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15 साल पहले ‘डेथ’ घोषित हुआ था पुल, आज भी गुजर रहे भारी वाहन; गोड्डा में बड़े हादसे का खतरा

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 17 मई
  • 4 मिनट पठन
“गोड्डा जिले में चीर नदी पर बना जर्जर पुल, जिस पर अब भी भारी वाहनों का आवागमन जारी”
“गोड्डा जिले में चीर नदी पर बना जर्जर पुल, जिस पर अब भी भारी वाहनों का आवागमन जारी”

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

डेटलाइन: गोड्डा, झारखंड, 17 मई। झारखंड के गोड्डा जिले में चीर नदी पर बना एक जर्जर पुल स्थानीय प्रशासन और विभागीय लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। प्रखंड मुख्यालय के पास गुड़मेश्वर धाम के निकट स्थित यह पुल पिछले 15 वर्षों से ‘डेथ ब्रिज’ घोषित है, लेकिन इसके बावजूद यहां से आज भी भारी वाहनों और आम लोगों का आवागमन जारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

पुल की जर्जर स्थिति को लेकर ग्रामीणों और समाजसेवियों ने कई बार प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

1950 के दशक में बना था पुल

जानकारी के अनुसार, इस पुल का निर्माण वर्ष 1950 से 1955 के बीच किया गया था। दशकों तक यह पुल इलाके के प्रमुख संपर्क मार्ग के रूप में इस्तेमाल होता रहा। समय के साथ पुल की संरचना कमजोर होती चली गई और अब इसकी स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक पुल के कई हिस्सों में बड़े-बड़े गड्ढे बन चुके हैं। इसके गडर और पिलर भी जर्जर हो गए हैं। लगभग 25 वर्ष पहले पिलर के पास ढलाई कर पुल को अस्थायी रूप से बचाने की कोशिश की गई थी, लेकिन उसके बाद से कोई ठोस मरम्मत कार्य नहीं हुआ।

20 टन से अधिक वाहनों पर प्रतिबंध, फिर भी जारी आवागमन

सूत्रों के अनुसार पुल पर 20 टन से अधिक वजन वाले वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। इसके बावजूद कई भारी वाहन आज भी इस पुल से गुजर रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक निगरानी की कमी के कारण नियमों का पालन नहीं हो पा रहा।

ग्रामीणों का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग बनने के बाद भारी वाहनों की संख्या कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुई। ऐसे में पुल पर लगातार बढ़ता दबाव किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकता है।

‘भगवान भरोसे खड़ा है पुल’

इलाके के लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि गुड़मेश्वर बाबा की कृपा से ही पुल अब तक खड़ा हुआ है। कई स्थानीय निवासियों ने कहा कि पुल की हालत देखकर हर गुजरने वाला व्यक्ति डर महसूस करता है।

समाजसेवी अरविंद भगत ने बताया कि लगभग 15 वर्ष पहले इस पुल के पुनर्निर्माण के लिए दो बार टेंडर जारी किया गया था, लेकिन किसी भी ठेकेदार ने रुचि नहीं दिखाई। उनका कहना है कि बाईपास निर्माण की लागत अधिक होने और एक्सप्लोसिव लाइसेंस जैसी तकनीकी बाधाओं के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

विशेषज्ञ सर्वे और नए पुल की मांग

स्थानीय लोगों और समाजसेवियों ने प्रशासन से मांग की है कि पुल की तत्काल तकनीकी जांच कराई जाए। उनका कहना है कि या तो इस पुल के समानांतर नया पुल बनाया जाए या फिर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ टीम से इसकी संरचनात्मक क्षमता का आकलन कराया जाए।

लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो पुल कभी भी गिर सकता है और इससे बड़ी जनहानि हो सकती है।

प्रशासन पर उठ रहे सवाल

यह मामला अब केवल एक जर्जर पुल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के रखरखाव पर भी सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से चेतावनी के बावजूद जिम्मेदार विभागों ने गंभीरता नहीं दिखाई।

आपके मन में उठ रहे सवाल (Q&A)

Q1. यह पुल कहां स्थित है?

यह पुल झारखंड के गोड्डा जिले में गुड़मेश्वर धाम के पास चीर नदी पर स्थित है।

Q2. पुल को ‘डेथ’ घोषित कब किया गया था?

स्थानीय जानकारी के अनुसार लगभग 15 वर्ष पहले इसे असुरक्षित घोषित किया गया था।

Q3. क्या भारी वाहनों का आवागमन बंद है?

नहीं। 20 टन से अधिक वजन वाले वाहनों पर रोक होने के बावजूद भारी वाहन अब भी पुल से गुजर रहे हैं।

Q4. पुल की स्थिति कितनी खराब है?

पुल में बड़े गड्ढे, जर्जर पिलर और कमजोर गडर जैसी गंभीर संरचनात्मक समस्याएं बताई जा रही हैं।

Q5. समाधान के लिए क्या मांग उठ रही है?

स्थानीय लोग नए पुल के निर्माण और विशेषज्ञ टीम से तकनीकी सर्वे की मांग कर रहे हैं।

निष्कर्ष: गोड्डा का यह जर्जर पुल केवल एक निर्माण संरचना नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। लगातार चेतावनियों और वर्षों पुराने खतरे के बावजूद यदि समय पर कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अब नजर प्रशासन और संबंधित विभागों की अगली कार्रवाई पर टिकी है।

Source: स्थानीय प्रशासनिक सूत्र, ग्रामीणों के बयान, समाजसेवी अरविंद भगत की जानकारी।

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