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महिला आरक्षण पर नई सियासी जंग

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 16 अप्रैल
  • 3 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र से पहले महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्र सरकार जहां 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन लाने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए भी इसके साथ जोड़ी गई परिसीमन की शर्त पर कड़ा विरोध जताया है। इस मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी टकराव की स्थिति बन गई है।


दरअसल, तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान सरकार 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को प्रभावी बनाने के लिए संशोधन प्रस्ताव लाने जा रही है। इस संशोधन के तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण को महिला आरक्षण के साथ जोड़ा गया है, जिसे विपक्षी दल लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरा बता रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना अनावश्यक और संदिग्ध है। कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, सपा समेत 20 से अधिक दलों ने साफ किया है कि वे महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन सीटों के पुनर्विन्यास के जरिए राजनीतिक लाभ लेने की किसी भी कोशिश का विरोध करेंगे। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक में इसे लेकर साझा रणनीति बनाई गई और संसद में जोरदार विरोध के संकेत दिए गए हैं। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों की ‘गैरिमैंडरिंग’ कर सत्ता हासिल करना है। उन्होंने कहा कि भाजपा परिसीमन आयोग के जरिए अपने पक्ष में सीमांकन करना चाहती है, जिससे विपक्षी क्षेत्रों और समुदायों का प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि असम और जम्मू-कश्मीर में पहले भी सीमांकन प्रक्रिया को राजनीतिक लाभ के लिए प्रभावित किया गया।


विपक्ष की एक बड़ी चिंता यह भी है कि प्रस्तावित बदलावों से हिंदी पट्टी के राज्यों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ सकता है। उनका दावा है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, जबकि दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है। इससे संसद में क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ने और दक्षिण भारत की आवाज कमजोर होने का खतरा जताया जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी है कि यदि दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय हुआ तो व्यापक विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। उनका कहना है कि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को ‘जनसांख्यिकीय दंड’ नहीं मिलना चाहिए। वहीं, केंद्र सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सीटों का पुनर्निर्धारण पूरी तरह पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होगा। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, राज्यों के बीच सीटों का अनुपात यथावत रखा जाएगा और केवल जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय होंगी। संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में प्रस्तावित संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाएगा।


सरकार का यह भी तर्क है कि जातीय जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया को देखते हुए महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन में चार साल तक का समय लग सकता है, जिससे आरक्षण लागू करने में अनावश्यक देरी होगी। इधर, विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को चुनावी रणनीति से जोड़ते हुए आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। विपक्षी दल इसे महिला मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश और ‘राजनीतिक तुष्टिकरण’ करार दे रहे हैं। संसद के विशेष सत्र में इस विधेयक को लेकर तीखी बहस और हंगामे के आसार हैं। महिला आरक्षण जैसे व्यापक सहमति वाले मुद्दे पर भी अब राजनीतिक खींचतान ने नई बहस छेड़ दी है, जिसमें लोकतांत्रिक संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और चुनावी निष्पक्षता जैसे बड़े सवाल केंद्र में आ गए हैं।

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