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यूपी कैबिनेट विस्तार में बड़ा सामाजिक संदेश: गैर यादव-OBC और गैर जाटव दलित समीकरण पर BJP का नया दांव

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • May 11
  • 4 min read
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भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

लखनऊ, 11 मई। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के मंत्रिमंडल विस्तार ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। भारतीय जनता पार्टी ने कैबिनेट विस्तार के जरिए स्पष्ट संकेत दिया है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उसका फोकस गैर यादव पिछड़ा वर्ग (OBC) और गैर जाटव अनुसूचित जाति (SC) वोट बैंक को फिर से मजबूत करने पर है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह कदम समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के पारंपरिक सामाजिक आधार को चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

रविवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल किए गए नए चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो भाजपा ने जातीय संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व दोनों पर विशेष ध्यान दिया है। नए मंत्रियों में जाट, गुर्जर, लोहार, लोध, पासी, वाल्मीकि और गड़ेरिया समुदाय के नेताओं को जगह देकर पार्टी ने साफ संकेत दिया कि वह गैर यादव OBC और गैर जाटव दलित वर्गों को अपने साथ जोड़े रखना चाहती है।

कैबिनेट विस्तार में छुपा बड़ा राजनीतिक संदेश

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2014 से भाजपा जिस सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल पर काम कर रही थी, उसे 2024 लोकसभा चुनाव में झटका लगा। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए गैर यादव OBC और गैर जाटव दलित वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की, जिसका असर कई सीटों पर दिखाई दिया।

इसी के साथ विपक्ष द्वारा चलाए गए ‘संविधान खतरे में है’ अभियान ने भी अनुसूचित जाति वर्ग के एक हिस्से को भाजपा से दूर किया। इसका असर 2024 लोकसभा चुनाव में देखने को मिला, जब भाजपा उत्तर प्रदेश की आरक्षित सीटों पर अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर सकी।

SC-OBC समीकरण क्यों अहम?

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य माना जाता है और यहां अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21 प्रतिशत है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि 90 से अधिक सीटों पर दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि अनुसूचित जाति वोटों में जाटव समुदाय का बड़ा हिस्सा लंबे समय से Mayawati और बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़ा रहा है। ऐसे में भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर जाटव दलित समुदायों—जैसे पासी, वाल्मीकि, खटीक, कोरी, गोंड और गड़ेरिया—को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई।

इसी रणनीति के तहत भाजपा ने कई नेताओं को संगठन और सरकार में जगह दी। पूर्व राष्ट्रपति Ram Nath Kovind को सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचाना और विभिन्न दलित समुदायों के नेताओं को मंत्री पद देना इसी सामाजिक समीकरण का हिस्सा माना गया।

2014 से 2022 तक भाजपा को मिला लाभ

राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार भाजपा को 2014, 2017, 2019 और 2022 के चुनावों में गैर जाटव दलित वोटों का बड़ा समर्थन मिला। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आरक्षित सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया और 84 में से 70 से अधिक सीटें जीत लीं।

2022 विधानसभा चुनाव में भी बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होने का सीधा फायदा भाजपा को मिला। बसपा जहां केवल एक सीट पर सिमट गई, वहीं भाजपा ने 63 आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की।

2024 चुनाव ने बदले समीकरण

2024 लोकसभा चुनाव में तस्वीर कुछ अलग नजर आई। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने दलित और पिछड़े वर्गों को लेकर आक्रामक रणनीति अपनाई। फैजाबाद सीट पर पासी समुदाय से आने वाले अवधेश प्रसाद की जीत ने राजनीतिक हलकों में बड़ा संदेश दिया।

इसके अलावा पासी, सरोज, कोरी और अन्य गैर जाटव समुदायों के उम्मीदवारों की जीत ने यह संकेत दिया कि भाजपा का सामाजिक आधार चुनौती का सामना कर रहा है।

कैबिनेट विस्तार में किन चेहरों को मिला मौका?

हालिया विस्तार में भाजपा ने जिन नेताओं को शामिल किया, उनमें अधिकांश गैर यादव OBC और गैर जाटव दलित समुदायों से आते हैं। इनमें भूपेंद्र चौधरी (जाट), सोमेंद्र तोमर (गुर्जर), हंसराज विश्वकर्मा (लोहार), कैलाश राजपूत (लोध), कृष्णा पासवान (पासी), सुरेंद्र दिलेर (वाल्मीकि) और अजीत पाल (गड़ेरिया) प्रमुख हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी सामाजिक प्रतिनिधित्व के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना चाहती है।

चंद्रशेखर का उभार भी बना चुनौती

इधर Chandrashekhar Azad का उभार भी उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नए समीकरण बना रहा है। नगीना लोकसभा सीट पर उनकी जीत ने यह संकेत दिया कि युवा दलित मतदाताओं का एक वर्ग नए विकल्प की तलाश में है।

विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आजाद को बहुजन राजनीति के नए चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। इससे भाजपा, सपा और बसपा तीनों दलों की रणनीतियों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

FAQs

1. भाजपा ने गैर यादव OBC और गैर जाटव SC पर फोकस क्यों बढ़ाया है?

क्योंकि 2024 चुनाव में इन वर्गों के वोटों में बदलाव देखने को मिला, जिससे भाजपा को नुकसान हुआ।

2. PDA राजनीति क्या है?

समाजवादी पार्टी द्वारा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की रणनीति को PDA कहा जाता है।

3. गैर जाटव दलित वोट इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में गैर जाटव दलित मतदाता हैं, जो चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं।

4. चंद्रशेखर आजाद का उभार क्यों चर्चा में है?

नगीना सीट से जीत के बाद उन्हें दलित युवाओं के बीच नए नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है।

5. क्या यह कैबिनेट विस्तार 2027 चुनाव की तैयारी माना जा रहा है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विस्तार सामाजिक संतुलन और चुनावी रणनीति दोनों को ध्यान में रखकर किया गया है।

निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। मौजूदा कैबिनेट विस्तार से भाजपा ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह 2027 चुनाव से पहले सामाजिक संतुलन को मजबूत करने में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। वहीं समाजवादी पार्टी PDA राजनीति के जरिए नई सामाजिक एकजुटता बनाने में जुटी है, जबकि बसपा अपने पारंपरिक आधार को बचाने की चुनौती से जूझ रही है। आने वाले महीनों में यह सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष और तेज होने की संभावना है।

Source: उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार से जुड़ी सार्वजनिक राजनीतिक जानकारी, चुनावी आंकड़े, राजनीतिक विश्लेषण एवं सार्वजनिक रिपोर्ट्स।

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