top of page
भारतार्थ-logo

राजस्थान में एससी योजनाओं पर सियासत तेज: 23 प्रतिशत बजट सरेंडर पर घिरी सरकार, जूली बोले—हक पर डाका

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 20 मार्च
  • 2 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 23 मार्च

फाइल फोटो

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

जयपुर। राजस्थान में अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग की कल्याणकारी योजनाओं के बजट उपयोग को लेकर सियासत गरमा गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भजनलाल शर्मा सरकार पर दलित हितों की अनदेखी का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार की नीतियां “हक पर डाका” डालने जैसी हैं। उन्होंने दावा किया कि योजनाओं के लिए आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं किया गया।


जूली ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जब दलितों के लिए निर्धारित राशि का उपयोग ही नहीं हो पा रहा।


23 प्रतिशत बजट सरेंडर का आरोप

नेता प्रतिपक्ष के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में अनुसूचित जाति विभाग के लिए 10,309 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था। हालांकि, इसमें से करीब 2,345 करोड़ रुपये यानी लगभग 23 प्रतिशत राशि सरकार द्वारा सरेंडर कर दी गई। जूली ने इसे सरकार की “दलित विरोधी मानसिकता” का संकेत बताते हुए कहा कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग न करना सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।


‘बड़ी घोषणाएं, बाद में कटौती

जूली ने आरोप लगाया कि सरकार पहले बजट में बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है और राशि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, लेकिन संशोधित अनुमान में उसे करीब 30 प्रतिशत तक घटा दिया जाता है। उन्होंने इसे “दिखावे की राजनीति” करार देते हुए कहा कि इससे जनता को भ्रमित किया जाता है।


प्रशासनिक विफलता या इच्छाशक्ति की कमी?

विपक्ष का कहना है कि संशोधित बजट कम होने के बावजूद शेष राशि का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाता, जो प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है। जूली ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय के प्रति गंभीर होती, तो योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता।


लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा लाभ

विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन के कारण वास्तविक लाभार्थियों तक सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। इससे सामाजिक न्याय की अवधारणा प्रभावित हो रही है और दलित समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है।


दलित वोट बैंक पर सियासी नजर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में दलित वोट बैंक का प्रभाव काफी अहम है। ऐसे में यह मुद्दा आगामी राजनीतिक रणनीतियों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है।


सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार

हालांकि इस पूरे मामले पर राज्य सरकार की ओर से अभी तक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं और आने वाले दिनों में इसके और तूल पकड़ने के आसार हैं।


अनुसूचित जाति योजनाओं के बजट का उपयोग न होना अब केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। विपक्ष जहां इसे सरकार की विफलता बता रहा है, वहीं अब सबकी नजर सरकार की सफाई और आगामी कदमों पर टिकी है।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page