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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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मेरी दृष्टि में "अटपट वाणी" पुस्तक

लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
Ashok kumar Singh
8 अक्टू॰
5 मिनट पठन
पुस्तक कवर अटपट वाणी (कुंडलियां) — माइक पर बोलते बुज़ुर्ग और हँसते लोग, लाल-सफेद पृष्ठभूमि पर

लालबहादुर चौरसिया लाल कुंडलियां छंद मात्रिक छंद की एक संपूर्ण कविता है। यह छंद दोहा एवं रोला के संयोग से बनता है। इसमें कुल छः चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम दो पंक्तियाँ दोहे की होती हैं, बाकी चार पंक्तियाँ रोला छंद की होती हैं। इस छंद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचना जिस शब्द से शुरू होती है, उसी शब्द से उसका अंत होता है। प्राचीन काव्य-जगत में कुंडलिया छंद लिखने की परम्परा सर्वाधिक थी। मात्र छः पंक्तियों में रचनाकार अपनी किसी बात को आसानी से कहने में सक्षम होता है। कुंडलिया छंद की एक कुंडली अपने आप में एक सम्पूर्ण कविता होती है।


इसी कुंडलिया छंद की प्राचीन लेखन परम्परा को आज भी अनेक रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवंत बनाए हुए हैं। उन्हीं रचनाकारों में आजमगढ़ जनपद के हास्य-व्यंग्य के ख्यातिलब्ध रचनाकार हैं श्री शैलेंद्र मोहन राय 'अटपट'। भारतीय थल सेना से सेवा-मुक्त श्री शैलेंद्र मोहन राय 'अटपट' अपनी सशक्त लेखनी से यहाँ के जनमानस में अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं। छासठ वर्षीय श्री अटपट जी जब अपनी कुंडलियों का वाचन किसी कवि सम्मेलन के मंच से करते हैं तो उपस्थित श्रोता झूम उठते हैं। लोग स्वतः तालियाँ बजाने पर विवश हो जाते हैं। उनकी व्यंग्यात्मक शैली में पिरोई गई रचनाएँ सभी श्रोताओं का ध्यान निश्चित रूप से आकर्षित करती हैं।


पिछले वर्ष 5 अक्टूबर 2025 को श्री अटपट जी द्वारा रचित पुस्तक "अटपट वाणी" - कुंडलियों का संग्रह का लोकार्पण हुआ। यह "अटपट वाणी" पुस्तक श्री अटपट जी की प्रथम पुस्तक है। इस पुस्तक में कुल 200 कुंडलियों का संग्रह है। यह पुस्तक मुंबई के प्रतिष्ठित प्रकाशन 'आर पब्लिकेशन' द्वारा प्रकाशित है। इस पुस्तक की भूमिका हिंदी साहित्य अकादमी से सम्मानित देश के जाने-माने साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी द्वारा लिखी गई है। श्री अटपट एक संवेदनशील रचनाकार हैं। उन्होंने इस पुस्तक में कुंडलियों के माध्यम से अपनी सशक्त लेखनी का शानदार परिचय दिया है। भाषा की तरलता पाठक को आसानी से समझ में आ जाती है।



हास्य-व्यंग्य के चुटीले अंदाज में कवि ने समाज का जो खाका खींचा है, निश्चित रूप से यह एक श्रमसाध्य कार्य है। कुंडलियों में हास्य है, मार्मिकता है, वीरता है, श्रृंगार है तथा संवेदनशीलता के साथ-साथ समाज के बिगड़े रूप का भी यथार्थ चित्रण है। पुस्तक में जीवन के विविध रंग दिखाई देते हैं। शैलेंद्र मोहन राय 'अटपट' जी सच को सच कहने में गुरेज नहीं करते, न तो शासन-सत्ता का डर, न ही लोगों का खौफ दिखता है उनकी लेखनी में। सदैव अपनी व्यंग्यात्मक शैली में सब कुछ कह जाते हैं। उनकी एक ऐसी ही कुंडली देखें-


ज्ञानी जन यदि चाहते बचा रहे सम्मान।

बिन मांगे मत दीजिए आप किसी को ज्ञान।

आप किसी को ज्ञान न बाटे रखे सुरक्षित।

इच्छुक जो जन होंय कीजिए उनको दिक्षित।

कह अटपट कविराय उतरवाते निज पानी ।

सौ सौ जूता खाय मानते खुद को ज्ञानी।।


शेयर मार्केट में गिरावट देश की अर्थव्यवस्था को कितना प्रभावित करती है, यह किसी से छिपा नहीं है। जब भारत के आर्थिक तंत्र पर श्री अटपट जी की निगाह पड़ती है तो वे अपने दारुण शब्दों में बोल उठते हैं-


शेयर गिरता जा रहा निफ़्टी हुआ धड़ाम ।

हलचल है बाजार में बुल का काम तमाम ।

बुल का काम तमाम रुपैया जाय लुढ़कता।

सेंसेक्स है बेहाल तेल दीये का चुकता।

कह अटपट कविराय ब्रेक फेल संग गेयर।

पहुंच रसातल गया बना बेचारा शेयर।।


आज स्त्रियाँ आकाश की ऊँचाइयाँ नाप रही हैं। सागर की गहराइयाँ नाप रही हैं। हर क्षेत्र में स्त्रियों की शानदार भागीदारी से कवि-मन आह्लादित है। सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष उड़ान और सकुशल वापसी से कवि की प्रसन्न लेखनी कागज पर कुछ इस तरह से दौड़ने लगती है-


