भीड़, मैच और मासूम: मोबाइल चोरी के पीछे नाबालिगों का संगठित नेटवर्क उजागर
- धन्ना राम चौधरी

- 3 अप्रैल
- 3 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
बेंगलूरु। आईपीएल जैसे हाई-वोल्टेज मैचों के दौरान जहां एक ओर चौकों-छक्कों की गूंज और दर्शकों का उत्साह चरम पर होता है, वहीं दूसरी ओर इसी भीड़ का फायदा उठाकर मोबाइल चोरी करने वाले संगठित गिरोह सक्रिय हो जाते हैं। ताजा मामला बेंगलूरु से सामने आया है, जहां मैच के दौरान हुई मोबाइल चोरी की घटनाओं ने एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है—जिसमें नाबालिग बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मैच के रोमांच में गायब हुआ मोबाइल
एक दर्शक मैच के दौरान हर शॉट पर खुशी मना रहा था। इसी बीच जब वह अपनी सीट पर लौटा, तो उसका मोबाइल गायब हो चुका था। पास में बैठा 12-13 साल का एक लड़का, जो आरसीबी की जर्सी पहने उसी की तरह मैच का आनंद ले रहा था—संदेह के दायरे से बाहर था। यही मासूमियत इन गिरोहों का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।
29 में से 21 मोबाइल बरामद, 8 नाबालिग हिरासत में
पुलिस के अनुसार, पहले ही मैच में चोरी हुए 29 मोबाइलों में से 21 बरामद कर लिए गए हैं। इस मामले में 8 नाबालिगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि गिरोह का मुख्य संचालक शुभम गिरफ्तार किया गया है। जांच में सामने आया है कि शुभम इन बच्चों से मोबाइल चोरी करवाता था और हर डिवाइस के बदले 2 से 3 हजार रुपये तक देता था। महंगे स्मार्टफोन, खासकर आईफोन, पर ज्यादा कमीशन मिलने के कारण इन्हें निशाना बनाया जाता था।
क्यों चुने जाते हैं नाबालिग?
विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल चोरी अब एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है, जिसमें चोरी से लेकर तस्करी तक का पूरा नेटवर्क सक्रिय है। कई मामलों में चोरी किए गए मोबाइल नेपाल और बांग्लादेश तक भेजे जाने की बात भी सामने आई है। कानूनी जानकारों का कहना है कि नाबालिगों का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि वे कानून के तहत अपेक्षाकृत कम सजा के दायरे में आते हैं। अगर कोई बच्चा पकड़ा जाता है, तो उसे आसानी से जमानत मिल जाती है और अभिभावकों को सौंप दिया जाता है। इसके विपरीत, बालिग अपराधियों पर सख्त धाराएं लगती हैं और उन्हें जेल व जुर्माने का सामना करना पड़ता है।
किस कानून के तहत होती है कार्रवाई
नाबालिगों के खिलाफ ऐसे मामलों में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015 के तहत कार्रवाई होती है। इस कानून के अनुसार जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड मामले की जांच करता है और चार महीने के भीतर फैसला सुनाता है। इस दौरान बच्चे को अभिभावकों की देखरेख में रखा जाता है या जरूरत पड़ने पर ऑब्जर्वेशन होम और काउंसलिंग के लिए भेजा जा सकता है।
कैसे फंसाए जाते हैं बच्चे
जानकारों के मुताबिक, इस नेटवर्क में ज्यादातर गरीब और मजदूर वर्ग के बच्चे शामिल किए जाते हैं। खासकर झारखंड जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों से बच्चों को बहला-फुसलाकर बड़े शहरों में लाया जाता है। उन्हें आईपीएल मैच दिखाने या घूमाने का लालच दिया जाता है और फिर प्रति मोबाइल कमीशन का प्रलोभन देकर अपराध में धकेल दिया जाता है। स्थानीय दलाल इस कड़ी का अहम हिस्सा होते हैं, जो बच्चों को गिरोह तक पहुंचाते हैं। धीरे-धीरे ये बच्चे इस अपराध की दुनिया में पूरी तरह फंस जाते हैं।
चुनौती बनी मासूमियत की आड़
भीड़-भाड़ वाले आयोजनों में नाबालिगों की मौजूदगी सामान्य लगती है, जिससे उन पर शक करना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ये गिरोह लगातार ऐसे बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं और कानून की कमजोरियों का फायदा उठा रहे हैं। मोबाइल चोरी की ये घटनाएं केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि समाज के एक संवेदनशील वर्ग—बच्चों—के अपराध की दुनिया में फंसने की गंभीर चेतावनी हैं। जरूरत है कि कानून के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि मासूमों को अपराध के जाल से बाहर निकाला जा सके।
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