top of page
भारतार्थ-logo

महिला आरक्षण बिल पर सरकार को झटका, लेकिन चुनावी सियासत में बढ़त की कोशिश

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 18 अप्रैल
  • 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़ा अहम संवैधानिक विधेयक शुक्रवार को पारित नहीं हो सका। दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता वाले इस बिल को 298 वोटों का समर्थन मिला, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। नतीजतन, विधेयक गिर गया और केंद्र की मोदी सरकार को पिछले एक दशक में पहली बार किसी संवैधानिक संशोधन पर संसद में हार का सामना करना पड़ा। यह विधेयक वर्ष 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लागू करने की प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से लाया गया था। इस कानून के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन इसकी प्रभावी क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन (डिलिमिटेशन) के बाद ही संभव है। सरकार ने 2026 में तीन नए प्रस्तावों के जरिए इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया था।


सरकार के प्रस्ताव में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने, 2011 की जनगणना के आधार पर डिलिमिटेशन कराने और आरक्षण को तत्काल लागू करने की बात शामिल थी। हालांकि, विपक्ष ने इन प्रस्तावों को राजनीतिक रणनीति बताते हुए एकजुट होकर विरोध किया। मतदान से पहले हुई विपक्षी दलों की बैठक में विधेयक के खिलाफ मतदान का निर्णय लिया गया, जिसका सीधा असर सदन की कार्यवाही में देखने को मिला। विधेयक के गिरने के बाद सियासी माहौल और गरमा गया है। केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ एनडीए ने विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे “महिला सशक्तिकरण के खिलाफ कदम” बताया और कहा कि विपक्ष ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही सरकार विधेयक पारित कराने में असफल रही हो, लेकिन इस मुद्दे को वह आगामी चुनावों में अपने पक्ष में भुना सकती है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दल विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ बताकर आक्रामक प्रचार अभियान चला सकते हैं।


सूत्रों के मुताबिक, एनडीए ने इस मुद्दे को लेकर विपक्ष के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की भी योजना बनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पहले ही संकेत दे चुके हैं कि महिला आरक्षण का विरोध करने वालों को राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

दरअसल, महिला मतदाताओं को साधना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। उज्ज्वला योजना, मातृत्व लाभ योजनाओं और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों के जरिए पार्टी लगातार इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। ऐसे में महिला आरक्षण विधेयक, भले ही अभी पारित न हो सका हो, लेकिन राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना रहेगा। संवैधानिक संशोधन विधेयकों के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा संख्याबल को देखते हुए सरकार को कुछ क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय सांसदों से समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन विपक्ष की एकजुटता ने उसके इस गणित को बिगाड़ दिया। आने वाले समय में यह मुद्दा न सिर्फ संसद बल्कि सियासी मंचों पर भी प्रमुखता से उभरने की संभावना है, जहां सत्ता और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने तरीके से जनता के बीच प्रस्तुत करेंगे।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page