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असम चुनाव में सीधी टक्कर: हिमंत बिस्वा सरमा बनाम गौरव गोगोई, सत्ता बचाने और वापसी की जंग तेज

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 7 days ago
  • 3 min read

फ़ाइल फोटो

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

गुवाहाटी। असम विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। इस बार चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है, जहां एक ओर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के युवा नेता गौरव गोगोई पार्टी की दशकभर बाद वापसी का सपना लेकर मैदान में उतरे हैं।


राज्य की 126 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल को एक चरण में मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। इस चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति अपनाई है।


गठबंधन और सीटों का गणित

बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगियों असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ गठबंधन कायम रखा है। सीट बंटवारे के तहत बीजेपी 89, एजीपी 26 और बीपीएफ 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं, यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) इस बार अलग होकर 15 सीटों पर किस्मत आजमा रही है।


दूसरी तरफ कांग्रेस ने ‘महाजोत’ के तहत असम जातीय परिषद (एजेपी), रायजोर दल, वाम दलों और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस के साथ गठबंधन किया है। कांग्रेस ने 87 उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए सहयोगियों को भी हिस्सेदारी दी है। हालांकि कुछ सीटों पर सहयोगी दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला भी देखने को मिलेगा।


इस चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी 27 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका बढ़ गई है।


टिकट वितरण से बीजेपी में असंतोष

बीजेपी ने एंटी-इनकंबेंसी को कम करने के लिए 21 उम्मीदवारों के टिकट काट दिए हैं और कई पूर्व कांग्रेसी नेताओं को मौका दिया है। इससे पार्टी के भीतर असंतोष उभरकर सामने आया है। नाराज कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी ने पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर ‘बाहरी’ नेताओं को प्राथमिकता दी है।


परिसीमन से बदले राजनीतिक समीकरण

2023 में हुए परिसीमन के बाद राज्य की कई सीटों के सामाजिक और जातीय समीकरण बदल गए हैं। मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 30 से घटकर 22 रह गई है। राज्य में लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस और एआईयूडीएफ का समर्थन करती रही है।


इस बार असम गण परिषद द्वारा मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिससे कांग्रेस को नुकसान होने की संभावना जताई जा रही है।


चुनावी मुद्दे: विकास बनाम ध्रुवीकरण

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने चुनाव से पहले कई लोकलुभावन घोषणाएं की हैं। चाय बागान श्रमिकों की मजदूरी में 30 रुपये की वृद्धि कर दी गई है, जिससे ब्रह्मपुत्र घाटी में मजदूरी 280 रुपये और बराक घाटी में 258 रुपये हो गई है। राज्य में करीब 10 लाख चाय श्रमिक इस फैसले से सीधे प्रभावित होंगे।


इसके अलावा ‘अरुणोदय 3.0’ योजना के तहत 40 लाख लाभार्थियों को 9,000 रुपये की सहायता दी गई है। बीजेपी ने वादा किया है कि सत्ता में वापसी होने पर योजना का दायरा और बढ़ाया जाएगा तथा मुफ्त राशन के साथ अन्य जरूरी वस्तुएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।


वहीं, बीजेपी ने घुसपैठ और अस्मिता के मुद्दे को प्रमुख चुनावी एजेंडा बनाया है। पार्टी का दावा है कि सरकार ने अवैध कब्जों से 1.5 लाख बीघा जमीन मुक्त कराई है।


दूसरी ओर कांग्रेस ने सरकार पर भ्रष्टाचार और केवल ‘लाभार्थी राजनीति’ करने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि राज्य में वास्तविक विकास के मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है।


निर्णायक होगा चाय बागान और अल्पसंख्यक वोट

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चाय बागान श्रमिकों और अल्पसंख्यक वोटरों की भूमिका इस चुनाव में बेहद अहम रहने वाली है। करीब 30-35 सीटों पर चाय श्रमिक निर्णायक माने जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम वोट बैंक के बंटवारे से परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।


नतीजों पर टिकी नजर

9 अप्रैल 2026 को होने वाले मतदान के बाद 4 मई को यह साफ हो जाएगा कि असम की जनता सत्ता की निरंतरता चाहती है या बदलाव। फिलहाल राज्य की राजनीति में मुख्य मुकाबला हिमंत बिस्वा सरमा और गौरव गोगोई के बीच सिमटता नजर आ रहा है, जिसने इस चुनाव को और भी रोमांचक बना दिया है।

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