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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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पूजा बाहरी क्रियाकांड नहीं, आत्मशुद्धि का विज्ञान है: वीरसागर जी महाराज

लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
धन्ना राम चौधरी
29 सित॰
3 मिनट पठन
निर्यापक श्रमण श्री 108 वीरसागर जी महाराज पूजा और आत्मशुद्धि के आध्यात्मिक महत्व पर प्रवचन देते हुए

भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 29 सितंबर 2026। जैन धर्म में पूजा केवल बाहरी विधि-विधान पूरा करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा के अंतरंग को निर्मल करने और उसके वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ने का माध्यम है। निर्यापक श्रमण श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने ‘पूजा के विज्ञान को जाने’ विषय पर प्रवचन करते हुए कहा कि पूजा का वास्तविक उद्देश्य आत्मा पर अनादिकाल से पड़े कर्मों के आवरण को हटाकर आत्मिक गुणों की ओर बढ़ना है।

मुनिश्री ने कहा कि पूजा के दौरान अष्टद्रव्य अर्पित करना, अभिषेक करना अथवा तीर्थंकर प्रतिमा के समक्ष धार्मिक क्रियाएं करना बाहरी पक्ष है। इन क्रियाओं का महत्व तभी है, जब इनके माध्यम से व्यक्ति के अंतरंग परिणामों में विशुद्धि और जीवन-व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आए।


‘पूजा’ का वास्तविक अर्थ अंतरंग का मार्जन

वीरसागर जी महाराज ने पूजा के अर्थ को समझाते हुए कहा कि इसका संबंध पवित्रता, निर्मलता और गुणों के स्मरण से है। उन्होंने बर्तन में जमने वाली चिकनाई का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल बाहर से बर्तन चमकाने से उसकी अंदरूनी गंदगी दूर नहीं होती। इसी प्रकार मंदिर जाकर पूजा करने के बावजूद यदि मन में क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और द्वेष की परतें बनी रहें, तो पूजा के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।

उन्होंने कहा कि पूजा बाहरी स्वरूप को सजाने के बजाय अंतरंग को मांझने और आत्मिक शुद्धि की दिशा में बढ़ने का अभ्यास है।


अष्टद्रव्य और प्रतिमा हैं आत्मशुद्धि के आलंबन

मुनिश्री ने कहा कि जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप, फल और अर्घ्य सहित अष्टद्रव्य केवल अर्पण की वस्तुएं नहीं हैं। जैन परंपरा में इनका उपयोग आत्मचिंतन और शुभ-विशुद्ध भावों को जागृत करने के आलंबन के रूप में किया जाता है। इसी प्रकार जिनवाणी, मंत्र, गुरु और तीर्थंकरों की वीतरागी प्रतिमा साधक के चित्त को बाहरी विषयों से हटाकर आत्मचिंतन की ओर मोड़ने में निमित्त बनते हैं। उन्होंने कहा कि इन माध्यमों का उद्देश्य व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और आत्मिक विकास के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देना है।


अनंत चतुष्टय आत्मा की पूर्णता का प्रतीक

प्रवचन में तीर्थंकरों के स्वरूप की चर्चा करते हुए वीरसागर जी महाराज ने अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य यानी अनंत चतुष्टय का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार तीर्थंकरों ने अपनी साधना के माध्यम से आत्मा में निहित इन अनंत शक्तियों को पूर्ण रूप से प्रकट किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वीतराग भगवान किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति, सुख या सिद्धि का अंश प्रदान नहीं करते। पूजा का उद्देश्य भगवान से किसी भौतिक या व्यक्तिगत लाभ की मांग करना नहीं, बल्कि उनके वीतराग स्वरूप को आदर्श मानकर अपने भीतर आत्मिक गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ करना है।


बोरवेल का उदाहरण देकर समझाया आत्मशुद्धि का सिद्धांत

आत्मा में निहित शक्तियों को समझाने के लिए मुनिश्री ने बोरवेल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जमीन में बोरवेल करने पर पानी बनाया नहीं जाता, बल्कि मिट्टी, कंकड़ और पत्थरों की परतें हटाकर पहले से मौजूद जल तक पहुंच बनाई जाती है। इसी प्रकार जैन दर्शन के अनुसार आत्मा में ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य की अनंत क्षमता विद्यमान है। कर्मों के आवरण इन गुणों को ढकते हैं। पूजा, भक्ति, स्वाध्याय, तप, संयम और आत्मचिंतन का उद्देश्य कोई नई शक्ति पैदा करना नहीं, बल्कि आत्मा पर पड़े आवरणों को हटाने की दिशा में पुरुषार्थ करना है।


बाहरी पूजा के साथ भावों की शुद्धि जरूरी

वीरसागर जी महाराज ने कहा कि अनंत भवों से संचित राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों से मुक्ति के लिए निरंतर साधना और आत्मचिंतन आवश्यक है। केवल धार्मिक क्रियाओं की पुनरावृत्ति से आत्मशुद्धि स्वतः नहीं होती। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि पूजा तभी सार्थक मानी जा सकती है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के विचार, व्यवहार और आंतरिक भावों में दिखाई दे। धार्मिक अनुष्ठान को आत्मनिरीक्षण और परिणामों की विशुद्धि से जोड़ना आवश्यक है।


शांतिधारा में आत्मशुद्धि की भावना का आह्वान

मुनिश्री ने शांतिधारा और अभिषेक के दौरान श्रद्धालुओं को बाहरी क्रिया के साथ आंतरिक भावों पर ध्यान देने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि शांतिधारा के जल को भीतर के क्रोध और कषायों को शांत करने की भावना से जोड़ा जा सकता है। चंदन अर्पित करते समय शीतलता और समता तथा दीप प्रज्वलित करते समय आत्मज्ञान के प्रकाश की भावना जागृत की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पूजा की प्रत्येक सामग्री को उसके आध्यात्मिक उद्देश्य से जोड़ा जाता है, तब बाहरी अनुष्ठान आत्मचिंतन और अंतरंग साधना का माध्यम बन जाता है। समाचार प्रेषक: विपिन कुमार जैन, बेंगलुरु



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