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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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सर्वज्ञता पर जैन दर्शन का गहन विवेचन, आत्मा के परम स्वरूप को समझाया

लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
धन्ना राम चौधरी
1 अक्टू॰
4 मिनट पठन
वीरसागर जी महाराज सर्वज्ञता, केवलज्ञान और जैन दर्शन में आत्मा के परम स्वरूप पर प्रवचन देते हुए

भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 1 अक्टूबर 2026। “क्या सारी दुनिया को जानने वाला कोई भगवान हो सकता है?” इस गहन आध्यात्मिक प्रश्न पर निर्यापक श्रमण श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने जैन दर्शन के संदर्भ में सर्वज्ञता, केवलज्ञान, कर्म सिद्धांत और आत्मा के परम स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। बेंगलुरु में चल रहे चातुर्मास प्रवास के दौरान आयोजित प्रवचन में उन्होंने श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं को सर्वज्ञता की अवधारणा को तार्किक एवं सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया।

मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन में भगवान किसी बाहरी शक्ति द्वारा निर्मित या संसार को अपनी इच्छा से संचालित करने वाली सत्ता नहीं हैं। परमात्मा आत्मा की वह सर्वोच्च अवस्था है, जिसमें कर्मबंधनों का पूर्ण क्षय होने के बाद उसके स्वाभाविक अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अन्य गुण पूर्ण रूप से प्रकट हो जाते हैं।


कर्मावरण हटने पर प्रकट होता है अनंत ज्ञान

मुनि श्री ने बताया कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीवात्मा में अनंत ज्ञान और अनंत दर्शन की क्षमता विद्यमान है। कर्मों के आवरण के कारण यह शक्ति वर्तमान अवस्था में पूरी तरह प्रकट नहीं हो पाती। विशेष रूप से ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञान की अभिव्यक्ति को तथा दर्शनावरणीय कर्म दर्शन की शक्ति को बाधित करते हैं।

सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए साधक संयम, तप और वैराग्य के माध्यम से कर्मों का क्षय करता है। कर्मावरणों के पूर्ण क्षय की अवस्था में आत्मा में केवलज्ञान प्रकट होता है। जैन दर्शन में केवलज्ञानी आत्मा को समस्त द्रव्यों और उनकी अनंत पर्यायों का पूर्ण ज्ञान होने की अवधारणा बताई गई है। यह ज्ञान सामान्य इंद्रियों या मन के माध्यम से प्राप्त होने वाला सीमित ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मा की पूर्ण विकसित ज्ञानशक्ति का प्राकट्य माना गया है।


जैन दर्शन में भगवान सृष्टिकर्ता नहीं

प्रवचन में भगवान और सृष्टि के संबंध को लेकर जैन दर्शन की विशिष्ट अवधारणा भी स्पष्ट की गई। मुनि श्री के अनुसार जैन दर्शन संसार को किसी एक सृष्टिकर्ता द्वारा निर्मित नहीं मानता। लोक और उसमें विद्यमान द्रव्यों को अनादि माना गया है तथा जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव करता है।

इस दृष्टिकोण में भगवान किसी जीव को मनमाने ढंग से सुख या दुःख प्रदान करने वाले निर्णायक नहीं हैं। भगवान वीतराग और कर्मबंधन से मुक्त होते हैं। उन्होंने अरिहंत और सिद्ध अवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि अरिहंत अवस्था में आत्मा केवलज्ञान प्राप्त कर संसार में रहते हुए वीतरागता को प्राप्त करती है, जबकि सिद्ध अवस्था में समस्त कर्मों से पूर्णतः मुक्त आत्मा सिद्ध पद को प्राप्त करती है।


