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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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महा कंजूस लाला घनश्यामदास की कहानी

लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
Ashok kumar Singh
6 दिन पहले
3 मिनट पठन
पगड़ीधारी बुज़ुर्ग मुस्कराते हुए पैसों की थैली पकड़े; सामने सिक्के और नोट, पीछे खुला तिजोरीघर

भारतार्थ खबर (Bhaarataarth.com महा कंजूस लाला घनश्यामदास की कहानी

एक गाँव में लाला घनश्यामदास नाम का एक आदमी रहता था। वह इतना बड़ा कंजूस था कि लोग उसके नाम से कम और उसकी कंजूसी के किस्सों से ज्यादा उसे जानते थे। लाला के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी। घर में सोने-चाँदी के गहने, तिजोरी में नोटों की गड्डियाँ और जमीन-जायदाद भी खूब थी। लेकिन मजाल है कि वह अपनी जेब से एक रुपया भी खर्च कर दे!


कंजूसी की हद


एक दिन लाला बाजार जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। उसने एक दुकानदार से पानी माँगा। दुकानदार बोला, “लालाजी, पानी का गिलास दो रुपये का है।” लाला तुरंत पीछे हट गया और बोला, “दो रुपये का पानी! अरे, इतनी महँगी प्यास तो मैंने आज तक नहीं देखी!” वह प्यासा ही आगे चल पड़ा। थोड़ी दूर पर एक मंदिर था। वहाँ नल से पानी बह रहा था। लाला ने खूब पानी पिया और जाते-जाते नल भी बंद कर दिया। फिर खुद से बोला, “वाह घनश्याम! आज दो रुपये बच गए!” लेकिन उसे क्या पता था कि आगे उसकी कंजूसी का सबसे बड़ा इम्तिहान इंतजार कर रहा है।


जब घर में लगी आग


एक रात लाला के घर में अचानक आग लग गई। नौकर चिल्लाया, “मालिक! आग लग गई! जल्दी बाहर चलिए!” लाला घबराकर उठा, लेकिन बाहर भागने के बजाय तिजोरी की तरफ दौड़ा। नौकर चिल्लाया, “मालिक, जान बचाइए! तिजोरी बाद में ले लीजिए!” लाला बोला, “पागल हो गया है क्या? तिजोरी में मेरी जिंदगी भर की कमाई है!” वह नोटों की गड्डियाँ समेटने लगा। तभी उसकी धोती एक कील में फँस गई। नौकर ने उसे खींचकर बाहर निकाला। किसी तरह दोनों जान बचाकर घर से बाहर आ गए। लाला ने देखा कि उसका एक जूता आग में जल गया था। वह सिर पकड़कर बैठ गया और रोने लगा। नौकर ने पूछा, “मालिक, आप तो बच गए! फिर रो क्यों रहे हैं?” लाला छाती पीटकर बोला, “अरे मूर्ख! वह जूता नया था! पूरे तीन सौ रुपये का!”

नौकर ने माथा पकड़ लिया।

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कंजूस का आखिरी दाँव


अगली सुबह लाला ने सोचा कि अब वह घर की मरम्मत पर एक पैसा भी खर्च नहीं करेगा। वह गाँव के मिस्त्री के पास गया और बोला, “भाई, मेरे घर की छत ठीक कर दो। पैसे बाद में दूँगा।” मिस्त्री बोला, “लालाजी, पहले पैसे दीजिए।” लाला ने कहा, “अच्छा, पैसे नहीं दूँगा। लेकिन तुम्हें आशीर्वाद जरूर दूँगा!” मिस्त्री हँसकर बोला, “लालाजी, आशीर्वाद से मेरा चूल्हा नहीं जलेगा!” लाला नाराज होकर लौट आया। कुछ दिन बाद बारिश हुई। छत से पानी टपकने लगा। लाला ने पानी रोकने के लिए घर में बाल्टियाँ रख दीं। फिर बाल्टियाँ भर गईं तो उसने बर्तन रख दिए। आखिरकार उसका बिस्तर भी भीग गया। वह रात भर बैठा रहा और सुबह चिल्लाया—

“हाय रे किस्मत! अगर मैं समय पर छत ठीक करा देता, तो आज चैन से सो रहा होता!” नौकर ने मुस्कुराकर कहा, “मालिक, आपने पैसे तो खूब बचाए, लेकिन अपनी नींद, आराम और सुकून सब गँवा दिया!” लाला पहली बार चुप हो गया।


कहानी की सीख


पैसा बचाना अच्छी आदत है, लेकिन जरूरत के समय पैसा खर्च न करना मूर्खता है। धन इंसान के सुख और सुरक्षा के लिए है, इंसान धन का गुलाम बनने के लिए नहीं। और हाँ, गाँव में आज भी जब कोई जरूरत से ज्यादा कंजूसी करता है, तो लोग हँसकर कहते हैं “संभलकर भाई! कहीं तुम भी गाँव के लाला घनश्यामदास न बन जाना!”


लेखक: अशोक कुमार सिंह

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