में समर्थन मिला, हालांकि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसे पारित कर दिया, जिसे मजदूर संगठनों ने ‘काला कानून’ करार दिया।


सिद्धांतों से समझौता नहीं

इस आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बाबासाहेब से कांग्रेस के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया। लेकिन बाबासाहेब ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कांग्रेस उस समय मजदूरों और किसानों के हितों की अनदेखी कर रही है, इसलिए वे ऐसे संगठन के साथ नहीं जुड़ सकते जो आमजन के अधिकारों से समझौता करे।


श्रम मंत्री के रूप में ऐतिहासिक योगदान

बाबासाहेब ने वर्ष 1942 से 1946 के बीच वायसराय की काउंसिल में श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए श्रमिक कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियां लागू कीं। उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र में मजदूर और मालिकों के बीच संतुलन बनाने, काम के घंटे तय करने, श्रमिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे कई अहम सुधार किए। उनकी नीतियों ने भारतीय श्रम व्यवस्था की मजबूत नींव रखी, जिसका लाभ आज भी करोड़ों कामगारों को मिल रहा है।


आज भी प्रासंगिक हैं बाबासाहेब के विचार

आज जब देश श्रमिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और समान अवसर की बात करता है, तब बाबासाहेब के विचार और संघर्ष और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने जिस साहस और स्पष्टता के साथ मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आंबेडकर जयंती के इस अवसर पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का भी दिन है।

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