धरती का सुख छोड़ कर करके इंदु प्रवास।

सुनीता विलियम ने रचा एक नया इतिहास।

एक नया इतिहास प्रशंसित जग में नारी ।

अंतरिक्ष की परी प्रमाणित महिमा न्यारी।

कह अटपट कविराय रही आंखों में फिरती।

जीवित तुमको देख, खुशी से झूमी धरती।।


अंग-प्रदर्शन से विकृत संस्कृति और बिगड़ा समाज हमें किस गर्त में ले जा रहा है, इस पर भी श्री अटपट जी नजर रखे हुए हैं और एक साहित्यकार का धर्म होता है कि अपने समाज को दलदल से बचने का भरपूर प्रयास करे। ऐसे समय में जब नई पीढ़ी जल्दी से वायरल होने की लफ्फाजी, रीलबाजी और नंगेपन को अपने जीवन में उतारने पर तुली है तो कवि-मन आहत होता है। तब श्री अटपट जी लिखते हैं-


नंगापन है चरम पर बिगड़ा जाय समाज।

प्रचलन में लघु वस्त्र है, नहीं शेष है लाज।

नहीं शेष है लाज ,रील की लगी बीमारी।

खुले आम कर रही, अंग प्रदर्शन नारी।

कह अटपट कविराय, विचरती छूरी छप्पन ।

रही संस्कृत डुबय, बढ़ रहा है नंगापन।।


वनों की अंधाधुंध कटाई से हमारे जीवन पर पड़ने वाले दुष्परिणामों की तरफ कवि श्री अटपट ध्यान आकर्षित करते हैं। हमारी प्राण-वायु आज संकट में है। पर्यावरण का संकट विकट है । पर्यावरण रूपी रक्षक हमें निगलने को आतुर है। इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं। कवि की नजर जब वहाँ पड़ती है तो वे पीड़ित होते हैं, पीड़ा के साथ-साथ उपाय भी सुझाते हैं। अधिक से अधिक पेड़ लगाने पर ही हमारा मंगल होगा, न कि पेड़ काटने पर। देखें एक कुंडली -


जंगल काटे जा रहे, मंगल कैसे होय,

बढ़ा प्रदूषण धरा पर रहा आदमी रोय,

रहा आदमी रोय, हुए बेघर पशु पक्षी,

धन पा करके मस्त ,मले सुरती आरक्षि,

कह अटपट कविराय, चाहते अगर सुमंगल,

नए लगाओ पेड़, नहीं अब काटो जंगल।।


साहित्य में राजनीति का हस्तक्षेप कितना खतरनाक है, साहित्य में गुटबाजी, गोलबंदी एवं आत्ममुग्धता पर श्री अटपट जी लिखते हैं-


थूको चाटो का चलन दिखता है चहुंओर,

राजनीति साहित्य में है प्रकोप पुरजोर,

है प्रकोप पुरजोर पतित बिन पेनी लोटा ,

सबको पीछे छोड़, चल रहा सिक्का खोटा ,

कह अटपट कविराय, पार्थ मलाई काटो,

सकल प्रयोजन सिद्ध, साधना थूको चाटो।


पति-पत्नी के खट्टे-मीठे नोक-झोंक को श्री अटपट जी ने अपनी इस पुस्तक में बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। हालाँकि आपने यह पुस्तक अपनी पत्नी को ही समर्पित की है, किंतु इन्होंने पति-पत्नी के आपसी संवाद को बड़े ही हास्य-रस की चाशनी में पागा है। पति-पत्नी की नोक-झोंक को आपने कई कुंडलियों के माध्यम से अपनी इस पुस्तक में स्थान दिया है। लीजिए, देखें एक कुंडली-


प्यारे पति सेवक बानो, सुबह पिलाओ चाय।

गरम-गरम दो रोटियां, जोरू बैठी खाय।

जोरू बैठी खाय, उठाओ सर पर बोझा।

नित्य करो गुणगान, लगाओ झाड़ू पोछा।

कह अटपट कविराय, नहीं अब रहे कुंवारे।

बरसे घुसा लात, प्रेम से खाओ प्यारे।।


कुल मिलाकर श्री शैलेंद्र मोहन राय 'अटपट' जी ने अपनी चटपटी एवं व्यंग्यात्मक लेखनी के माध्यम से एक ऐसा दस्तावेज सम्पूर्ण साहित्य-जगत को सौंपा है, जिसकी चमक सदियों तक साहित्य-आकाश में दीप्तिमान होती रहेगी। मैं श्री अटपट जी के उत्तम स्वास्थ्य और मंगलमय भविष्य की कामना करता हूँ।

समीक्षक - *लाल बहादुर चौरसिया 'लाल'*

*महामंत्री, विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी, आजमगढ़ इकाई*

 
 
 

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