सर्वज्ञ जानते हैं, लेकिन हस्तक्षेप नहीं करते

प्रवचन में यह प्रश्न भी उठाया गया कि यदि भगवान सर्वज्ञ हैं और प्रत्येक जीव की स्थिति तथा उसके कर्मों को जानते हैं, तो वे संसार के दुःखों को समाप्त क्यों नहीं कर देते? मुनि श्री ने समझाया कि सर्वज्ञता और हस्तक्षेप अलग-अलग अवधारणाएं हैं। वीतराग भगवान राग-द्वेष से रहित होते हैं। जीव ने जिन कर्मों का बंध किया है, उनके परिणामों का अनुभव भी उसे अपने कर्मानुसार करना पड़ता है। किसी के कर्मफल को व्यक्तिगत इच्छा या पक्षपात के आधार पर बदलना जैन दर्शन की वीतरागता की अवधारणा से मेल नहीं खाता। इस प्रकार जैन दर्शन व्यक्ति को बाहरी सत्ता पर निर्भर रहने के बजाय अपने कर्म, आचरण और आत्मशुद्धि के प्रति स्वयं जिम्मेदार बनने की प्रेरणा देता है।


निर्मल दर्पण से समझाई सर्वज्ञता

सर्वज्ञता की अवधारणा को सरल बनाने के लिए मुनि श्री ने निर्मल दर्पण का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि दर्पण उसके सामने उपस्थित वस्तुओं को प्रतिबिंबित करता है, लेकिन किसी वस्तु के प्रति आकर्षण या घृणा का भाव नहीं रखता। इसी प्रकार केवलज्ञानी आत्मा के संबंध में जैन दर्शन की मान्यता है कि वह समस्त अस्तित्व को जानती है, लेकिन किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के प्रति राग-द्वेष उत्पन्न नहीं करती। पूर्ण ज्ञान के साथ आसक्ति का अभाव सर्वज्ञता और वीतरागता के समन्वय को स्पष्ट करता है।


हर आत्मा में परम ज्ञान की संभावना

प्रवचन में मुनि श्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सर्वज्ञता को किसी एक व्यक्ति या सीमित वर्ग तक सीमित समझना जैन दर्शन की मूल अवधारणा नहीं है। प्रत्येक जीवात्मा में अनंत ज्ञान और शक्ति की संभावना विद्यमान है। उन्होंने कहा कि साधना का उद्देश्य किसी बाहरी शक्ति को प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा पर पड़े कर्मावरणों को दूर कर उसके शुद्ध स्वरूप को प्रकट करना है। राग, द्वेष, अहंकार, लोभ और मोह में कमी के साथ आत्मा का वास्तविक स्वरूप अधिक स्पष्ट होता जाता है।


भक्ति का अर्थ आत्मगुणों का विकास

मुनि श्री ने आध्यात्मिक विचारों को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि आत्मिक उन्नति केवल शास्त्रों के अध्ययन तक सीमित नहीं है। सत्य, संयम, क्षमा, करुणा और आत्मनिरीक्षण को व्यवहार में उतारना भी आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति का अर्थ केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना करना नहीं, बल्कि भगवान के गुणों को देखकर अपने जीवन में उन गुणों को विकसित करने की प्रेरणा लेना है। वीतरागता को समझने वाला व्यक्ति अपने भीतर राग-द्वेष कम करने और शांति विकसित करने का प्रयास कर सकता है। मुनि श्री ने आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिक अपेक्षाओं के बीच आत्मनिरीक्षण के महत्व को रेखांकित किया। उनके अनुसार बाहरी परिस्थितियों को बदलने के साथ-साथ व्यक्ति जब अपने भीतर के विकारों को पहचानने और नियंत्रित करने का प्रयास करता है, तभी वास्तविक आत्मपरिवर्तन की दिशा बनती है।


जिज्ञासाओं का किया समाधान

प्रवचन के बाद संवादात्मक सत्र में श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं ने आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक विषयों से जुड़े प्रश्न रखे। मुनि श्री ने दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से इन जिज्ञासाओं का समाधान किया और आत्मचिंतन, संयम तथा आत्मशुद्धि की दिशा में मार्गदर्शन दिया। प्रवचन का केंद्रीय संदेश यह रहा कि जैन दर्शन में परमात्मा को किसी बाहरी शक्ति के रूप में देखने के बजाय आत्मा की पूर्ण और कर्ममुक्त अवस्था के रूप में समझा जाता है। सर्वज्ञता केवल ज्ञान की पराकाष्ठा नहीं, बल्कि वीतरागता और आत्मशुद्धि से जुड़ी परम अवस्था के रूप में प्रस्तुत की गई।



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