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अहंकार बनाता है गुलाम, आत्मसम्मान देता है आत्मबल: निर्यापक मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 8 अग॰
  • 2 मिनट पठन
Shirtless bald man speaks at a microphone on a temple-like stage, with a phone and papers in front; file photo text at bottom right.

'दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर जीवन कभी स्वतंत्र नहीं होता', तुबरहल्ली में आध्यात्म और मनोविज्ञान का प्रेरक संगम

भारतार्थ खबर | संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 7 अगस्त 2026 अहंकार और आत्मसम्मान के बीच का अंतर यदि व्यक्ति समझ ले, तो जीवन की अधिकांश मानसिक समस्याओं से मुक्ति संभव है। यही प्रेरक संदेश दिया निर्यापक मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने श्री ज्ञानोदय दिगंबर जैन मंदिर, तुबरहल्ली में आयोजित अपने दैनिक प्रवचन में। "अहंकार और आत्मसम्मान का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण" विषय पर आधारित यह प्रवचन आध्यात्म, आधुनिक मनोविज्ञान और आत्मविकास का अनूठा संगम बनकर सामने आया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के विचारों को गंभीरता से सुना और आत्मचिंतन का संकल्प लिया।


प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने कहा कि आज अधिकांश लोग अपने सुख-दुःख का नियंत्रण स्वयं के पास रखने के बजाय दूसरों की राय, प्रशंसा और स्वीकृति पर छोड़ देते हैं। यही मानसिक तनाव, असंतोष और अशांति का सबसे बड़ा कारण बनता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दूसरों की सराहना पर टिका हो, वह वास्तव में स्वतंत्र नहीं बल्कि मानसिक रूप से दूसरों का गुलाम बन जाता है।


उन्होंने कहा कि अहंकार (मान) और आत्मसम्मान देखने में समान लग सकते हैं, लेकिन दोनों की जड़ें पूरी तरह अलग हैं। अहंकार बाहरी सम्मान, प्रशंसा और मान्यता पर आधारित होता है, जबकि आत्मसम्मान व्यक्ति के भीतर के सत्य, आत्मविश्वास और आत्मबोध से उत्पन्न होता है। आत्मसम्मान व्यक्ति को परिस्थितियों में भी स्थिर रखता है, जबकि अहंकार छोटी-सी आलोचना से भी विचलित हो जाता है।


मुनिश्री ने आधुनिक डिजिटल जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर लाइक, फॉलोअर्स और प्रशंसा पाने की निरंतर इच्छा भी अहंकार का आधुनिक रूप है। जब व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से करने लगता है और अपनी पहचान बाहरी स्वीकृति में खोजता है, तब मानसिक तनाव, असंतोष और अवसाद जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं।


उन्होंने कहा कि भगवान अरिहंत और तीर्थंकर समभाव में इसलिए स्थित रहते हैं क्योंकि उनका आनंद किसी बाहरी प्रशंसा या निंदा पर आधारित नहीं होता। उनका आत्मबल अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य से परिपूर्ण होता है। यही कारण है कि वे हर परिस्थिति में शांत, अडोल और निर्विकार बने रहते हैं।


मुनिश्री ने कहा कि यदि व्यक्ति स्वयं को पहचान ले, अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करे और आत्मसम्मान को विकसित करे, तो न प्रशंसा उसे अहंकारी बना सकती है और न आलोचना उसे कमजोर कर सकती है। आत्मबल ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है, जो व्यक्ति को हर परिस्थिति में संतुलित बनाए रखती है।


उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे तुलना, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और बाहरी मान्यता की अपेक्षा से ऊपर उठकर आत्मचिंतन, विनम्रता, ध्यान और आत्मजागरण का मार्ग अपनाएं। यही मार्ग मानसिक शांति, सफल व्यक्तित्व और आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनता है।


प्रवचन के अंत में श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में आत्मसम्मान, सकारात्मक सोच और विनम्रता को अपनाकर मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

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