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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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मेरी दृष्टि में - "काव्य विवेक और निबंध लालित्य"

लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
Ashok kumar Singh
30 सित॰
4 मिनट पठन
काव्य विवेक और निबंध साहित्य किताब का कवर, साथ में सुनहरी पेन; नीचे डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय लिखा है।

साहित्य सदैव समाज को बिखरने से बचाता है। जो समाज में बिखराव उत्पन्न करें वह 'साहित्य' कदापि नहीं हो सकता। साहित्य का शाब्दिक अर्थ है "जिसमें सबका हित हो"।'सबका' से सिर्फ मानव मात्र ही नहीं अपितु जो संपूर्ण ब्रह्मांड के हित की बात करें वही साहित्य है। साहित्य के मूल रूप से तीन उद्देश्य हैं,लोकमंगल,लोकरक्षण व लोकरंजन। इन्हीं उद्देश्यों से अनुप्राणित 'साहित्य' ही 'लोक' के साथ अनंत काल तक यात्रा करता है।


"काव्य विवेक और निबंध लालित्य" साहित्यकार डॉ० जितेंद्र पांडेय जी की बीस समीक्षाओं व अट्ठारह निबंधों से संकलित एक विशिष्ट पुस्तक है। पुस्तक का विस्तार कबीर दास से लेकर समकालीन कवियों तक फैला है। डॉ० जितेंद्र पांडेय जी का विचार मंथन चयनित कवियों व उनकी कविताओं तथा उनके काव्य धर्म पर केंद्रित है। जिस प्रकार धरती पर विचरण करने वाला व्यक्ति भूगर्भ में छिपे खनिजों व जल स्रोतों से अनभिज्ञ होता है किंतु जब आधुनिक कैमरे की आँखों से देखता है तो भूगर्भ में छिपी सारी वस्तुए दृश्यमान हो उठती हैं। ठीक उसी प्रकार डॉ० जितेंद्र पांडेय जी ने चयनित कवियों तथा उनके काव्य धर्म व उनकी कविताओं की व्यापकता को गहराई से निरूपित किया है। जिसे पढ़कर पाठक गण कवियों के चिंतन व कविता की व्यापकता के केंद्र तक पहुंच सकते हैं। इस पुस्तक में साहित्यकार डॉ० जितेंद्र पांडेय जी ने प्रथम शीर्षक के रूप में कबीर दास को चुना है और शीर्षक का नाम दिया "कबीर का स्वाधीन विवेक"


यह सर्वविदित है कि कबीर दास जी निर्गुण भक्ति शाखा के क्रांतिकारी कवि थे। उन्होंने जाति-पाति, भेद-भाव, धार्मिक-कट्टरता, अंधविश्वास, आडंबर व पाखंड पर अपनी बेबाक लेखनी चलाई है। उनका आत्मविश्वास व लेखन कभी पराधीन नहीं रहा। कबीर दास जी ने अपने स्वतंत्र विवेक से समाज में फैली कुरीतियों पर कुठाराघात किया है। डॉ० जितेंद्र पांडेय जी ने कबीर के तमाम दोहों व अपने तर्कों द्वारा इस बात की पुष्ट करते हैं कि कबीर दास का स्वाधीन विवेक कितना प्रबल और क्रांतिकारी था। इसी क्रम में डॉ० जितेंद्र पांडेय जी ने गोस्वामी तुलसीदास पर एक पुष्ट समीक्षा "तुलसीदास एक युग प्रवर्तक" शीर्षक से प्रस्तुत किया है। समीक्षा पढ़ने पर हम तुलसीदास को एक युग परिवर्तक के रूप में स्वीकार करने पर विवश हो जाते हैं। तीसरे अध्याय में विश्व विख्यात महाकाव्य रामचरितमानस पर "मानस का राजधर्म" शीर्षक से डॉ० जितेंद्र जी ने जोरदार लेखनी चलाई है। मानस की अनेकों चौपाइयों व दोहों की व्यापक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए मानस के राजधर्म को निरूपित किया है। जो हमें ज्ञान के साथ-साथ आनन्दानुभूति प्रदान करता है।


