बिहार में बीजेपी की नई परीक्षा
- धन्ना राम चौधरी

- 16 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
पटना। बिहार की राजनीति में एक अहम मोड़ तब आया जब भारतीय जनता पार्टी को आखिरकार मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई और सम्राट चौधरी राज्य की कमान संभालते नजर आए। यह उपलब्धि बीजेपी के लिए ऐतिहासिक जरूर है, लेकिन इसके साथ ही चुनौतियों का एक जटिल दौर भी शुरू हो गया है। सत्ता तक पहुँचने का लंबा इंतजार अब शासन की कठिन कसौटी में बदल चुका है।
करीब तीन दशक पहले अक्टूबर 1990 में लालू प्रसाद यादव द्वारा लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ जो राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ था, उसका एक अध्याय अब जाकर पूरा हुआ है। लेकिन इस सफलता के बावजूद बीजेपी को गठबंधन की मजबूरियों और सामाजिक समीकरणों के जाल में संतुलन साधना होगा।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पार्टी गठबंधन में ‘बड़ी साझीदार’ होते हुए भी पूर्ण बहुमत से दूर है। जेडीयू के साथ सीटों का अंतर बेहद कम है, जिससे सत्ता संचालन में संतुलन और समझदारी अनिवार्य हो जाती है। वहीं, सम्राट चौधरी का राजनीतिक अतीत और गैर-संघ पृष्ठभूमि भी उन्हें लगातार जांच के दायरे में रखेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चौधरी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने की है। नीतीश कुमार का लंबा और प्रभावशाली कार्यकाल एक मजबूत तुलना का आधार बन चुका है। ऐसे में हर नीति, हर निर्णय और हर प्रशासनिक कदम पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल में सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी। ‘महादलित’ और ‘अति पिछड़ा’ जैसी श्रेणियों का निर्माण कर उन्होंने समाज के उन वर्गों को राजनीतिक पहचान दी, जो लंबे समय तक हाशिए पर थे। पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण देकर उन्होंने इन समुदायों को सत्ता के निचले स्तर तक भागीदारी दी, जिससे जमीनी स्तर पर एक मजबूत राजनीतिक ढांचा तैयार हुआ। इसके साथ ही महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई योजनाएं—जैसे छात्राओं को साइकिल और ड्रेस वितरण—ने सामाजिक बदलाव के साथ-साथ राजनीतिक समर्थन भी सुनिश्चित किया। अब सम्राट चौधरी के सामने चुनौती यह होगी कि वे इन योजनाओं की निरंतरता बनाए रखते हुए अपने नेतृत्व की छाप छोड़ें।
सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी स्थिति आसान नहीं है। चौधरी को अपने ही समुदाय—कोइरी (कुशवाहा)—के बीच मजबूत पकड़ बनानी होगी, जो बिहार की राजनीति में अहम पिछड़ा वर्ग माना जाता है। यादव और कुर्मी के बाद यह वर्ग चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाता है। वहीं, कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी उतना ही संवेदनशील है। एनडीए लगातार ‘जंगल राज’ के खिलाफ अपनी छवि को मजबूत करता रहा है, ऐसे में किसी भी तरह की ढिलाई विपक्ष को हमला करने का मौका दे सकती है।
शराबबंदी जैसे मुद्दे पर भी सरकार को बेहद संतुलित रुख अपनाना होगा। यह नीति भले विवादित रही हो, लेकिन महिलाओं के बीच इसका व्यापक समर्थन बना हुआ है। ऐसे में किसी भी बदलाव का राजनीतिक असर दूरगामी हो सकता है। हालांकि, ‘डबल इंजन’ सरकार का फायदा बीजेपी को जरूर मिलेगा, जिससे केंद्र और राज्य के बीच समन्वय बेहतर रहेगा और विकास योजनाओं को गति मिल सकती है। कुल मिलाकर, बिहार में सत्ता की यह नई पारी बीजेपी के लिए अवसर के साथ-साथ अग्निपरीक्षा भी है—जहां सामाजिक संतुलन, गठबंधन प्रबंधन और प्रशासनिक दक्षता ही उसकी सफलता तय करेंगे।
_edited.jpg)



टिप्पणियां