"सतसई की मूल प्रवृत्ति" डॉ० जितेंद्र पांडेय जी की चौथी समीक्षा है। शृंगार रस के शीर्ष कवि बिहारी लाल द्वारा रचित पुस्तक बिहारी सतसई को खंगाल कर बिहारी सतसई की जड़ तक पहुंचने का सुंदर प्रयास ही नहीं किया है अपितु पहुँचा भी है। इसी शृंखला में लेखक ने "प्रेम की पीर के कवि घनानंद" पर अपनी बेबाक लेखनी चलाई है। इसमें उन्होंने घनानंद की अड़तीस प्रकाशित पुस्तकों का जिक्र व अनेक छंदों का व्यापक विशेषण किया है। जो लेखक की विद्वता का प्रमाण है। अगले अध्याय में "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की बहुआयामी कविता" शीर्षक में विभिन्न कविताओं को व्याख्याित किया है। तदोपरांत अगले अध्याय में "सर्वोत्कृष्ट गीत काव्य है- सरोज स्मृति" नामक शीर्षक में लेखक ने अपनी समीक्षात्मक प्रतिभा का व्यापक नमूना प्रस्तुत किया है।


इसी प्रकार डॉ जितेन्द्र पांडेय जी ने-


"राष्ट्रीय चेतना के ओजस्वी गायक- रामधारी सिंह दिनकर"

"कविता का व्यक्ति स्वातंत्र्य-अज्ञेय"

"जनमानस की कविता-नागार्जुन"

"बहुस्याम में निरूपित होती कविताएं"

"बेकसूर आदमी का हालफनामा- धूमिल"

"बेहतर दुनिया की चिंता के कवि -विश्वनाथ प्रसाद तिवारी"

"कविता में जीवन-विश्वनाथ प्रसाद तिवारी"

"नेति-नेति का विराट दर्शन है -फिर भी कुछ रह जाएगा"

"संशयात्मा में निरूपित सभ्यता का की श्यामलता"

"शोभनाथ यादव की कविता में सौंदर्य और संघर्ष का नया प्रयोग"

"आवाँ विमर्श- एक विश्लेषण"

"बवंडर में व्यक्त आक्रोश- श्री भगवान तिवारी" व "कविता के सरोकार"

जैसे शीर्षकों की समीक्षाएं प्रस्तुत की है जो पुस्तक को विशिष्ठ बनाती है। अगले खंड में ललित निबंधों का विशाल संकलन है। निबंध गद्य साहित्य की एक उत्कृष्ट विधा है। इसमें लेखक किसी विशेष विषय पर अपना व्यापक विचार प्रस्तुत करता है। निबंध के कई प्रकार होते हैं जैसे-वर्णनात्मक निबंध, विवरणात्मक निबंध, तार्किक निबंध, आलोचनात्मक निबंध व ललित निबंध। इस पुस्तक के "निबंध खंड" में डॉ० जितेंद्र पांडेय जी ने अपने अट्ठारह ललित निबंधों को शामिल किया है। 'ललित निबंध' का मूल उद्देश्य पाठक को ज्ञान के साथ-साथ आनंद तथा उपयुक्त विषय पर चिंतन करने के लिए प्रेरणा प्रदान करना होता है। पुस्तक के सभी निबंधों के शीर्षक नवीनता को धारण किए हुए हैं। कई निबंध हमें समाज, साहित्य, अध्यात्म, शिक्षा, देश, सदी, स्वतंत्रता, यज्ञ, वेद, खेल व कृषि से जोड़ते हैं, तो कई निबंध हमें चिंतन करने पर विवश कर देते हैं। जिसमें "क्रोध पाप का मूल,"मौत पर फतह,"भारत- कल और आज,"आतंकवाद-जिम्मेदार कौन,"अराजकता की देन है आतंकवाद,"चरमराती शहरी सुविधाएं" हैं


पुस्तक के अंत में दो निबंध "संगीतकार- रविंद्र जैन" व "अन्ना हजारे का जन आंदोलन" शीर्षक में भारत के दो महानायकों का व्यापक उल्लेख किया गया है। कुल मिलाकर डॉ० जितेंद्र पांडेय जी द्वारा लिखी गई समीक्षाओं व निबंधों से सुसज्जित "काव्य विवेक और निबंध ललित" पुस्तक विशिष्ट है। इस पुस्तक में शोधार्थियों के लिए व्यापक सामग्री विद्यमान है, तथा सामान्य पाठकों को आनंद व ज्ञान के झर-झर झर रहे जलप्रपातों में स्नान करने जैसा है।

लालबहादुर चौरसिया 'लाल'

महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन

अकादमी आजमगढ़ इकाई

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